संजीव चावला: मैच फ़िक्सिंग केस पर CBI ने अपनी रिपोर्ट में क्या कहा था

  • 14 फरवरी 2020
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Image caption संजीव चावला बुधवार को लंदन से दिल्ली लाये गए

लंदन से भारत लाये जाने के बाद कथित सट्टेबाज़ संजीव चावला को दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार को 12 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया है.

संजीव चावला दक्षिण अफ़्रीका क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए की संलिप्तता वाले एक मैच की फ़िक्सिंग के मामले में मुख्य अभियुक्त हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार गुरुवार को अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सुधीर कुमार सिरोही ने चावला को 12 दिन की पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया.

पुलिस ने अदालत को बताया कि 'वर्ष 2000 के इस केस की जाँच के लिए चावला को विभिन्न स्थानों पर ले जाया जायेगा और कई लोगों से उनका आमना-सामना कराया जायेगा.'

समाचार एजेंसी ने दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से लिखा है कि 'संजीव चावला को तिहाड़ जेल की एक अलग सेल में रखा जाएगा.'

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पुलिस ने कहा है कि अब तक संजीव से कोई सवाल-जवाब नहीं किये गए हैं, पर शुक्रवार से इस संबंध में जाँच आगे बढ़ायी जाएगी.

दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के अधिकारी राम गोपाल नाइक ने गुरुवार को मीडिया से बात करते हुए कहा था कि 'विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय की मदद से दिल्ली पुलिस की टीम बीते कई वर्षों से संजीव को भारत लाने का प्रयास कर रही थी. उनके प्रत्यर्पण की प्रक्रिया वर्ष 2013 में शुरू हुई थी जो अब जाकर पूरी हो सकी है. अब इस मामले को आगे बढ़ाया जाएगा.'

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जब शुरू हुई थी जाँच...

वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मैच फ़िक्सिंग नामक एक भूचाल आया था जिसकी वजह से क्रिकेट से जुड़ी कई नामचीन हस्तियों पर सवाल उठे थे.

आरोप लगे थे कि 'सट्टेबाज़ों के ज़रिए मैचों, पिचों और टीम के चयन की जानकारी पहले से मुहैया कराई गई.'

दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए, जिनकी 2002 में विमान दुर्घटना में मौत हो गई, उन्होंने फ़िक्सिंग के मामले में 'लिप्त' होने की बात स्वीकार की थी और कई सटोरियों और सट्टेबाज़ों के बारे में जाँचकर्ताओं को कुछ जानकारी भी दी थी.

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Image caption दक्षिण अफ़्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोनिए

उस दौरान भारत में बढ़ते दबाव के बीच केन्द्रीय जाँच ब्यूरो की एक टीम गठित की गई थी जिसने भारतीय क्रिकेट में मैच-फ़िक्सिंग के आरोपों की विस्तृत छान-बीन की थी. हालांकि इस टीम के पास तहक़ीक़ात करने का समय कम ही था.

सीबीआई के इस तीन सदस्यीय जाँच दल का एक अहम हिस्सा थे, तब पुलिस निरीक्षक रहे एम.ए गणपति जिन्होंने वर्ष 2014 में बीबीसी हिन्दी से खुलकर बात की थी.

इस ख़ास बातचीत में उन्होंने उल्लेख किया था कि 'कैसे उनकी टीम ने बिना एफ़आईआर दर्ज हुए इस मामले की पड़ताल की.'

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Image caption भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन

गणपति ने क्या बताया था?

बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत में एम.ए गणपति ने कहा था, "शुरुआत में हमारे पास कोई भी ठोस सुबूत नहीं था. समय भी कम था क्योंकि मीडिया और पब्लिक की तरफ़ से दबाव था. हमने सबसे पहले बुकीज़ और पन्टर्स को भारत भर में तलाशना शुरू किया. उनके फ़ोन टैप करने शुरू किये. इसमें सिर्फ़ खेल तक के बुकी सीमित नहीं थे."

"फिर हमने भारतीय क्रिकेटरों के फ़ोन वग़ैरह की पड़ताल शुरू की. पता चला कि कुछ के कनेक्शन साफ़ दिख रहे हैं. इसके बाद हमें कुछ दस्तावेज़ भी मिले और हमने आयकर विभाग की बहुत मदद ली, क्योंकि इस मामले में क़ानून ना होने की वजह से केस दर्ज नहीं हो पाया था."

