भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया सिरीज़: पंत, सिराज, सुंदर, शार्दुल और शुभमन की कामयाबी में लगा है घर वालों का ख़ून पसीना

  • आदेश कुमार गुप्त
  • खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
टीम

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बीते मंगलवार को जब बीसीसीआई की चयन समिति ने इंग्लैंड के ख़िलाफ़ होने वाली टेस्ट सिरीज़ के पहले दो टेस्ट मैच के लिए भारतीय टीम का एलान किया तो उसमें ऋषभ पंत, वाशिंगटन सुंदर, मोहम्मद सिराज, शार्दूल ठाकुर और शुभमन गिल का नाम भी शामिल था.

यह वही खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपने जीवट के दम पर भारत को ऑस्ट्रेलिया में खेली गई चार टेस्ट मैच की सिरीज़ में 2-1 से जीत दिलाने में अपना अहम योगदान दिया. भले ही आज यह सब खिलाड़ी आईपीएल जैसे क्रिकेट के सबसे छोटे प्रारूप की देन हैं लेकिन इन्होंने टेस्ट क्रिकेट में इतने ऊँचे मापदंड स्थापित किए कि आज यह सबकी आँख का तारा बन गए हैं.

आख़िरकार टेस्ट क्रिकेट ही तो क्रिकेट की असली परीक्षा है जिसकी आग में तपकर यह सोना बनकर उभरे. भारतीय टीम ने अजिंक्य रहाणे की कप्तानी में ऋषभ पंत, वाशिंगटन सुंदर, मोहम्मद सिराज, शार्दुल ठाकुर और शुभमन गिल के दम पर ब्रिसबेन में जो एतिहासिक जीत हासिल की उसे देखकर पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ने कहा कि जब अजिंक्य रहाणे ने गावस्कर-बॉर्डर ट्रॉफ़ी अपने हाथों में उठाई तो उनकी आंखो से आंसू निकल पड़े. गा

वस्कर की यह भावपूर्ण टिप्पणी करोड़ों भारतीयों खेल प्रेमियों की भी भावनाओं की अभिव्यक्ति थी. वैसे गाबा में मिली जीत में सभी खिलाड़ियों का योगदान था लेकिन पंत, सुंदर, सिराज, शार्दुल और गिल का योगदान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इन्होंने अपनी क्षमता से भी बेहतर प्रदर्शन किया, वह भी विपरीत परिस्थितियों में कम अनुभव के होते हुए.

अब जो भी इन्होंने और भारतीय टीम ने किया वह इतिहास के सुनहरे पन्नो में समा गया है, लेकिन जिस राह पर चलकर पंत, सुंदर, सिराज, शार्दूल और गिल ने भारतीय टीम में जगह बनाई उसकी कहानी भी कम दिलचस्प नही है. कोई अपना शहर और घर छोड़कर आंखों में सपने लिए दूसरे शहर पहुँचा तो किसी के पिता ने अपना सब कुछ बेटे को क्रिकेटर बनाने के लिए दांव पर लगा दिया, तो किसी के पिता की आँखें बेटे की कामयाबी देखने से पहले ही बंद हो गई तो किसी को टीम में तब जगह मिली जब दूसरे खिलाड़ी नाकाम हो गए.

ऐसे में खिलाड़ी अपनी जगह बचाने के लिए खेले या परिस्थितियों के विपरीत अपना स्वभाविक खेल खेले? अंततः इन सभी खिलाड़ियों ने अपने खेल से ही सभी सवालों के जवाब दिए. अब यह जानना बेहद ज़रूरी है कि कैसे इन्होंने अपने सपनों को साकार किया वह भी क्रिकेट के दीवाने देश भारत में जहॉ यह खेल धर्म की तरह पूजा जाता है.

ऋषभ पंत रुड़की से दिल्ली आए, गुरूद्वारे में सोए

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ऋषभ पंत की कहानी ज़ीरो से हीरो बनने वालों की है. जिन ऋषभ पंत का नाम आज सबकी ज़ुबान पर है उनके तो चयन तक पर सवाल थे. ऑस्ट्रेलिया में खेली गई एकदिवसीय और टी-20 सिरीज़ में उन्हें जगह नहीं मिली.

