सहवाग की चोट पर इतना बवाल!

वीरेंद्र सहवाग
Image caption वीरेंद्र सहवाग कंधे में चोट के चलते टी-20 विश्व कप से बाहर हो गए

मांसपेशी की चोट ने भारतीय क्रिकेट जगत को हिलाकर रख दिया. एक ऐसा भूचाल जो जिसने मीडिया में टी-20 क्रिकेट विश्व कप से अधिक सुर्खियां बटोरी.

बात भारतीय टीम के विस्फोटक बल्लेबाज़ वीरेंद्र सहवाग की कंधे की चोट और उसके बाद टीम से उनकी रुख़सती की हो रही है.

उनकी चोट को लेकर तमाम बातें हो रही हैं. क्या उन्होंने जान-बूझकर अपनी चोट छिपाई? क्या उन्होंने टीम में दरार डालने की कोशिश की ?

ये और कई और ऐसे सवाल हैं जिनसे भौहें तनती हैं और भीड़ के साथ चलने वाली हमारी मानसिकता को एक शिकार मिल जाता है.

आरोप-प्रत्यारोप

ये पूरा नाटकीय घटनाक्रम में महेंद्र सिंह धोनी का व्यवहार देखने लायक था, जब उन्होंने मीडिया में छपी ख़बरों का खंडन करने के लिए पूरी की पूरी टीम और यहां तक कि सपोर्ट स्टाफ़ की भी मीडिया के सामने परेड करवा दी.

और ये सब ये साबित करने के लिए सब कुछ ठीक है और टीम में किसी तरह की गुटबाज़ी नहीं है. धोनी तो एक टेलीविज़न पत्रकार से भी उलझ गए, लेकिन उनका कद और लोकप्रियता ऐसी है कि कोई भी उनकी आलोचना करने की हिम्मत नहीं कर सका.

अब सहवाग को ये तो मान ही लेना चाहिए कि वो अगले कुछ महीनों तक क्रिकेट नहीं खेल पाएँगे, साथ ही उन्हें विरोधी मीडिया से भी पार पाना होगा.

सही, गलत की इस दुनिया में बीच के रास्ते की कोई जगह नहीं है, ख़ासकर जब मामला खिलाड़ियों से जुड़ा हुआ हो.

मुझे नहीं पता कि सहवाग ने अपनी चोट छिपाई या नहीं. न ही मैं इस बारे में कुछ कह सकता हूँ कि उनकी वजह से टीम में दरार पैदा हुई या नहीं.

दूसरों की तरह मैं भी जानता हूँ कि सहवाग विश्व कप से पहले ही घायल हो गए थे और यही वजह थी कि वो वार्म-अप मैच नहीं खेल सके थे.

कोई भी कप्तान सहवाग जैसे खिलाड़ी की चोट सही होने का इंतज़ार करेगा, फिर चाहे ये इंतज़ार सामान्य तौर से अधिक ही क्यों न हो. सहवाग जैसे खिलाड़ी टीम की रणनीति का मुख्य केंद्र होते हैं और उनकी ग़ैरमौजूदगी बड़े नुक़सान की वजह बन सकती है.

सहवाग का विश्व कप से बाहर होना टीम और दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसकों के लिए ख़राब है.

दोषी कौन

Image caption टीम में गुटबाज़ी की ख़बर से धोनी नाराज़ हैं

अगर आरोप-प्रत्यारोप का ये खेल देखें तो पहली उंगली टीम के सपोर्ट स्टाफ पर उठती है. इस स्टाफ में वे लोग शामिल होते हैं जो खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते हैं, उनका उपचार करते हैं और यहां तक कि उनकी चोट का पता भी लगाते हैं.

बोर्ड भी कम दोषी नहीं है जिसने ऐसा कार्यक्रम बनाया है जिसमें क्रिकेटरों के पास आराम या अपना उपचार कराने का समय तक नहीं है.

भारतीय टीम को इस मायने में खुद को खुशनसीब मानना चाहिए कि न्यूज़ीलैंड दौरे के तुरंत बाद इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने के बावजूद उसके एक ही अहम खिलाड़ी को गंभीर चोट आई. अगर और भी खिलाड़ी घायल होते तो शायद ही किसी को इस पर हैरानी होती.

अगर हम ये भी मान लें कि सहवाग इस उम्मीद में अपनी चोट छिपा रहे थे कि टी-20 विश्व कप खेल सकें, तब भी क्या ये इतना बड़ा गुनाह है जितना कि इसे पेश किया गया.

मैं कुछ ऐसे सनसनीखेज़ टेलीविज़न चैनलों को जानता हूँ जिन्होंने अपने एंकर और रिपोर्टरों से कहा है कि वे क्रिकेट की ख़बरों को क्राइम की ख़बरों की तरह से कवर करें. इसके लिए उन्हें किसी को बलि का बकरा बनाना होता है और बदक़िस्मती से पिछले हफ़्ते वो ‘बकरा’ सहवाग थे.

(लेखक प्रदीप मैगज़ीन अंग्रेज़ी अख़बार 'हिंदुस्तान टाइम्स' के खेल सलाहकार हैं)

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