डैरेन सैमी के ‘ग़ुस्से’ ने भारत की सामाजिक हक़ीक़त को बयान कर दिया है?

  • वंदना
  • टीवी एडिटर, बीबीसी भारतीय भाषाएं
डेरेन सेमी

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"जब मुझे उस शब्द से बुलाया जाता था, मुझे लगता था कि उसका मतलब मज़बूत घोड़ा या ऐसा कुछ है. वो शब्द बोलते ही सब हंस पड़ते थे. मुझे लगता था कि मेरी क्रिकेट टीम के लोग हंस रहे हैं तो ज़रूर कुछ मज़ाक़िया बात होगी. आप जानते हैं आप कौन हैं. मैं आप लोगों को अपना भाई समझता था."

क्रिकेटर डैरेन सैमी के इस बयान में 'उस' शब्द का मतलब कालू से है.

जिस वक़्त अमरीका समेत पूरी दुनिया में नस्लभेद को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वेस्टइंडीज़ क्रिकेट टीम के कप्तान रहे डैरेन सैमी ने भारत में आईपीएल के दौरान उनके साथ हुए कथित नस्लभेद को लेकर अपनी बात सामने रखी है.

भारत में इन विरोध प्रदर्शनों की कोई ख़ास आहट सुनाई नहीं दी है. कुछ लोग इस आरोप से हैरान परेशान हैं, लेकिन भारत में इस तरह का बर्ताव या क्रिकेट में नस्लभेद कोई नई बात नहीं है.

फ़ुटबॉल में तो अक्सर नस्लभेद की बात होती आई है लेकिन क्रिकेट में इस पर खुलकर बात नहीं होती जैसा कि क्रिस गेल ने भी अपनी ताज़ा इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा है.

भारत में रहने वाले काले लोग खुलेआम नस्लभेद का आरोप लगाते आए हैं, क्रिकेट भी इससे अछूता नहीं है - फिर चाहे भारत हो या दूसरे देश.

अगर सूची बनाई जाए तो ये लेख ऐसे क़िस्सों की फ़हरिस्त भर से ही भर जाएगा.

सवाल मानसिकता का है

2019 की ही एक क्रिकेट कॉमेंट्री सोशल मीडिया पर मिल जाएगी. दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ मैच चल रहा था और पाकिस्तान के कप्तान सरफ़राज़ ख़ान विकेटकीपिंग कर रहे थे.

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सरफ़राज़ ख़ान और डैरेन सेमी

उनके माइक से आ रही आवाज़ से पता चलता है कि वो दक्षिण अफ़्रीका के खिलाड़ी के लिए ग़लत शब्द का प्रयोग कर रहे हैं.

वही शब्द जिससे सैमी को आपत्ति है. हैरानी की बात ये है कि कॉमेंट्री बॉक्स में बैठे रमीज़ राजा से जब दूसरे कॉमेंटेटर पूछते हैं तो वो बात को हंसकर टाल देते हैं.

हालांकि, सरफ़राज़ पर बैन भी लगा लेकिन सवाल मानसिकता का है.

एक खिलाड़ी जो दूसरे खिलाड़ी के मुक़ाबले बराबरी का दर्जा रखता है लेकिन सिर्फ़ रंग के आधार पर उस पर अभद्र टिप्पणी कर सकता है.

जब नस्लभेद का आरोप भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर लगता है तो समझिए कि भूरा रंग ख़ुद को काले रंग पर बेहतर साबित करने की कोशिश कर रहा होता है.

और जब आरोप गोरे क्रिकेटरों पर लगता है तो वे भूरे और काले रंग वालों को कमतर साबित करने की कोशिश में होते हैं.

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मंकीगेट भी है एक उदाहरण

2008 का मंकीगेट आपको याद होगा जब भारत के खिलाड़ी हरभजन सिंह पर ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी एंड्रूय साइमंड्स को लेकर नस्लभेदी टिप्पणी का आरोप लगा था.

भारत ने टूर्नामेंट से हट जाने तक की धमकी दे डाली दी और बाद में हरभजन पर से भी आरोप हटा लिए गए.

नस्लभेदी टिप्पणियाँ उससे पहले भी चलती आई हैं और उसके बाद भी और ज़्यादातर इसके निशाने पर काले खिलाड़ी ही होते हैं.

ये नस्लवाद सिर्फ़ विरोधी टीम के खिलाड़ियों की तरफ़ से ही नहीं, क्रिकेट के दर्शकों के बीच से भी आता है जो दर्शाता है कि ये मानसिकता खेल से परे एक सामाजिक समस्या है. खिलाड़ी इसी मानसिकता को मैदान पर आगे बढ़ाते हैं.

इस सबका खिलाड़ियों पर बुरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है.

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जोफ़्रा आर्चर

2019 में 24 साल के युवा खिलाड़ी जोफ़रा आर्चर को न्यूज़ीलैंड में एक दर्शक की ओर से बहुत ख़राब नस्लीय टिप्पणियों का सामना करना पड़ा था.

आर्चर बारबडॉस में जन्मे काले मूल के खिलाड़ी हैं. आर्चर इंग्लैंड के लिए विदेशी धरती पर अपना पहला मैच खेल रहे थे और ये मैच उनके लिए बहुत ख़ास था.