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टेस्ट सिरीज़ में उन्हें दूसरे टेस्ट मैच में मौक़ा मिला लेकिन कैच टपकाने के कारण सबकी आंख की किरकिरी बन गए. उनकी बल्लेबाज़ी क्षमता और बेख़ौफ़ खेलने के कारण उन्हें बाकी मैचों में भी अवसर मिला और उन्होंने निराश भी नहीं किया. विकेटकीपर बल्लेबाज़ के तौर पर वह ऑस्ट्रेलिया में पिछले दौरे में शतक लगा चुके थे. उनकी कामयाबी पर उनके कोच द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता तारक सिन्हा बेहद ख़ुश हैं.

तारक सिन्हा इससे पहले आशीष नेहरा, अजय शर्मा, अतुल वासन और आकाश चोपड़ा जैसे क्रिकेटर देश को दे चुके हैं लेकिन पंत को तारक सिन्हा तक पहुँचने के लिए अपने पैतृक घर रुड़की को छोड़ना पड़ा. ऋषभ पंत के पिता राजेंद्र पंत ख़ुद क्रिकेट खेला करते थे तो भला पंत बैट से कैसे दूर रहते. पिता भी चाहते थे कि बेटा क्रिकेटर बने. रूड़की में खेलने के सीमित अवसर थे, जिसके बाद सलाह मिली कि दिल्ली जाकर खेलो. इसके बाद वह रात में दो बजे की बस पकड़कर दिल्ली आते और छह घंटे के सफ़र के बाद अभ्यास करते. आख़िरकार इनके कोच तारक सिन्हा जो अपना कोचिंग कैंप दिल्ली में मोती बाग में चलाते हैं उसके पास ही एक गुरुद्वारा था जहॉ उन्होंने अपने संबंधों का इस्तेमाल करते हुए वहां पंत के रहने ठहरने की व्यवस्था की.

दिल्ली की टीम में अपनी जगह बनती ना देख ऋषभ पंत ने राजस्थान का रूख़ भी किया लेकिन बात बनी नहीं और वह वापस दिल्ली लौट आए. पंत के संघर्ष का यह सिलसिला केवल बारह साल की उम्र से शुरू हुआ. आख़िर उन्हें दिल्ली की अंडर-19 टीम में असम के ख़िलाफ़ खेलने का अवसर मिला. पंत ने दूसरी पारी में 150 रन की धमाकेदार पारी खेली और उसके बाद उनके रास्ते आसान होते चले गए.

साल 2016-17 के रणजी सीज़न में उन्हें जब खेलने का मौक़ा मिला तो उन्होंने एक मैच में महाराष्ट्र के ख़िलाफ़ 308 रन बनाकर सबका ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित किया. पंत ने झारखंड के ख़िलाफ़ केवल 48 गेंदों पर शतक बनाया. इसके अलावा उन्होंने साल 2017-18 में ज़ोनल टी-20 में हिमाचल प्रदेश के ख़िलाफ़ केवल 32 गेंदों पर 100 रन बनाए. उनके तेवर देखते हुए साल 2016 में जब आईपीएल की नीलामी में दिल्ली डेयरडेविल्स ने पंत को एक करोड़ नब्बे लाख रूपये में ख़रीदा तो उस दिन छह फरवरी को वह अंडर -19 विश्व कप भी खेल रहे थे और सेमीफ़ाइनल में शतक बनाने में भी कामयाब रहे.

साल 2017 में ऋषभ पंत को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टी-20 सिरीज़ में खेलने का अवसर मिला. आज आईपीएल में ऋषभ पंत की क़ीमत 15 करोड़ है और वह दिल्ली कैपिटल्स से खेलते हैं. ऋषभ पंत अभी तक 16 टेस्ट मैच में 1088, 16 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में 374 और 27 टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 410 रन बना चुके हैं. ऋषभ पंत जब तक अपनी विकेटकीपिंग में सुधार नहीं कर लेते तब तक यह बहस चलती रहेगी कि वह टीम में बतौर बल्लेबाज़ खेलें या विकेटकीपर बल्लेबाज़. जो भी हो ऋषभ पंत ने अपने पिता और अपने ख़ुद के सपने को पूरा तो किया है.

एक कान से सुन सकते हैं वाशिंगटन सुंदर

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वाशिंगटन सुंदर यूं तो 21 टी-20 और एक एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेल चुके हैं लेकिन उनके नाम की गूंज तो टेस्ट मैच में ही गूंजी जहां उन्होंने ब्रिसबेन में चार विकेट लेने के अलावा दोनों पारियों में कुल मिलाकर 84 रन भी बनाए.

