पीवी सिंधु: BBC Indian Sportswoman of the Year की नॉमिनी

  • 20 फरवरी 2020
पीवी सिंधु को इस बार ओलंपिक में गोल्ड चाहिए

हैदराबाद की पी गोपीचंद अकैडमी में जाने का ये मेरा पहला मौका था. वहां दाख़िल होते ही एक अजब-सा एहसास होता है.

एक के बाद एक आठ बैडमिंटन कोर्ट जहाँ से खेलकर भारतीय ओलंपिक चैंपियन, वर्ल्ड चैंपियन और कई सुपर सिरीज़ चैंपियन निकल चुके हैं.

ख्यालों का ये सिलसिला अचानक तब टूटता है जब विश्व चैंपियन पीवी सिंधु अपनी किट के साथ कोर्ट में आती हैं. आते ही वो सीधे अपने साथियों के साथ प्रैक्टिस में जुट जाती हैं.

5 जुलाई 1995 को हैदराबाद में जन्मी और करीब छह फुट लंबी सिंधु ओलंपिक में बैडमिंटन का सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं.

कोर्ट पर करीब चार घंटे की प्रैक्टिस में एक बार भी सिंधु का ध्यान भंग नहीं हुआ. एक बार भी उन्होंने अपने फ़ोन को नहीं छुआ. बस कोर्ट पर लगातार प्रैक्टिस. हां साथियों के साथ हंसी ठहाके चलते रहे.

विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली सिंधु की कहानी सफलता की अनोखी मिसाल है. लेकिन ये सफलता रातों रात नहीं मिली.

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साल 2016 के ओलंपिक खेलों में रजत पदक जीतकर वापस आने के बाद सिंधु का शानदार स्वागत हुआ था.

आठ साल की उम्र से बैडमिंटन

कई घंटों के इंतज़ार के बाद, आख़िरकर जब सिंधु से इंटरव्यू का वक़्त मिला तो सबसे पहले सवाल ज़हन में यही आया, "बैडमिंटन के इस सफ़र की शुरुआत कैसे हुई?"

अपनी ट्रेडमार्क मुस्कुराहट के साथ सिंधु बताती हैं, "मैंने आठ साल की उम्र से बैडमिंटन खेलना शुरू किया. मेरे माता-पिता वॉलीबॉल खिलाड़ी हैं. पापा को वॉलीबॉल के लिए अर्जुन पुरस्कार मिल चुका है. तो जब वो रेलवे ग्राउंड पर वॉलीबॉल खेलने जाते थे तो साथ वाले कोर्ट में बैडमिंटन कोर्ट होता था. मैं वहाँ खेलने लगी और रूचि जगने लगी. महबूब अली मेरे पहले कोच थे. 10 साल की उम्र में मैं गोपीचंद अकैडमी आ गई और अब तक वहीं हूं."

पीवी सिंधु की प्रतिभा बचपन से ही दिखने लगी थी. साल 2009 में सब जूनियर एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप में कांस्य जीतने वाली सिंधु ने जैसे फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

18 साल की उम्र में सिंधु वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य जीत चुकी थीं और ऐसा करने वाली वो पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं. तब से लेकर अब तक सिंधु कई ख़िताब चुकी हैं लेकिन उनका सबसे पंसदीदा ख़िताब कौन सा है?

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एटर्नल ऑप्टिमिस्ट

उस जीत को भले ही चार साल हो गए हैं लेकिन ओलंपिक की बात सुनते ही सिंधु का चेहरा खिल उठता है.

"रियो ओलंपिक मेडल मेरे लिए हमेशा ख़ास रहेगा. 2016 ओलंपिक से पहले मैं घायल थी, छह महीने के लिए बाहर हो चुकी थी. समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना है. लेकिन मेरे कोच और माता-पिता ने मुझमें भरोसा जताया. मैं बस इतना ही सोच रही थी कि ये मेरे पहला ओलंपिक है और मुझे अपना बेस्ट देना है."

"फिर एक-एक कर मैं मैच जीतती गई. फ़ाइनल में भी मैंने 100 फ़ीसदी दिया पर वो दिन किसी का भी हो सकता था. मैंने सिल्वर मेडल जीता जो मामूली बात नहीं है. जब मैं भारत लौटी थी, गली-गली में लोग स्वागत में खड़े थे. सोचकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं."