ये मैच उन्हें याद तो रहा लेकिन वो इसे शर्मनाक क़िस्से की तरह याद करते हैं.

मैच के बाद आर्चर ने कहा था कि अगर आप मेरी गेंदबाज़ी को बुरा कहते हैं तो मैं सुन लूँगा लेकिन नस्लवादी टिप्पणियाँ देना बहुत शर्मनाक है.

उस वक़्त अपने छह महीने के छोटे से करियर में उन्हें कम से कम दो बार ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ा था.

धर्म और नस्ल का मिश्रण तो और घातक

पिछले दो दशकों की ही बात करें तो कितने ही वाक़ये याद आते हैं. 2003 में ऑस्ट्रेलिया के डेरेन लीमैन ने श्रीलंका के खिलाड़ियों पर रेसिस्ट टिप्पणी की थी.

और जब नस्ल में धर्म का मिश्रण हो जाता है तो ये और भी घातक हो बन जाता है.

आपको याद होगा इंग्लैंड के खिलाड़ी मोइन अली ने आरोप लगाया था कि ऑस्ट्रलियाई खिलाड़ी ने उन्हें ओसामा कहा था. या फिर डीन जोन्स ने 2006 में दक्षिण अफ़्रीका के हाशिम अमला को आतंकवादी कह दिया था.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

बात सरहद पार

समाप्त

ऐसा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल या क्रिकेट बोर्ड की नस्लभेद के ख़िलाफ़ कोई नीति नहीं है. इस नीति में खिलाड़ियों, सदस्यों और दर्शकों को लेकर अलग-अलग नियम हैं.

आईसीसी के सदस्यों के लिए निर्देश हैं कि वो नस्ल, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीयता, लिंग के आधार पर किसी का भी अपमान नहीं करते, धमका नहीं सकते और न ही भेदभाव कर सकते हैं.

दर्शकों के लिए निर्देश हैं कि अगर कोई दर्शक रंग, धर्म, नस्ल, लिंग, राष्ट्रीयता आदि के आधार पर भेदभाव करता है तो इसे स्टेडियम से निकाला जा सकता है और आपराधिक कारवाई की जा सकती है.

लेकिन बावजूद इसके खेल के मैचों में नस्लभेदी टिप्पणियाँ खिलाड़ियों और दर्शकों दोनों की ओर से होती आई हैं.

डीन जोन्स हो, डेरेन लीमैन हों या सरफ़राज़ ख़ान सबने बाद में माफ़ी भी माँगी है लेकिन फिर अगले साल कोई नया सरफ़राज़ ख़ान या लीमैन खड़ा हो जाता है.

क्यों? इसका जवाब सामाजिक ढाँचे में है जहाँ से इस नस्लवाद को पनपने का ज़रिया मिलता है, जहाँ रोज़मर्रा के जीवन में इस पर स्वीकृति की मोहर लगती है, और इसे सामान्य और स्वीकार्य बना दिया जाता है.

भारत में इसकी झलक फ़िल्मों, आम बोलचाल में आसानी से मिलती है - जहाँ 'बहुत ख़ूबसूरत' के बाद गाने में 'मगर सांवली सी' लगाना पड़ता है.

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हाशिम अमला

और जवाब आईसीसी के पास भी होना चाहिए

डैरेन सैमी ने भी चुभता हुआ सवाल आईसीसी से किया है, "आईसीसी और बाक़ी सब क्रिकेट बोर्ड क्या आप देख नहीं रहे हैं कि मेरे जैसे लोगों के साथ क्या हो रहा है. ये सिर्फ़ अमरीका के बारे में नहीं है. ये रोज़ होता है. ये चुप रहने का समय नहीं है. मैं आपकी बात सुनना चाहता हूँ."

हालांकि आईसीसी की ओर से कोई बयान नहीं आया है.

स्पोर्ट्स एक ऐसी ख़ूबसूरत विधा है जहाँ मुक़ाबला दो हुनरमंद लोगों के बीच आमने-सामने और तय नियमों के तहत होता है.

कौन खिलाड़ी किस से बेहतर है इसका पैमाना सिर्फ़ और सिर्फ़ मैदान पर क़ाबिलियत होना चाहिए - न कि किसी की चमड़ी का रंग, फिर वो टेनिस कोर्ट हो, क्रिकेट का मैदान या फ़ुटबॉल पिच.

फ़िलहाल काले और सफ़ेद मास्क लगाए वेस्टइंडीज़ की टीम इंग्लैंड पहुँच गई हैं- कोरोनावायरस के बीच ये पहली बड़ी क्रिकेट सीरीज़ होगी.

क्रिकेट में जंग कोरोना वायरस और नस्लभेद दोनों से है और इसमें भारत भी शामिल है.

2014 की क्रिकेटर इशांत शर्मा की इंस्टाग्राम पोस्ट कुछ-कुछ इसकी गवाही देती है जहाँ उन्होंने डैरेन सैमी के साथ फ़ोटो डाल कर लिखा है- मैं, भुवी, कालू और गन राइज़र्स.

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