पहली पारी में उन्होंने 62 रन बनाए और दूसरी पारी में तेज़तर्रार 22 रन बनाकर दूसरे छोर पर खेल रहे ऋषभ पंत को भी संदेश दे दिया कि भाई अब ड्रा के लिए नहीं जीत के लिए खेलो. वाशिंगटन सुंदर का सपना भी सबकी तरह भारत के लिए खेलना रहा है और पूरा भी हुआ है लेकिन अपनी कामयाबी की दास्तान वह सिर्फ़ एक कान से सुनते हैं.

जब वह केवल चार साल के थे तब इस बीमारी का पता उनके घरवालों को चला, बाद में बहुत इलाज भी हुआ लेकिन कामयाबी नहीं मिली. समय बीतता गया और वाशिंगटन सुंदर ने इसके साथ ही जीना सीख लिया. वाशिंगटन सुंदर मानते हैं कि इस बीमारी से उन्हें फिल्डिंग करने में परेशानी होती है क्योंकि साथी खिलाड़ियों के दिशानिर्देश उन्हें मिलते हैं. वाशिंगटन सुंदर को इस बात की ख़ुशी है कि सभी खिलाड़ी उनकी इस समस्या को जानने के बाद उनका पूरा साथ देते हैं.

उनके नाम की भी दिलचस्प कहानी है. उनके पिता ने उनका नाम अपने ख़ास जानकार पीडी वाशिंगटन के नाम पर रखा जो क्रिकेट के शौक़ीन थे. साल 1999 में उनका निधन हो गया और उसी साल सुंदर का जन्म हुआ और पिता ने साथ में वाशिंगटन भी जोड़ दिया.

वाशिंगटन सुंदर अपनी कामयाबी का श्रेय अपने पिता और अपने कोच को देते हैं. सुंदर खब्बू बल्लेबाज़ हैं और सीधे हाथ के ऑफ स्पिनर हैं. तमिलनाडु में जन्मे सुंदर केवल 21 साल के हैं और वह एक बल्लेबाज़ के तौर पर अंडर-19 विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट भी खेल चुके है.

21 टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेलकर 18 विकेट उन्होंने गेंदबाज़ी में फ़िर भी दमख़म दिखाया. लेकिन केवल 26 रन का बल्ले से निकलना यक़ीन नहीं दिलाता कि वाशिंगटन सुंदर ने ब्रिसबेन में पैट कमिंस, जोश हैज़लवुड और मिचेल स्टार्क की उछलती और बाउंस लेती गेंदों का सामना करते हुए पहले ही टेस्ट मैच में पहली पारी में 64 रन बना गए. अक्सर वहीं कहानी अच्छी लगती है जिसमें रोमांच हो. वाशिंगटन सुंदर की कहानी ज़माना देख रहा है और सुन भी रहा है. वाशिंगटन सुंदर के पिता ख़ुद भी एक क्रिकेटर रहे है और उन्होंने सुंदर को एमआरएफ पेस एकेडमी में भी प्रशिक्षण दिलाया. साल 2013 में वाशिंगटन सुंदर ने तमिलनाडु क्रिकेट संघ का साल का सर्वश्रेष्ठ स्कूल क्रिकेटर का पुरस्कार भी जीता. जिस उम्र में बच्चे सोते हुए सपने देखते हैं उस उम्र में वाशिंगटन सुंदर अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए दिन रात एक कर रहे थे.

काश मोहम्मद सिराज के पिता कामयाबी देख पाते

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26 दिसंबर 2020 को मेलबर्न में दूसरे टेस्ट मैच के शुरू होने से पहले भारत और ऑस्ट्रेलिया की टीमें जब राष्ट्रगान के लिए मैदान में खड़ी थी तब अचानक कैमरे की निगाह भारत के तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद सिराज के चेहरे पर ठहर गई.

मोहम्मद सिराज अपना पहला टेस्ट मैच खेल रहे थे, थोड़ी देर पहले ही उन्हें टेस्ट कैप मिली थी. सबने देखा कि राष्ट्रगान के दौरान उनका चेहरा आंसुओं से भीग रहा है. शायद यह देश के लिए खेलने की ख़ुशी के आंसू थे लेकिन बाद में ख़ुद मोहम्मद सिराज ने कहा कि काश उनके अब्बूजान इस मंज़र को देखने के लिए ज़िंदा होते. दरअसल जब भारतीय टीम आईपीएल के बाद सीधे ऑस्ट्रेलिया रवाना हो गई थी तब टीम के साथ मोहम्मद सिराज भी थे और वहीं उन्हें यह दुखद समाचार मिला कि उनके पिता मोहम्मद ग़ौस का निधन हो गया है. यह 20 नवंबर की बात है. बीसीसीआई और टीम प्रबंधन ने उन्हें वापस भारत लौटने की सलाह भी दी लेकिन सिराज वापस नहीं लौटे.

