पाकिस्तान की जीत के मायने

  • 30 जून 2009

क्रिकेट के मैदान पर मिलने वाली जीत के मायने सिर्फ़ क्षमता और खेल के क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन से भी कहीं बढ़कर हो सकते हैं, ये एक बार फिर टी-20 विश्व कप में पाकिस्तान की जीत ने दिखा दिया है.

Image caption पाकिस्तान की जीत ख़ास तौर पर इसलिए मनाई जानी चाहिए क्योंकि क्रिकेट के लिए इसके बड़े मायने हैं.

अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा एक देश जब भी विश्व मंच पर इस तरह अच्छा प्रदर्शन करता है तो ऐसी जीत आशा और मुक्ति की कहानी बन जाती है और खेल अचानक समाज की सभी बीमारियों और ग़लत चीज़ों के लिए रामबाण बन जाता है. भारत और पाकिस्तान हमेशा से दोनों देशों के बीच की खाई को पाटने वाले पुल के रूप में क्रिकेट की कूटनीति का इस्तेमाल करते आए हैं. मगर ऐसे में फ़ायदे के बावजूद क्रिकेट की भूमिका बहुत छोटी है. और जो भूमिका क्रिकेट या उसके खिलाड़ियों की नहीं है वो उसे एक हद से ज़्यादा दे देना, ख़तरनाक भी हो सकता है.

जीत का जश्न

निश्चय ही पाकिस्तान की जीत कई वजहों से मनाई जानी चाहिए और ख़ास तौर पर इसलिए क्योंकि क्रिकेट के लिए सके इसके बड़े मायने हैं. दुनिया से किनारा कर लेने के बावजूद पाकिस्तान के प्रदर्शन ने एक बार फिर इस बात पर ज़ोर दिया है कि राजनीतिक कारणों से अगर पाकिस्तान को अलग-थलग किया गया तो इससे बड़ा नुक़सान खेल को ही होगा.

हाँ, ये तर्क कोई नहीं दे सकता कि चूँकि पाकिस्तान अब विश्व चैंपियन बन गया है इसलिए क्रिकेट खेलने वाले देशों को पाकिस्तान जाना शुरू कर देना चाहिए. हम बहुत ख़तरनाक समय में रह रहे हैं, जहाँ गोली ही विरोध करने या उसे शांत करने का प्रभावशाली तरीक़ा बनती जा रही है. ऐसे समय में कोई भी सुरक्षित नहीं है, यहाँ तक की खिलाड़ी भी नहीं. लाहौर में श्रीलंका की टीम पर हुए हमले ने इसे दिखा दिया है.

Image caption आज हम जिसे अच्छी रणनीति समझते हैं वही अगले दिन हार की वजह बन जाती है.

मगर ये मानना कि लॉर्ड्स में पाकिस्तान की जीत के बाद दुनिया को देखने का हमारा नज़रिया ही बदल जाएगा तो ये एक जटिल मसले पर बहुत ही बचकाना प्रतिक्रिया होगी. हमें जीत का जश्न उसकी असली वजह के कारण मनाना चाहिए. ये दिखाता है कि झटकों के बावजूद पाकिस्तानी क्रिकेटरों में उस खेल के लिए अब भी जुनून है, जिसमें वे बेहद प्रतिभाशाली हैं और अगर वे क्रिकेट दुनिया से अलग कर दिए गए तो प्रशंसकों के लिए वो बेहद दुखद दिन होगा.

प्रतिभावान खिलाड़ी

इस दुनिया के शाहिद आफ़रीदियों और उमर गुलों ने बेहद सटीक प्रदर्शन के ज़रिए हमें याद दिलाया है कि हमें भी उनकी उतनी ही ज़रूरत है जितनी उन्हें हमारी. इसके अलावा क्रिकेट जगत को भी उनकी उतनी ही ज़रूरत है जो लगातार कोशिशें करने के बावजूद अपना आधार नहीं बढ़ा पा रहा है. ऐसा लगता ही नहीं कि क्रिकेट जगत में ज़िम्बाब्वे कहीं है भी और बांग्लादेश ऐसी स्थिति में पहुँच गया है कि अगर उससे टेस्ट खेलने वाले देश का दर्जा छीन भी लिया जाए तो शायद ही कोई आँसू गिरेगा. पाकिस्तान की जीत इस बात की ओर भी इशारा करती है कि खेल के इस सबसे छोटे रूप में कोई भी टीम ख़िताब की सबसे प्रबल दावेदार नहीं मानी जा सकती. क्रिकेट प्रशंसक और विशेषज्ञ इसके गूढ़ को समझने में अब भी लगे हुए हैं. आज हम जिसे अच्छी रणनीति समझते हैं वही अगले दिन हार की वजह बन जाती है. दुनिया अब भी वह तरीक़ा ढूँढ़ने की कोशिश में लगी है जिसकी वजह से प्रशंसकों को खेल का आकलन करने और कोच को रणनीति बनाने में मदद मिल सकेगी. इस विश्व कप ने ट्वेन्टी- 20 के वायरस को हमारे ख़ून में पहुँचा दिया है और ऐसे प्रशंसक जो क्रिकेट का यही तुरत-फुरत स्वरूप देखने के आदी हो चुके होंगे उनके लिए पाँच दिन तक चलने वाले टेस्ट मैच का स्वाद लेना ज़रा मुश्किल होगा. क्रिकेट की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई है और हमारे जैसे शुद्धतावादी अब अपना रास्ता नाप सकते हैं. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

संबंधित समाचार