कोरोना का असर: लार की धार और गेंदबाज़ के हुनर का सवाल

  • आदेश कुमार गुप्त
  • बीबीसी हिंदीडॉटकॉम के लिए
गेंद

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इसी सप्ताह भारत के तेज़ गेंदबाज़ और स्विंग के माहिर मोहम्मद शमी ने कहा कि वह लार पर प्रस्तावित प्रतिबंध के बावजूद गेंद को रिवर्स स्विंग करा सकते हैं बशर्ते गेंद की चमक बरक़रार रखी जाए. उनका यह भी कहना था कि वह बचपन से ही लार के इस्तेमाल के आदी हैं. अगर आप तेज़ गेंदबाज़ हैं, तो अपने आप ही गेंद को चमकाने के लिए लार का इस्तेमाल करने लगते हैं, लेकिन हां, अगर आप सूखी गेंद की चमक बरक़रार रख पाएं तो यह निश्चित तौर पर स्विंग करेगी.

भले ही उनका यह कहना अख़बारों के एक छोटे से कोने में छपा, लेकिन मंगलवार को आईसीसी ने कोरोना वायरस महामारी के बीच शुरू होने वाले क्रिकेट मुक़ाबलों के लिए कुछ नए नियमों को मंज़ूरी दे दी जो अख़बारों की सुर्ख़ियां बनीं.

नए नियम के अनुसार अब गेंदबाज़ खेल के किसी भी प्रारूप में गेंद पर लार नहीं लगा सकेंगे.

इससे पहले भारत के पूर्व कप्तान अनिल कुंबले के नेतृत्व वाली समिति ने कोरोना संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए गेंद पर चमक लाने के लिए मुंह की लार के इस्तेमाल पर रोक लगाने की सिफ़ारिश की थी.

आईसीसी ने हालांकि नियम के उल्लंघन पर कुछ ढील देने की पेशकश की है. अगर कोई खिलाड़ी गेंद पर मुंह की लार का इस्तेमाल करता है तो अंपायर टीम को दो बार नियम का उल्लंघन करने पर चेतावनी देंगे.

लेकिन इसके बाद फिर ऐसा होने पर बल्लेबाज़ी कर रही टीम को पाँच अतिरिक्त रन दिए जाएंगे. गेंद पर मुंह की लार का इस्तेमाल अनजाने में हुआ है या नहीं, इसका निर्णय भी अंपायर करेंगे.

क्या कहते हैं जानकार

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अब यह स्वाभाविक है कि नए नियम के आने से गेंदबाज़ों के लिए सीम और स्विंग कराने में मुश्किल होगी लेकिन कितनी? यह जानने के लिए बीबीसी ने साल 1983 की विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट की विजेता भारतीय टीम के अहम आल-राउंडर रहे मदन लाल से विस्तार से बात की.

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मदन लाल ने कहा, ''कोरोना बीमारी के कारण यह नया नियम आया है, लेकिन अच्छा भी है क्योंकि अब यह नहीं मालूम कि कब क्या हो जाए, बचाव किए जा रहे हैं. इससे गेंदबाज़ी पर थोड़ा बहुत असर ज़रूर पड़ेगा. लार का इस्तेमाल करने से गेंद पर चमक के साथ एक साइड भारी रहती है. इससे तेज़ गेंदबाज़ को गेंद को स्विंग कराने में मदद मिलती है, इतना ही नहीं, रिवर्स स्विंग कराने में भी आसानी रहती है, लेकिन क्या करें हालात के अनुसार नियम बनाया गया है.''

गेंद को पैंट पर अब अधिक रगड़ने से क्या चमक बनाए रखने में मदद मिलेगी, इसे लेकर मदन लाल मानते हैं कि दस-पंद्रह ओवर तक तो ऐसा कर सकते हैं. लेकिन इससे बहुत अधिक फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. एक बार जब गेंद रफ़ हो जाए या पुरानी पड़ जाए तो उसकी चमक चली जाती है.

