क्रिकेटरों की बात समझिए

  • 8 अगस्त 2009

पिछले सप्ताह भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ चली आलोचना की बयार से मैं थोड़ा असमंजस में पड़ गया हूँ.

Image caption खिलाड़ी डोप टेस्ट के लिए तैयार हैं

वाडा के विवादित प्रावधान के गुण-दोष पर बहस की बजाए मीडिया हो या खिलाड़ी- सभी ने एक सुर में क्रिकेटरों की आलोचना की है और ऐसी धारणा बनाई जा रही है कि खिलाड़ी डोप टेस्ट के लिए तैयार नहीं हैं.

मेरा मानना है कि यह बड़ा अन्यायपूर्ण है. जब वाडा ने इस विवादित प्रावधान को जोड़ा था, उस समय ज़्यादातर फ़ेडरेशन और खिलाड़ियों को इस पर शक था.

कई खिलाड़ियों को अब भी इस पर संदेह है. हालाँकि कई लोगों ने इसे मान लिया है, कुछ ने मजबूरी में तो कुछ ने अपनी इच्छा से.

जब वाडा के इस विवादित प्रावधान पर दुनियाभर की मीडिया में बहस चल रही है, उस समय भारत जैसे इस पर मौन था.

संकट

लेकिन जब विरोध में क्रिकेटरों ने अपनी आवाज़ उठाई, तो हममें से ज़्यादातर ने अपने को ईमानदार समझते हुए घृणा के साथ उन्हें अड़ियल, अज्ञानी और स्वार्थी की संज्ञा दे डाली.

ये सच है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड की इस बात के लिए आलोचना होनी चाहिए कि उन्होंने आख़िरी क्षण में खिलाड़ियों की चिंता पर ध्यान दिया. जिस कारण संकट जैसी स्थिति पैदा हुई है.

लेकिन ये एक अलग तरह की बहस का विषय है. इस समय हमें सिर्फ़ खिलाड़ियों की 'निजी ज़िंदगी में दख़ल वाले प्रावधान' पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

क्या ये अजीब बात नहीं है कि जब भारतीय क्रिकेट बोर्ड अंपायरिंग की ग़लतियों और अपने खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ मैच रेफ़री के फ़ैसलों पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) से दो-दो हाथ कर रहा था, उस समय मीडिया बोर्ड के साथ खड़ी थी.

उस समय मीडिया ने इसकी भी परवाह नहीं की कि अंतरराष्ट्रीय संस्था से 'न्याय' पाने की आस में कहीं नियम तो नहीं तोड़े जा रहे हैं.

उस समय ये लड़ाई 'हम प्रताड़ित' और 'वे नस्लवादी' के बीच हो गई थी. अंधदेशभक्ति की आड़ में हम एकजुट हो गए थे और खेल के नियमों की परवाह नहीं की. और तो और हमने अपने बोर्ड और खिलाड़ियों को बग़ावत के लिए उकसाया.

तर्क

मौजूदा स्थिति में क्रिकेटर जो कह रहे हैं, उसमें तर्क है. उनका कहना है कि वे एक ऐसा खेल खेलते हैं, जिसमें वे क़रीब 11 महीने मैदान पर रहते हैं और उस दौरान डोप टेस्ट के लिए उपलब्ध भी रहते हैं. उन्हें कुछ महीने शांति से रहने क्यों नहीं दिया जाता.

और तो और वे मैच न होने की स्थिति में भी डोप टेस्ट से इनकार नहीं कर रहे लेकिन वे ये नहीं बताना चाहते कि वे कहाँ हैं.

मेरा मानना है कि ये दुनिया के हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, जब तक कि उन्होंने कुछ ख़ास न कर दिया हो या फिर वे अपराधी न हों.

मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि भारत में एथलेटिक्स समेत कई खेल (जूनियर स्तर पर भी) डोपिंग के मामलों से भरे पड़े हैं और कभी-कभी ही खिलाड़ी पकड़ में आते हैं.

इनके मुक़ाबले क्रिकेट अपेक्षाकृत इस पाप से मुक्त रहा है. और तो और क्रिकेट के कड़े आलोचक भी इससे सहमत होंगे कि क्रिकेटरों को ऐसे ड्रग्स से शायद ही कोई फ़ायदा होता हो.

मतलब

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें वाडा के नियमों को नहीं मानना चाहिए.

Image caption भारतीय क्रिकेटर वाडा के प्रावधान मानने से इनकार कर रहे हैं

उन्हें ज़रूर मानना चाहिए लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि अगर अभिनव बिंद्रा और सानिया मिर्ज़ा को इससे कोई समस्या नहीं तो अन्य को वही मान लेना चाहिए.

हमें खिलाड़ियों से उनकी निजी ज़िंदगी को सार्वजनिक न करने का अधिकार नहीं छीनना चाहिए. जहाँ तक मैं समझता हूँ, क़ानून की नज़र में हर वो व्यक्ति निर्दोष है, जब तक उसका दोष साबित नहीं हो जाता.

वाडा का विवादित प्रावधान उन सभी एथलीटों को दोषी मान लेता है जब तक वे अपने को निर्दोष नहीं साबित करते. और यह एक सभ्य समाज के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ जाता है और ये क़ानून के रूप में भी ग़लत है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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