मुक्केबाज़ी की स्थिति अच्छी

विजेंदर
Image caption विजेंदर ने बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था

बीजिंग ओलंपिक में भारतीय मुक्केबाज़ों के बेहतरीन प्रदर्शन से खेल प्रेमियों को ऐसा महसूस होने लगा था कि भारत में मुक्केबाज़ी की क्रांति आ गई है, लेकिन वर्ल्ड चैंपियनशिप में आशा के अनुरुप प्रदर्शन नहीं होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि देशवासियों को निराशा होगी, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है.

ग़ौरतलब है कि बीजिंग ओलंपिक में मुक्केबाज़ी में भारत की ओर से विजेंदर ने कांस्य पदक जीता था जबकि अखिल कुमार पदक के क़रीब पहुँचे थे. जबकि वर्ल्ड चैंपियनशिप में केवल विजेंदर ने पदक दिलाया है और बाक़ी मुक्केबाज़ों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है.

भारत ने बीजिंग ओलंपिक में अपने पिछले प्रदर्शनों के मुक़ाबाले बेहतर प्रदर्शन किया और वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी मुक्केबाज़ों का प्रदर्शन अच्छा रहा है.

इस प्रतियोगिता में पहली बार नौ भारतीय मुक्केबाज़ों ने हिस्सा लिया. पहली बार दो मुक्केबाज़ क्वार्टर फ़ाइनल और तीन प्री-क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचे.

ओलंपिक के बाद यह उम्मीद जगाई गई थी कि भारत मुक्केबाज़ी की वैश्विक शक्ति बन गया है और वर्ल्ड चैंपियनशीप में कई पदक लेकर आएगा, वो धारण ग़लत थी, क्योंकि भारत में मुक्केबाज़ी सरकारी मदद के बिना खेली जा रही है और जो भी मु्क्केबाज़ निकले हैं वे सब अपनी मेहनत के बल पर निकले हैं.

हरियाणा में स्थिति अच्छी

हरियाणा इस समय मुक्केबाज़ी का केंद्र बना हुआ है. वर्ल्ड चैंपियनशिप में इस बार जो नौ मुक्केबाज़ गए, उनमें छह हरियाणा से हैं, उनमें भी पाँच भिवानी से हैं, भिवानी जहाँ विजेंदर अपना अभ्यास करते हैं. भिवानी में एक मु्क्केबाज़ी क्लब है जो निजी स्तर पर चलाया जाता है.

भिवानी न केवल मुक्केबाज़ी का बल्कि एथलीट का केंद्र बना हुआ है क्योंकि वहाँ उतने उद्योग नहीं हैं और नौकरी के अवसर भी कम हैं.

साथ ही हरियाणा सरकार की ओर से पदक जीतने पर पैसे अधिक हैं. भारत सरकार जहाँ वर्ल्ड चैंपियनशिप या ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाले को 50 लाख देती है वहीं हरियाणा सरकार तीन करोड़ रुपए देती है.

Image caption वर्ल्ड चैंपियनशीप में भी विजेंदर कांस्य पदक जीत पाए

इस सबके बावजूद सरकार की ओर से कोई बड़ी मदद नहीं मिलती है. लक्ष्मी मित्तल का ट्रस्ट, वो मुक्केबाज़ों और एथलीट के टॉप स्तर के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देता है.

लेकिन ये जानकर आश्चर्य होगा कि जब भारत ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता तो ये बात आई कि पटियाला में जो मुककेबाज़ी हॉल है, उसे वातानुकूलित बनाया जाए, क्योंकि दुनिया में मुक्केबाज़ी के हॉल वातानुकूलित हैं और उससे मुक्केबाज़ों की ऊर्जा बचती है. लेकिन इन सबके बाद बॉक्सिंग हॉल आज तक वातानुकूलित नहीं बन सका है यानी सुविधाओं की कमी है.

प्रशिक्षण की कमी

दूसरी वजह के रुप में योजनाओं का अभाव है, जैसे वर्ल्ड चैंपियनशिप से पहले भारत ने ये योजना बनाई थी कि उनके मुक्केबाज़ कज़ाकिस्तान जाएंगे जहाँ वे प्रशिक्षण के साथ प्रतियोगिता में भाग लेंगे.

लेकिन मुक्केबाज़ कज़ाकिस्तान नहीं जा सके क्योंकि बाद में ये पता चला कि अगर भारतीय कज़ाकिस्तान जाएंगे तो फिर वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए इटली का वीज़ा नहीं मिल सकेगा. इस तरह भारत का कज़ाकिस्तान नहीं जाना भी एक झटका था.

एक और झटका ये था कि अखिल कुमार जीत नहीं सके. इसकी वजह ये रही है कि वे अपने वज़न की श्रेणी 51 किलोग्राम की श्रेणी से 57 किलोग्राम की श्रेणी में चले गए. हालाँकि वे इस श्रेणी में कभी कोई मुक़ाबला लड़े ही नहीं थे. अगर वे कज़ाकिस्तान जाते तो शायद वे इस वज़न पर अच्छी मेहनत कर पाते.

एक बात यह भी कही जाती है कि ओलंपिक से पहसे भारत में क्यूबा के कोच आए थे लेकिन भारत के अच्छे प्रदर्शन को देखते हुए क्यूबा ने अपने कोच वापस बुला लिए और इसका भी असर पड़ा.

लेकिन जब कुलमिलाकर स्थिति को देखने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि भारत का प्रदर्शन उतना ख़राब नहीं रहा है जितनी निराशा जताई जा रही है.

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