मदन लाल आगे कहते हैं कि आजकल के गेंदबाज़ समझदार हैं. अगर वह मिलकर एक तरफ़ से ही गेंद को चमकाते रहेंगे तो चमक बनी रह सकती है. अब यह देखना होगा कि गेंद की चमक कितने ओवर तक रहेगी या चलेगी.

पहले भी हमने देखा है कि 70-75 ओवर तक गेंद की चमक बनी रहती है, गेंदबाज़ लार या पसीना गेंद पर लगाते रहते हैं, इससे मदद मिलती रहती है. गेंदबाज़ रिवर्स स्विंग करते रहते हैं.

नए नियम को लेकर मदन लाल मानते हैं कि इससे तेज़ गेंदबाज़ को गेंद की पकड़ बनाने में कोई दिक़्क़त नहीं आएगी क्योंकि वह पुरानी गेंद से भी गेंदबाज़ी करते रहते हैं.

हुनर का सवाल

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तो क्या अब तेज़ गेंदबाज़ों को कुछ नई बातें सीखनी होंगी, अपने हुनर को बढ़ाना होगा. इस सवाल पर मदन लाल कहते हैं कि तेज़ गेंदबाज़ को कटर यानि गेंद को कट कैसे कराया जाता है, यह सीखना होगा. ऑफ़ कट कैसे करते है, लेग कटर कैसे करते हैं, इस पर मेहनत करनी होगी.

मदन लाल कहते हैं कि जब यह नियम बना ही दिया है तो अब नए खिलाड़ियों को भी बिना लार का इस्तेमाल किए बिना गेंदबाज़ी करने की ट्रेनिंग देनी पड़ेगी. अब यह गेंदबाज़ों पर निर्भर करेगा कि वह कैसे अपनी क्षमताओं में सुधार करते है. तेज़ गेंदबाज़ को विकेट से मदद मिलने की स्थिति का लाभ उठाना भी सीखना होगा. ऐसी स्थिति में वह क्या सोच रहा है, क्या करना चाहता है, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा.

वैसे गेंद पर लार लगाने की आदत कितनी महंगी पड़ेगी, और क्या अब थर्ड अम्पायर की भी ज़िम्मेदारी नहीं बढ़ जाएगी, जो पूरे मैदान पर नज़र रखेंगे कि कहीं कोई और खिलाड़ी तो गेंद पर लार नहीं लगा रहा.

इस सवाल पर मदन लाल कहते हैं कि कैमरे के होते कुछ छिप नहीं सकता, बाक़ी खिलाड़ी ध्यान रखें.

लार का विकल्प

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नए नियम को लेकर भारत के पूर्व बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर भी चिंतित हैं. उन्होंने कहा है कि लार के इस्तेमाल के विकल्प पर विचार होना चाहिए. सचिन तेंदुलकर का मानना है कि टेस्ट क्रिकेट में 50 या 55 ओवर के बाद नई गेंद ली जाए. इससे तेज़ गेंदबाज़ को मदद मिलेगी. फ़िलहाल टेस्ट क्रिकेट में 80 ओवर के बाद नई गेंद ली जाती है.

सचिन तेंदुलकर की बात से सहमति जताते हुए मदन लाल मानते हैं कि कई बार गेंद में 70-75 ओवर तक चमक रहती है.

लार से जुड़े नए नियम को लेकर भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ करसन घावरी से भी बीबीसी ने ख़ास बातचीत की. कभी करसन घावरी कपिल देव के जोड़ीदार थे और इस जोड़ी ने 25 टेस्ट मैचों में विरोधी टीम की सलामी जोड़ी को कभी भी 100 रन की साझेदारी नहीं करने दी.

करसन घावरी नए नियम को लेकर कहते हैं कि जल्दी ही आईसीसी कोई नया रास्ता भी तलाश कर लेगी. करसन घावरी मानते हैं कि कपिलदेव स्विंग, यॉर्कर और बॉउसंर करने में माहिर थे और यह एक कला है जिसे सीखना पड़ता है.