"इस मामले में जो असल जाँच हुई थी वो आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने की थी. मामले दर्ज हुए, चंद लोगों को शक के आधार पर हिरासत में लिया गया था और बाद में उन्हें ज़मानत भी मिली थी."

गणपति ने बताया था, "कुछ नामी खिलाड़ियों ने फ़िक्सिंग में अपने रोल को स्वीकार किया था जिन्होंने इनकार किया था उनके ख़िलाफ़ भी हमारे पास पुख़्ता सुबूत थे. हाँ, ये सभी बड़े खिलाड़ी थे, हीरो थे, लेकिन जब हमने सबूत उनके सामने रखे तो उन्हें मानना ही पड़ा."

लेकिन जिन खिलाड़ियों पर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने प्रतिबंध लगाया था उन्होंने आख़िर बुकीज़ या सटोरियों से किस तरह के फ़ायदे लिए थे?

इस सवाल के जवाब में गणपति ने कहा था, "आज के दौर से तुलना करें तो ग़लत होगा, लेकिन उस दौर (वर्ष 2000) में वो पैसा काफ़ी ज़्यादा था और साथ में कभी-कभी होटल वग़ैरह में रुकाया जाना भी बड़ी बात होती थी और सीबीआई को इसके प्रमाण मिले थे."

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Image caption भारतीय क्रिकेटर अजय जडेजा पर भी बीसीसीआई ने बैन लगाया था

CBI की रिपोर्ट में क्या था?

सीबीआई ने बहुत कम समय में हुई इस जाँच के बाद 162 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को सौंपी थी.

इसी जाँच के आधार पर तत्कालीन भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन और अजय शर्मा पर आजीवन प्रतिबंध लगाया गया था.

टीम के उप-कप्तान अजय जडेजा और मनोज प्रभाकर पर पाँच-पाँच साल तक क्रिकेट ना खेलने का प्रतिबंध लगाया गया था जबकि टीम के फ़िज़ियो अली ईरानी पर भी प्रतिबंध लगा था.

सीबीआई की रिपोर्ट के बाद किसी के ख़िलाफ़ कोई औपचारिक मामला तो दर्ज नहीं किया गया था, लेकिन इस रिपोर्ट की प्रमुख बातें ये थीं:

पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने क्रिकेट मैचों को 'फ़िक्स' किया जिसमें उनका साथ दिया अजय जडेजा और नयन मोंगिया ने.

अज़हरुद्दीन ने पूछताछ के दौरान एम के गुप्ता नामक एक बुकी से अपने संबंधों पर जानकारी दी थी.

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Image caption इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलेक स्टीवर्ट

वेस्टइंडीज़ के बल्लेबाज़ ब्रायन लारा पर मुकेश गुप्ता ने 40,000 डॉलर 'घूस' लेने का इल्ज़ाम लगाया था जिसे संबंधित व्यक्ति ने पूरी तरह ख़ारिज कर दिया था.

इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलेक स्टीवर्ट पर मुकेश गुप्ता ने पिच, मौसम और टीम के बारे में जानकारी के आरोप लगाए थे. हालांकि गुप्ता ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि एलेक स्टीवर्ट और न्यूज़ीलैंड के मार्टिन क्रो ने मैच फ़िक्स करने के उनके ऑफ़र को ठुकरा दिया था.

रिपोर्ट में कहा गया था कि उस समय से पहले भी भारत में कुछ घरेलू क्रिकेट मैचों पर पैसा लगने के प्रमाण मिले हैं लेकिन 1983 में भारत के पहली बार विश्व कप जीतने के बाद से इस पर पैसा ज़्यादा लगाया जाने लगा.

सीबीआई रिपोर्ट के अनुसार पूर्व भारतीय ऑलराउंडर मनोज प्रभाकर ने कई विदेशी खिलाडियों की बुकीज़ से जान-पहचान कराई थी.

हालांकि रिपोर्ट में और ख़ुद एमए गणपति ने बीबीसी को बताया था कि "मनोज प्रभाकर ने कपिल देव पर जो 'रिश्वत' देने के आरोप लगाए थे वे सभी जाँच के दौरान बेबुनियाद पाए गए थे."

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