यूं बदल रही है भारतीय महिला फ़ुटबॉल खिलाड़ियों की ज़िंदगी

  • 17 फरवरी 2020
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पिछले कुछ वर्षों से भारत में खेलों की लीग की बहार है. पहले क्रिकेट की आईपीएल, उसके बाद हॉकी इंडिया लीग, पुरूष फ़ुटबॉल की आईएसएल, प्रीमियर बैडमिंटन लीग, प्रो कबड्डी लीग, टेनिस लीग, कुश्ती लीग, मुक्केबाज़ी लीग और टेबल टेनिस लीग भी शुरू हुई. हालांकि इनमें से हॉकी इंडिया लीग अब नहीं होती है. इनसे अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं कि भारतीय खेलों में लीग टूर्नामेंट अब अहम भूमिका निभाने वाले हैं.

भारत में महिला फ़ुटबॉल जिस तरीके से नज़रअंदाज़ रहा है, कुछ साल पहले ये सोचना तक मुश्किल था कि यहां महिलाओं की फुटबॉल लीग भी होगी. लेकिन इंडियन महिला लीग का चौथा संस्करण बीते शुक्रवार को ही बंगलुरु में संपन्न हुआ.

ख़िताबी मुक़ाबला गोकुलम केरला ने 'क्रिफ़्सा' क्लब को 3-2 से हराकर जीता. गोकुलम केरला पहली बार इस लीग की चैंपियन बनी है. विजेता टीम के लिए परमेश्वरी देवी, कमला देवी और सबित्रा भंडारी ने एक-एक गोल किया.

इससे पहले सेतु फ़ुटबॉल क्लब, स्टूडेंट्स फ़ुटबॉल क्लब और इस्टर्न स्पोर्टिंग यूनियन चैपिंयन टीम रही है.

इस बार इस लीग में कुल मिलाकर 12 टीमों ने हिस्सा लिया. इन्हें छह-छह टीमों के दो पूल में बांटा गया. इन टीमों में मणिपुर, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और शेष भारत ज़ोन की टीम शामिल थी.

वैसे 2016-17 में लीग के पहले संस्करण में केवल छह टीमों ने हिस्सा लिया था. अगले सीज़न में कुछ विदेशी महिला फ़ुटबॉल खिलाड़ी भी क्लब से जुड़ीं.

गोकुलम फुटबॉल क्लब केरला से युगांडा की फज़ीला इक्वापुत और रिताह नाब्बोसा के अलावा सेतु फ़ुटबॉल क्लब से इंग्लैंड की टेन्वी हैंस, बांग्लादेश की दो खिलाड़ी सबीना ख़ातून और कृष्णा रानी को खेलने का अवसर मिला.

(बीबीसी पहली बार भारत में महिला खिलाड़ियों के लिए बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्स विमन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड लेकर आया है. इसकी घोषणा आठ मार्च को की जाएगी. आप अपने पसंदीदा खिलाड़ी को वोट करके विजेता बना सकते हैं. वोट करने की आख़िरी तारीख़ 24 फरवरी है.)

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Image caption जीत का जश्न मनाती हुईं गोकुलम केरला टीम

महिला फ़ुटबॉल को लोकप्रिय बनाना है तो...

इंडियन महिला लीग में एक सीज़न में सबसे अधिक गोल करने का रिकार्ड मणिपुर पुलिस स्पोर्टस क्लब की फ़ॉरवर्ड और भारतीय महिला फुटबॉल टीम की कप्तान नांगोम बाला देवी के नाम है. उन्होंने साल 2018-19 के तीसरे सीज़न में 26 गोल किए.

साल 2016-17 के पहले सीज़न में इस्टर्न स्पोर्टिग यूनियन की यमुना कमला देवी और साल 2017-18 के दूसरे सीज़न में नांगोम बाला देवी ने 12-12 गोल किए. साल 2017-18 में नांगोम बाला देवी क्रिफ़्सा फुटबॉल क्लब के लिए खेलीं.

इस इंडियन महिला फ़ुटबॉल लीग को लेकर फ़ुटबॉल समीक्षक नोवी कपाड़िया कहते हैं कि बरसों से नज़रअंदाज़ महिलाओं की फ़ुटबॉल को लेकर आखिरकार भारतीय फ़ुटबॉल संघ ने साल 2016-17 में पहली बार इस तरह की लीग कराने का निर्णय लिया.