जैसे-जैसे बातों का सिलसिला बढ़ रहा था, एक बात समझ में आई कि सिंधु उन लोगों में से हैं जो हमेशा आशावान रहते हैं- एटर्नल ऑप्टिमिस्ट.

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वर्ल्ड चैंपियनशिप

जब मैंने सिंधु से पूछा कि कभी ओलंपिक फ़ाइनल में हारने का मलाल हुआ तो वो तुरंत जवाब देती हैं, "जब मैं हारी थी तो थोड़ा बुरा तो लगा था. लेकिन हमें हमेशा दोबारा मौका मिलता है. मैं तो इसी बात से ख़ुश थी कि जो मेडल मैंने जीतने का सोचा भी नहीं था, मैंने वो हासिल कर लिया है. तब से तो ज़िंदगी ही बदल गई. 2019 में मैंने वर्ल्ड चैंपियनशिप जीती, यहां 2 कांस्य और 2 सिल्वर भी जीत चुकी हूं."

लेकिन ये जीत आसान नहीं थी. सिंधु ने गोपीचंद की कोचिंग में न सिर्फ़ कड़ी ट्रेनिंग की. 21 साल की सिंधु को फ़ोन भी कई महीनों से उनसे ले लिया गया. आइसक्रीम खाने जैसी छोटी-छोटी ख़ुशियाँ भी उनके लिए दूर की बात की थी.

आपमें से कई लोगों को वो वारयल वीडियो याद होगा जब रियो ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद सिंधु आईसक्रीम खा रही थीं.

मैंने ओलंपिक मेडल ही नहीं जीता था, "गोपी सर से आईसक्रीम खाने का अपना हक़ भी हासिल किया था, खिलखिलाते हुए सिंधु बताती हैं."

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फ़ाइनल फ़ोबिया

सिंधु और उनको कोच पी गोपीचंद का रिश्ता ख़ास रहा है.

"मैं दस साल की थी जब गोपी सर के साथ शुरुआत की थी और अब 24 साल की हूं, अब भी उनसे ही कोचिंग ले रही हूं."

सिंधु की ये साधारण सी बात दोनों के गहरे रिश्ते को दर्शाने के लिए काफ़ी है.

"वो अच्छे कोच ही नहीं, अच्छे दोस्त भी हैं, बतौर कोच वो स्ट्रिक्ट हैं पर कोर्ट के बाहर दोस्ताना. बतौर खिलाड़ी वो मुझे समझते हैं और उनके साथ मेरा गेम बेहतर हुआ है."

सिंधु के हर जबाव एक मुस्कुराहट पर ही ख़त्म होता है फिर चाहे बात मुश्किलों या नाकामी की ही क्यों न हो.

बेशुमार सफलता के बावजूद, सिंधु की आलोचना करने वाले भी रहे हैं जो बड़े फ़ाइनल मैचों में उनके हारने पर सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन सिंधु उन लोगों में से नहीं है जो शब्दों से जबाव देती हैं.

"कई लोग कहते थे कि इसको फ़ाइनल में क्या हो जाता है, सिंधु को फ़ाइनल फ़ोबिया है. पर मुझे लगा कि मैं अपना जवाब रैकेट से दूँ. मैंने ख़ुद को साबित किया है."

उनका इशारा 2019 में जीते वर्ल्ड चैंपियनशिप गोल्ड की तरफ़ था. इससे पहले वो 2018 और 2017 में फ़ाइनल में हार गई थीं.

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फ़ोर्ब्स मैगज़ीन की लिस्ट में...

सिंधु न सिर्फ़ भारत की सबसे सफल भारतीय महिला खिलाड़ियों में से है बल्कि सबसे ज़्यादा कमाई वाली खिलाड़ियों में भी शुमार हैं.

फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने 2018 में सिंधु को दुनिया की सबसे ज़्यादा कमाने वाली महिला ख़िलाड़ियों में शामिल किया था.

सिंधु अपने आप में एक ब्रैंड बन चुकी हैं और कई ब्रैंड्स का चेहरा भी हैं.

2018 में कोर्ट पर खेलते हुए सिंधु ने पाँच लाख डॉलर कमाए और विज्ञापनों से उन्हें 80 लाख डॉलर अतिरिक्त मिले. यानी हर हफ़्ते कम से कम एक लाख 63 हज़ार डॉलर की कमाई जो कई क्रिकेटरों से भी ज़्यादा है.