अपने पिता का सपना पूरा करने के लिए आंसूओं का सैलाब आँखो में थामे वहीं टीम के साथ रूक गए, लेकिन जब मौक़ा पाकर मैदान में उतरे तो आंसूओं का बाँध टूट गया. इसके बावजूद उन्होंने पूरी सिरीज़ में अपनी भावनाओं पर क़ाबू पाते हुए ज़बरदस्त तेज़ गेंदबाज़ी की. तीन टेस्ट मैच में 13 विकेट लेकर सिराज ने भारत की टेस्ट जीत में अपनी अहम भूमिका निभाई. सिराज ने ब्रिसबेन में दूसरी पारी में पांच विकेट झटके.

मोहम्मद सिराज के भाई इस्माइल सिराज और पूरे परिवार का सीना भी तब गर्व से फूल गया जब सिराज भारत के लिए खेलने उतरे. इस्माइल सिराज ने कहा कि मोहम्मद सिराज ने पिता का सपना पूरा कर दिया. मोहम्मद सिराज के पिता मोहम्मद ग़ौस हैदराबाद की सड़कों पर ऑटोरिक्शा चलाते थे लेकिन उन्होंने सिराज का हर कदम पर साथ दिया. केवल यह जानना ही काफ़ी है कि कोई पिता अपने परिवार को पालने के लिए ऑटोरिक्शा चलाते हुए ज़िंदगी की जद्दोजहद से लड़े या अपने बेटे के खेलने के ख़्वाब को पूरा करे.

वैसे तो मोहम्मद सिराज साल 2017 में ही न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ अपना पहला टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेल चुके थे और अपने पिता के सपने को पूरा कर चुके थे लेकिन उन्हें खोकर सिराज को शायद अहसास हुआ कि उनके सपने को पूरा करने की कितनी बड़ी क़ीमत उनके पिता ने चुकाई.

अपनी मेहनत, मज़बूत क़द काठी और 150 की गति से लगातार गेंद करने की क्षमता के चलते 2015 में सिराज का चयन हैदराबाद की रणजी टीम में हो गया. अगले साल ही मोहम्मद सिराज ने 41 विकेट लेकर हैदराबाद के लिए एक सीज़न में सर्वाधिक विकेट लेने का रिकार्ड बनाया. फ़रवरी 2017 में आईपीएल की नीलामी में मोहम्मद सिराज को सनराइज़र्स हैदराबाद ने 2.6 करोड़ रूपये में ख़रीदा.

यह कल्पना से परे है कि कैसे मोहम्मद सिराज लैदर बॉल से भी कमाल की गेंदबाज़ी करते हैं जबकि उनका शुरुआती क्रिकेट जीवन टेनिस बॉल से गेंदबाज़ी करते हुए बीता. मोहम्मद सिराज मुसीबत और मुश्किलों से लड़ने का नाम है. मोहम्मद सिराज अब आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के लिए खेलते हैं जिसके कप्तान विराट कोहली यह कहते हुए सुनाई दिए मियाँ बहुत अच्छे. बहुत अच्छे सिराज.

खेत से लेकर क्रिकेट के मैदान तक का शार्दुल ठाकुर का सफ़र

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ब्रिसबेन में दूसरी पारी में जब शार्दुल ठाकुर ने चार विकेट लिए तो वह जैसे छा गए. हालाँकि उन्होंने पहली पारी में भी तीन विकेट हासिल किए थे और बल्लेबाज़ी करते हुए 67 रन भी बनाए थे. उनके इस आलराउंडर प्रदर्शन को देखकर कुछ क्रिकेट समीक्षकों को कपिल देव की याद तक आ गई.

शार्दुल ठाकुर को मैच से पहले उनके पिता की सलाह मिली-जल्दबाज़ी मत करना, टेस्ट क्रिकेट है आराम से खेलना. लेकिन जब सिरीज़ दांव पर हो तो भला आराम कहां मिले. शार्दुल ने बैट और बॉल दोनों के साथ बहुत मेहनत की. मुंबई से 87 किलोमीटर दूर एक गॉव है माहिम केलवा. पिता खेती बाड़ी करते हैं और शायद ही किसी ने सोचा हो कि शार्दुल क्रिकेटर बनेंगे, लेकिन कई बार क़िस्मत भी साथ देती है.

