ये दिल्ली का क्रिकेट है....

ये अपने आप में एक दुनिया है. यहाँ लोग सबके सामने एक-दूसरे को चाकू मारते हैं और उन्हें इस पर कोई खेद भी नहीं होता.

Image caption सहवाग असहाय खिलाड़ियों की आवाज़ बने हैं

यहाँ क़ानून अनादर करने के लिए है और जो क़ानून के साथ चलना चाहता है उसके साथ पागल जैसा व्यवहार होता है और उसे अलग-थलग कर दिया जाता है.

यहाँ क्रिकेट का मतलब अपना स्वार्थ साधना है. इस खेल में औसत दर्जे के खिलाड़ी को आगे कर दिया जाता है और बिना क़द वाले प्रतिभाशाली खिलाड़ी साँस लेने से पहले ही मर जाते हैं.

ये ऐसी दुनिया है, जिसमें हर कोई गुनाहगार है. वो चाहे एक अधिकारी हो, जिसने कभी क्रिकेट नहीं खेली हो या वो खिलाड़ी हो जो सत्ता में रहने वालों के साथ खेल खेलता है.

समय समय पर लोगों ने इस अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाई है. लेकिन वे इतने शक्तिशाली नहीं रहे हैं कि उन्हें चुप करा सकें, जिसकी फुसफुसाहट भी सबसे ईमानदार की भी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ा देती है.

डर नहीं

जाने-माने पूर्व क्रिकेटर और अपनी बात बिना डरे रखने वाले बिशन सिंह बेदी ने दिल्ली के क्रिकेट ठगों के इस गढ़ को तोड़ने में एक बार सफलता हासिल की थी. लेकिन ये ज़्यादा दिन नहीं चला.

एक बार फिर ये लोग लौट आए हैं. आज वे कोटला के मैदान पर बिना डरे घूमते रहते हैं. उन्हें सज़ा का डर नहीं है. वे असली प्रतिभा का बेशर्मी से अपमान करते हुए पारदर्शी चयन पर उपहास करते रहते हैं.

युवा क्रिकेटर भले ही कितने भी प्रतिभाशाली हों, अगर वे किसी शक्तिशाली और बड़े आदमी के बेटे नहीं तो उन पर चर्चा तक नहीं होती.

ऐसे खिलाड़ी भारत की राजधानी में किसी गन्ने के खेत में चीटियों की तरह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं.

शक्तिशाली लोगों को ख़ुश करने का दबाव इतना है कि दिल्ली की जूनियर टीम के खिलाड़ियों की संख्या 25 और कभी-कभी तो 30 तक चली जाती है.

अपने बेटे को टीम में रखवाने के लिए आपका शक्तिशाली उद्योगपति, राजनेता, नौकरशाह या पुलिस अधिकारी रहना ज़रूरी नहीं. ये भी ज़रूरी नहीं कि राज्य टीम में अपने बेटे को जगह दिलाने के लिए आपको घूस के गूढ़ तरीक़े निकालने पड़े.

आप किराए के गुंडों को भी रख सकतें हैं और उन्हें डरा सकते हैं जो सत्ता में है. इस तरह भी आपका काम हो जाता है.

रोक-टोक नहीं

इस दुनिया में कोई भी चीज़ गोपनीय नहीं. इस देश के हर समाचार पत्र ने समय-समय पर ऐसी रिपोर्टें प्रकाशित की हैं, जिसमें बताया गया है कि टीम के चयन में कैसे अंदर तक भ्रष्टाचार घुसा हुआ है.

लेकिन इससे अगले चयन में भ्रष्टाचार रुका नहीं है. अब भी टीम चयन में टीम में ऐसे खिलाड़ियों का कोटा है, जिनके पास अपने माता-पिता के सिफ़ारिश करने वाले क़द के अलावा कुछ नहीं.

ये ऐसी दुनिया है, जहाँ अच्छा खेलने वाले खिलाड़ियों को भी पिछले दरवाज़े से घुसने की प्रक्रिया अपनानी होती है और उन्हें ख़ुश रखना पड़ता है क्योंकि क्रिकेट की दुनिया में क़दम रखने के लिए उनकी मंज़ूरी ज़रूरी होती है.

कई लोग इस पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे हैं कि वीरेंदर सहवाग जैसे क़द वाले और पैसे वाले खिलाड़ी ने एकाएक अपनी आवाज़ उठाई है और इस 'व्यवस्थित' दुनिया में भूचाल ला दिया है. दरअसल वे कहानी नहीं जानते.

गुहार

लगातार दो साल तक दिल्ली के उपनगरीय इलाक़े का एक युवा खिलाड़ी दिल्ली क्रिकेट के सेलेक्शन ट्रायल के लिए जाता है और नेट्स पर सिर्फ़ छह गेंद का सामना करने के बाद उसे लतिया दिया जाता है.

Image caption गंभीर जैसे कई खिलाड़ी खुलकर सामने नहीं आए हैं

चोटी से गिरने वाला इस युवा खिलाड़ी तो एक क्लब के मालिक में अपना गॉडफ़ादर मिल जाता है. क्लब मालिक इस लड़के की प्रतिभा को समझता है और दिल्ली क्रिकेट एसोसिशन की शक्तिशाली टीम के ख़िलाफ़ अपनी क्लब टीम में उसे शामिल करता है.

ये लड़का छक्कों की बरसात करते हुए धमाकेदार शतक लगाता है. बाद में ये शैली वीरेंदर सहवाग की पहचान बन जाती है.

हो सकता है कि सहवाग जैसे सभी खिलाड़ियों के लिए यह अदायगी का समय है, जो आज भी डीडीसीए के नेट्स से ही भगा दिए जाते हैं.

हमें एक व्यक्ति के साहस की सराहना करनी चाहिए, जिसकी बग़ावत ने उन सभी निरीह और असहाय खिलाड़ियों को आवाज़ दी है जो निष्पक्ष न्याय की गुहार लगाते हैं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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