एक सफल खिलाड़ी होने से परे, बातचीत में सिंधु एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर उभर कर सामने आती हैं जिसे अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा है, जो अपने कंधे पर उम्मीदों और ज़िम्मेदारियों के बोझ को समझती हैं और दबाव के बावजूद अपनी गेम का भरपूर आनंद भी लेती हैं.

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प्रीमियर बैडमिंटन लीग से भारतीय बैडमिंटन को कितना फ़ायदा?

सिंधु की सफलता का मंत्र

प्रैक्टिस का कड़ा शेड्यूल, दुनिया भर में खेलने के लिए लगातार आना-जाना, बिज़नेस, विज्ञापन... 24 साल की एक लड़की के लिए क्या ये सब बोझ तो नहीं बन जाता है?

अपनी गेम की तरह सिंधु अपनी सोच में एकदम स्पष्ट हैं, "मैं इस सबको ख़ूब इंजॉय करती हूँ. लोग पूछते रहे हैं कि आपकी तो कोई पसर्नल लाइफ़ बचती नहीं होगी. लेकिन मेरे लिए तो बेहतरीन वक़्त है. मुझे इसका पूरा आनंद लेना चाहिए. क्योंकि ये ज़रूरी नहीं कि आप हमेशा ही लाइमलाइट में रहें. मुझे कभी नहीं लगा कि मैं ज़िंदगी में कुछ मिस कर रही हूँ. बैडमिंटन मेरा पैशन है."

तो सिंधु की सफलता का मंत्र क्या है? "चाहे कुछ भी हो जाए, हमेशा ख़ुद पर भरोसा रखो. यही मेरी ताकत है. क्योंकि किसी और के लिए नहीं ख़ुद के लिए खेल रहे हैं. ख़ुद से कहिए कि आप कुछ भी कर सकते हैं."

सिंधु उस आत्मविश्वास के साथ जबाव देती हैं जो एक वर्ल्ड चैंपियन के पास ही हो सकता है. लेकिन अगर आपको लगता है कि विश्व चैंपियन होने का मतलब है बहुत सारी मेहनत और थोड़ी सी बोरियत है तो सिंधु सबको ग़लत साबित करती हैं.

खेलों के साथ-साथ सिंधु फ़ैशन आइकन भी बन रही हैं. अपनी पर्सनैलिटी के इस हिस्से को बताते हुए सिंधु बच्चों की तरह उत्साहित हो उठती हैं.

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टोक्यो ओलंपिक

"मुझे अच्छे कपड़े पहनना, सजना अच्छा लगता है". उनकी ऊंगलियों पर लगी चटखदार रंग वाली नेल पॉलिश भी इसी तरफ़ इशारा करती है.

एक बार के लिए तो मैं ये पूछने के लिए लालालियत हो रही थी कि ये नेल पॉलिश कहाँ से ली.

ख़ैर, अपनी बात बढ़ाते हुए सिंधु कहती हैं, "बिलबोर्ड पर, विज्ञापनों पर ख़ुद को देखना अच्छा लगता है."

बैडमिंटन के अलावा सिंधु को म्यूज़िक सुनने का बहुत शौक़ है और साथ ही अपने भतीजे के साथ खेलना उनके लिए सबसे बड़ा स्ट्रेसबस्टर है.

और हैदराबादी होने के नाते, हैदराबादी बिरयानी की तो वो फ़ैन हैं.

खाने, फ़ैशन और परिवार से अलग, सिंधु का पूरा फ़ोकस टोक्यो ओलंपिक 2020 पर है. ओलंपिक मेडल (दोबारा) जीतना उनका सबसे बड़ा सपना. इस बार सिंधु को गोल्ड चाहिए- भारत की पहली महिला ओलंपिक गोल्ड विजेता.

और इस तरह बातचीत का सिलसिला ख़त्म हुआ सिंधु की उसी मुस्कान के साथ और इस सलाह के साथ.

"मैं ख़ुश हूँ कि लोग मुझे प्रेरणा का एक ज़रिया मानते हैं. बहुत लोग बैडमिंटन में करियर बनाना चाहते हैं. मैं बस इतना ही कहना चाहूँगी कि ये मेहनत कुछ हफ़्तों की नहीं है बल्कि सालों की मेहनत लगेगी. सफलता कब आसानी से मिली है?"

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