शार्दुल ठाकुर को क्रिकेट कोच दिनेश लाड ने साल 2006 में स्कूल क्रिकेट में खेलते देखा. उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर दिनेश लाड ने उनके पिता को सलाह दी कि गांव से मुंबई आकर खेलना आसान नहीं है, तीन घंटे लगते हैं क्यों ना शार्दुल उन्हीं के घर में रहकर अभ्यास करे. कुछ दिन सोच विचार कर शार्दुल के पिता ने हां कर दी. घर से दूर रहकर भी क्रिकेट के प्रति लगन रंग लाई और साल 2012 में शार्दुल का चयन प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलने के लिए हो गया. मुंबई के लिए खेलने का लाभ शार्दूल को इस रूप में हुआ कि कई नामचीन खिलाड़ियों के टीम में रहने से प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने की चुनौती सदा रहती है जो भविष्य में काम आती है.

साल 2015-16 में शार्दुल ठाकुर ने रणजी ट्रॉफ़ी में 48 विकेट हासिल किए. साल 2015 में वह किंग्स इलेवन पंजाब के लिए आईपीएल खेले. उन्हें तब बीस लाख रूपये मिले थे. शार्दुल ठाकुर अभी तक दो टेस्ट मैच, 12 एकदिवसीय और 16 टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेल चुके हैं. शार्दुल ठाकुर की उम्र 29 साल को पार कर चुकी है और भविष्य में उन्हें युवाओं से मिलने वाली चुनौती का सामना करना पड़ेगा. जो भी हो खेत खलिहान से निकलकर क्रिकेट के मैदान तक का सफ़र अब तक तो शानदार ही रहा है.

शुभमन के लिए पिता ने किराये पर लिया मोहाली में घर

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ब्रिसबेन में जब भारतीय टीम जीत के लिए 328 रन के लक्ष्य को सामने रखकर मैदान में उतरी तो बुनियादी शुरूआत के लिए उम्मीद तो रोहित शर्मा से थी लेकिन उस पर खरा उतरे शुभमन गिल. रोहित शर्मा केवल सात रन बना सके लेकिन शुभमन गिल ने 91 रन बनाकर जीत की नींव डाल दी. शुभमन गिल केवल इक्कीस साल के है और जिस अंदाज़ में वह खेलते हैं उसे देखते हुए उन्हें भविष्य का खिलाड़ी माना जा रहा है.

शुभमन गिल अभी तक पंजाब, इंडिया अंडर-19, इंडिया अंडर- 23, इंडिया-ए, इंडिया-बी और आईपीएल में कोलकाता नाइटराइडर्स के लिए खेल चुके हैं. बीते आईपीएल में उन्होंने 14 मैच खेलकर 440 रन बनाए. वह ऑस्ट्रेलिया दौरे में मयंक अग्रवाल और पृथ्वी शॉ के सलामी बल्लेबाज़ के तौर पर नाकाम रहने के बाद टीम में जगह बनाने में कामयाब हुए. उनकी तकनीक बहुत शानदार है और वह विकेट के दोनों तरफ़ शॉट खेलने की क्षमता रखते हैं, वह भी पुल और हुक जैसे शॉट्स के साथ.

ऑस्ट्रेलिया में उन्होंने तीन टेस्ट मैच खेलकर 259 रन बनाए. शुभमन गिल पहली बार तब चर्चा में आए जब साल 2018 में उन्होंने अंडर-19 विश्व कप में 104.50 की औसत से 418 रन बनाए. शुभमन गिल की कामयाबी में दूसरे खिलाड़ियों की तरह उनके पिता लखविन्द्र सिंह का हाथ है. बेटे को अंतराष्ट्रीय क्रिकेट तक पहुँचाने के लिए उन्होंने फाज़िल्का में बने घर को छोड़कर मोहाली में किराये का घर लिया ताकि शुभमन को पीसीए स्टेडियम में खेलने का मौक़ा आसानी से मिल सके.

आख़िरकार साल 2016 में उन्हें पंजाब के लिए अंडर-16 में खेलने का अवसर मिला. अगले साल ही गिल रणजी ट्रॉफ़ी भी खेले बंगाल के ख़िलाफ़ अर्धशतक भी जमाया.

शुभमन गिल तीन एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच भी खेल चुके हैं. शुभमन गिल के पिता लखविन्द्र सिंह सिंह चाहते है कि वह और भी शानदार प्रदर्शन करे. बेटे की कामयाबी को अपनी आँख से देखते पिता अगर ऐसा सोचते हैं तो बुरा क्या है. इन युवा खिलाड़ियों की कामयाबी में घरवालों का भी ख़ून पसीना है.

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