कांस्य पदक वालों की फ़िक्र किसे

  • 25 जुलाई 2009

व्यवस्था में ज़रूर कोई बड़ी ग़लती है, जिसके कारण क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों में भारत की असाधारण उपलब्धि को पहचान नहीं मिलती.

Image caption विजेंदर ने बीजिंग ओलंपिक में कांस्य जीता था

जब बीजिंग ओलंपिक में भारत ने एक स्वर्ण और दो कांस्य पदक जीते, तो देश जैसे दीवाना हो गया. इसके बाद जो उत्सव मना, वो भले ही कुछ ज़्यादा था. लेकिन इसे सही ठहराने की पूरी वजह थी.

अभिनव बिंद्रा का इतना बड़ा सम्मान हुआ, जैसा किसी क्रिकेटर के अलावा किसी का नहीं होता. साथ ही मुक्केबाज़ सुशील कुमार और विजेंदर सिंह को भी सम्मानित किया गया.

कुछ समय के लिए क्रिकेट पृष्ठभूमि में चला गया था. क्योंकि हर टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया में इन खिलाड़ियों की उपलब्धि गाथाओं को जगह दी जा रही थी.

ये भी बताया जा रहा है कि कैसे इन एथलीटों ने विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष किया और विजेता बनकर लौटे.

उत्साह

उस समय ऐसा लग रहा था कि देश में खेल क्रांति हो गई है और भारत सिर्फ़ एक खेल वाले देश की छवि को ख़त्म कर सकेगा.

Image caption सुशील कुमार का नाम पुरस्कारों की सूची से ग़ायब है

एकाएक भारत के भौगोलिक नक्शे पर भिवानी खोज लिया गया और उसे जैसे धार्मिक स्थल का दर्जा दे दिया गया.

सुशील कुमार के गृह नगर नजफ़गढ़ को भी वही दर्जा मिलता, लेकिन वीरेंदर सहवाग पहले ही इसे वो दर्जा दिला चुके थे.

आप उन चेहरों पर भी गर्व के भाव देख सकते थे, जो ये मानते हैं कि खेल समय की बर्बादी है.

लेकिन सामान्य स्थिति बहाल होने में बहुत ज़्यादा समय नहीं लगा और एक बार फिर क्रिकेट केंद्र में आ गया.

इतना कि पद्म पुरस्कार विजेताओं में न तो विजेंदर सिंह हैं न ही सुशील कुमार. इनके बदले इस सूची में हैं- महेंद्र सिंह धोनी और हरभजन सिंह.

हक़दार

क्रिकेट पर लिखने और उसका लगातार अनुसरण करने वाले समुदाय का होने के नाते मैं ये नहीं कह रहा कि धोनी और हरभजन इस सरकारी सम्मान के हक़दार नहीं.

लेकिन एक ऐसे साल में जब हमने क्रिकेट के अलावा किसी और खेल में अपना जलवा दिखाया, ये अन्यायपूर्ण लगता है कि दो ओलंपिक कांस्य पदक विजेताओं की अनदेखी की गई.

लेकिन उद्योग जगत, मीडिया और जनता का दुलार पाने वाले क्रिकेटर इन पुरस्कारों के बारे में क्या सोचते हैं, ये तब और स्पष्ट हो जाता है जब वे पुरस्कार समारोह में हिस्सा नहीं लेते.

और भी बुरी बात ये कि वे खेल मंत्रालय को ये बताना भी ज़रूरी नहीं समझते कि वे बहुत व्यस्त होने के कारण समारोह में शिरकत नहीं कर सकते.

व्यवहार

जिस तरह हम अपने क्रिकेटरों के साथ व्यवहार करते हैं, ये उनकी ग़लती नहीं जब वे यह सोचना शुरू कर दें कि भारत उनका है न कि वे भारत के.

Image caption अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक जीता था

इसलिए इसे यहीं छोड़ते हैं और इस व्यंग्यात्मक ताने को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं. लेकिन सवाल तो बना हुआ है कि विजेंदर और सुशील की अनदेखी क्यों हुई?

उनका नाम देश के सबसे बड़े खेल सम्मान खेल रत्न में नहीं है. ये है तो परेशानी में डालने वाली बात लेकिन इसकी एक रोचक व्याख्या भी है.

हम अपने को सुपरपॉवर की तरह व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं. अमरीका में स्वर्ण पदक जीतना एक मानक है अपवाद नहीं.

तो कांस्य पदक जीतने वालों को कौन याद करता है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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