कपिल देव की तरह इमरान ख़ान, डेनिसलिली, रिचर्ड हैडली, वसीम अकरम और वर्तमान में मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार, ईशांत शर्मा और जसप्रीत बुमराह इस कला को जानते हैं. अब लार के इस्तेमाल के बिना यह कैसे गेंदबाज़ी करते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा.

करसन घावरी मानते हैं कि नए नियम से बल्लेबाज़ों को थोड़ा फ़ायदा ज़रूर हो सकता है, लेकिन वह यह भी मानते हैं कि इस नियम के बदले कोई ना कोई नया नियम भी आएगा, आईसीसी इस पर ज़रूर विचार करेगी.

वैसे क्रिकेट में गेंद पर चमक लाने के लिए पसीने का भी इस्तेमाल किया जाता है जो अब भी किया जा सकता है , लेकिन वह लार जितना प्रभावी नहीं है. इसके अलावा सर्दियों में या जिन देशों में ठंड होती है, वहां पसीने के इस्तेमाल का भी विकल्प नहीं होगा.

अब यह तो बात रही खिलाड़ियों की, लेकिन एक क्रिकेट समीक्षकों तौर पर अयाज़ मेमन मानते हैं कि परम्परागत तौर पर यह तेज़ गेंदबाज़ों के हाथ बांधने जैसा है कि वह लार का इस्तेमाल नहीं कर सकते.

लार की धार

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सौरभ गांगुली

पिछले 150 साल से तेज़ गेंदबाज़ लार का इस्तेमाल कर रहे हैं. लार के बिना एक तो गेंद पर असर पड़ेगा, दूसरा स्विंग ख़ासकर रिवर्स स्विंग में दिक़्क़त होगी. इतना ही नहीं, इसका मनोवैज्ञानिक दबाव तेज़ गेंदबाज़ों पर पड़ेगा.

अयाज़ मेमन आगे कहते हैं कि इसका विरोध कई तेज़ गेंदबाज़ों ने किया है कि इससे क्रिकेट और भी एकतरफ़ा हो जाएगा. यहां तक कि इसकी शिकायत स्पिनरों ने भी की है.

आजकल आम लैग स्पिनर भी तेज़ गेंद करते हैं और बाज़ूओं का इस्तेमाल करते हैं जिससे अच्छा ख़ासा स्विंग मिलता है. दूसरी तरफ़ कोविड-19 को लेकर मैदान पर कोई चांस नहीं ले सकते.

कुछ ऐसा ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी मानना है. क्रिकेट को अगर फिर से शुरू करना है, तो ख़तरे को भी कम से कम करना होगा. गेंदबाज़ों की यह बदक़िस्मती है लेकिन क्रिकेट दोबारा शुरू हो रहा है.

अयाज़ मेमन मानते हैं कि अगर लार से इतना ही असर गेंदबाज़ों पर पड़ रहा है तो आईसीसी भी सोचे कि कैसे गेंदबाज़ों की मदद की जाए. अब लार के बिना क्या हो, क्या बोतल का ढक्कन जिस पर बहुत विवाद हुआ. वह तो क्रिकेट के नियम के भी ख़िलाफ़ था. ऐसे में वैक्स या वैसलीन का सर्वमान्य प्रयोग हो कि इसके अलावा कुछ और इस्तेमाल ना हो. इसका निर्णय गेंदबाज़ों और फ़ील्डिंग कप्तान पर निर्भर हो जो अंपायर की अनुमति से निश्चित मात्रा में इसका इस्तेमाल करें.

अब देखना है कि आठ जुलाई से जब मेज़बान इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज़ के बीच साउथम्पटन में तीन टेस्ट मैच की सीरीज़ का पहला टेस्ट मैच शुरू होगा तो लार के बिना गेंदबाज़ कितना कामयाब साबित होते है.

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