मोदी की बादशाहत को चुनौती

एक समय था जब क्रिकेट में ललित मोदी बादशाह कहलाते थे. लेकिन आए दिन मोदी को नई-नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

Image caption आईपीएल के चेयरमैन हैं ललित मोदी

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के साथ मोदी के बिगड़ते रिश्तों की लंबी दास्ताँ में एक और नया अध्याय जुड़ गया, जब इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) का संचालन इवेन्ट मैनेजमेंट कंपनी आईएमजी से वापस ले लिए गया.

ललित मोदी और बीसीसीआई के बीच दरार बढ़ती ही जा रही है. जब मोदी ने आईपीएल की नींव रखी थी तो उन्हें उस समय के बीसीसीआई अध्यक्ष शरद पवार का आर्शीवाद मिला हुआ था.

तब पहली आईपीएल के दौरान किसी को भी मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हुई. लेकिन अब समय बदल चुका है.

झटका

नए बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर को मोदी फूटी आँख नहीं सुहाते. तभी तो मोदी के हर क़दम की पूरी तरह जाँच-पड़ताल होती है और अधिकांश फ़ैसले पलट दिए जाते हैं.

Image caption पवार के हटने के बाद बीसीसीआई में मोदी का क़द कम हुआ है

इस मामले में शशांक मनोहर अकेले काम नहीं कर रहे हैं, उनका भरपूर साथ दे रहे हैं बीसीसीआई के सचिव एन श्रीनिवासन, जिन्हें भी मोदी से कई मामलों में हिसाब करना है.

बोर्ड के अधिकारी यही मान कर चल रहे हैं कि राजस्थान में चुनाव हारने के बाद ललित मोदी को इतना बढ़-चढ़ कर नहीं बोलना चाहिए.

लेकिन मोदी तो मोदी हैं. वो कहाँ चुप रहेंगे. बस अब बोर्ड के अधिकारियों से मोदी की पूरी तरह से ठन गई है.

मोदी को दरकिनार करने के लिए पहले तो बोर्ड ने इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) से सुलाह की घोषणा की. यह बात मोदी को बिल्कुल नहीं मंज़ूर थी लेकिन उन्हें चुप रह जाना पड़ा. क्योंकि राष्ट्रीय चुनाव सर पर थे और उनको पवार से किसी भी मदद की उम्मीद नहीं थी.

तकरार

फिर आई देवधर ट्रॉफ़ी पर हुई तकरार, जिसमें एक बार और मोदी को हार माननी पड़ी क्योंकि फिर से पवार की ओर से उन्हें कोई मदद नहीं मिली.

Image caption आईसीएल खिलाड़ियों को माफ़ी देने पर भी मोदी ख़ुश नहीं थे

अब क्या था, विपक्षी खेमे की हिम्मत बढ़ गई और एक के बाद एक फ़ैसले मोदी के ख़िलाफ़ जाने लगे. शशांक मनोहर का अगला क़दम था आईसीएल को छोड़ कर आए सभी के लिए आम माफ़ी और खिलाडियों के लिए तुंरत आईपीएल की अगली नीलामी में शामिल होने का प्रस्ताव. यह सब तब हुआ, जब ललित मोदी भारत से बाहर छुट्टी मना रहे थे.

आईपीएल के बारे में भी बीसीसीआई की बैठक में काफ़ी गरमा-गरमी होने लगी थी और ललित मोदी अपने आप को अकेला महसूस करने लगे.

फिर बोर्ड ने उनकी चहेती कंपनी आईएमजी को दरकिनार करके यह भी संकेत से दिया कि मोदी की मनमानी अब बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

मामले को और तूल न दिया जाए इसलिए मोदी के समर्थकों के लिए चुप रहने के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं है.

मोदी राजस्थान में चुनाव हार चुके हैं. अब बोर्ड के अधिकारी बने रहने के लिए उन्हें कहीं न कहीं से तो चुना जाना ही पड़ेगा.

पंजाब क्रिकेट संघ में ज़रूर मोदी उपाध्यक्ष पद संभाले हुए हैं लेकिन सेंट्रल ज़ोन की बजाय अगर उन्हें नॉर्थ ज़ोन से बोर्ड में चुना जाना है तो दिल्ली के अरुण जेटली को अपना पद छोड़ना पड़ेगा.

अब दिल्ली और पंजाब के बीच पहले से ही ठनी रहती है. फिर मोदी को लेकर कोई समझौता क्यों हो, जब बोर्ड के आला अधिकारी ही इस बात के ख़िलाफ़ हैं.

मोदी का सपना था एक क्रिकेट टेलीविज़न चैनल की स्थापना और इस दिशा में उन्होंने कई क़दम भी उठा लिए थे.

लेकिन बीसीसीआई के नए फ़ैसलों से तो यही लगता है कि मोदी का सपना सपना मात्र ही रह जाएगा.

एक समय पूरे क्रिकेट जगत पर राज करने की सोच रखने वाले मोदी को अब अपनी कुर्सी भी बचानी मुश्किल पड़ रही है.

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