इस साल भारत को अंडर-19 महिला विश्व कप फ़ुटबॉल टूर्नामेंट की मेज़बानी भी करनी है, इसलिए भारत की उस टीम पर भी ध्यान दिया जा रहा है जो उसमें हिस्सा लेगी.

नोवी कपाड़िया कहते हैं कि भारत में अगर महिलाओं में फ़ुटबॉल को लोकप्रिय बनाना है तो अधिक से ज़्यादा टूर्नामेंट भी कराने होंगे.

विदेशों में तो आर्सनल, चेल्सी जैसे बड़े-बड़े फ़ुटबॉल क्लब में महिलाओं की भी टीम है. इसके उलट भारत के जितने भी बड़े फ़ुटबॉल क्लब जैसे मोहन बागान, ईस्ट बंगाल या आईएसएल के क्लब हैं उनमें कहीं भी महिलाओं की फ़ुटबॉल की बात नही होती.

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कितनी ज़रूरी हैं महिला फुटबॉल लीग?

इस तरह की लीग का होना बेहद सकारात्मक है क्योंकि टूर्नामेंट में संघर्षपूर्ण मैच खेलकर ही खिलाड़ी का विकास होता है.

इस लीग के सारे मैच बंगलुरु में ही खेले गए, क्या इससे इस लीग का आकर्षण कम हुआ?

इसके जवाब में नोवी कपाड़िया कहते हैं कि महिलाओं के मैच के टेलिविज़न अधिकार नहीं हैं और टिकट भी बहुत कम बिकते हैं इसलिए यह एक तरह से समझौते वाली स्थिति थी कि कम से कम मैच तो हो रहे हैं.

दूसरा, यह पुरूषों की लीग की तरह स्थापित लीग नही है. अभी यह लीग शुरुआती चरण में है इसलिए ऐसा होना स्वभाविक है. कपाड़िया मानते हैं कि लीग से अब प्रतिभाएं निखरकर सामने आने लगी हैं.

आशालता देवी को भारतीय फ़ुटबॉल संघ ने साल 2018-19 में साल की सर्वश्रेष्ठ महिला फुटबॉलर चुना था. उनके अलावा अपनी फ्ऱी-किक के लिए मशहूर दिल्ली की डालिमा छिब्बर, भारत की गोलकीपर अदीति चौहान, मणिपुर की ओबैंडो देवी ने भी ख़ूब नाम कमाया.

अच्छी बात है कि बिहार और ओडिशा जैसे आदिवासी क्षेत्रों से भी अब महिला फुटबॉलर आ रही हैं. लीग में कुछ स्टार खिलाड़ियों को अच्छा पैसा मिला है.

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सुखद हो सकता है महिला फ़ुटबॉल का भविष्य

जानकार मानते हैं कि भारत में महिला फ़ुटबॉल की दशा के मद्देनज़र ज़्यादा ज़रूरी है खिलाड़ियों को मिलने वाला मौका. टूर्नामेंट में शामिल ज़्यादातर खिलाड़ी या तो पढ़ाई कर रही हैं या फिर छोटे-मोटे काम करती हैं.

इस लीग के बाद मणिपुर पुलिस, रेलवे और इनकम टैक्स जैसे संस्थानों में अब इन्हें नौकरी भी मिल रही है. डालिमा छिब्बर को तो स्कॉलरशिप भी मिली और वह कनाडा में पेशेवर लीग खेल रही हैं.

इस लीग का सबसे बड़ा असर महिला खिलाड़ियों के मनोबल पर पड़ा है.दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में भी अब लड़कियों की फ़ुटबॉल पर ध्यान दिया जा रहा है.

नोवी कपाड़िया बताते हैं कि हंस और हिंदुस्तान क्लब के अलावा दूसरे क्लब ट्रेनिंग दे रहे हैं. कुछ एनजीओ भी सामने आए हैं. यानी, महिलाओं की फ़ुटबॉल की तरफ एक कदम तो आगे बढ़ा है जिसके सुखद परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे.

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