क्रिकेट की सुनहरी यादों की एक शाम

  • 28 सितंबर 2009
Image caption पुराने दिग्गज भविष्य को लेकर चिंतित दिखे.

चैंपियंस ट्रॉफी के मैच जारी है. ज़ाहिर है खेल प्रेमियों पर इस वक़्त क्रिकेट का भूत सवार है.

लेकिन थोड़ा विषयांतर करते हुए उस शाम की यादों को आपसे साझा करना चाहूंगा जो क्रिकेट के पुराने दिग्गजों के साथ हाल ही में अनुभव किए.

मैं जिन लोगों का ज़िक्र कर रहा हूं ये सब अपने समय के धुरंधर थे और अब सफेद बाल और दाढ़ी वाले हो चुके हैं .

ये अलग बात है कि कुछ ने इस सफेदी को काले रंगों में छिपा रखा है.

पुरानी यादें

पिछले हफ़्ते ये सभी दिल्ली में पुराना विला नामक जगह पर इकट्ठे हुए और क़रीब तीस साल पुरानी यादों को ताज़ा करने की कोशिश हुई जब दिल्ली ने रणजी चैंपियनशिप जीती थी.

अपनी तरह का ये दिल्ली में पहला आयोजन था और इसके आयोजक ख़ुद खिलाड़ी ही थे. हालांकि इस मौके पर डीडीसीए के अध्यक्ष भी आमंत्रित थे.

ये ऐसा मौक़ा था जबकि दिल्ली क्रिकेट अकादमी सहवाग के विद्रोह का सदमा झेल चुका था और क्रिकेट समितियों में बदलाव जैसी चर्चाएं आम थीं.

मगर इस मौक़े पर वरिष्ठ क्रिकेटरों ने संयम बनाए रखा और इस मुद्दे को चर्चा से दूर रखा.

आयोजन के मुख्य कर्ताधर्ता और तत्कालीन दिल्ली टीम के महत्वपूर्ण सदस्य कीर्ति आज़ाद ने ड्रेसिंग रूम के कुछ अनुभव सुनाए और साथी खिलाड़ियों की टांग खिंचाई में कोई कसर नहीं छोड़ी.

चाहे वो चेतन चौहान हों या फिर उनके अपने कप्तान बिशन सिंह बेदी.

पीने पिलाने का दौर जैसे जैसे गति पकड़ रहा था लोग पुरानी यादों में खो रहे थे कि कैसे अमृतसर के बेदी पाजी ने भारतीय क्रिकेट में एक नई चुनौती पेश की और जमे जमाए लोगों के वर्चस्व को तोड़ा.

बेदी का विद्रोह

एक के बाद एक सबने अपने अनुभव सुनाए, मसलन वेंकट सुंदरम, मदन लाल, सुरिंदर खन्ना, इन सबने अपनी दोनों पारियों में शतक जड़े थे.

सभी का कहना था कि बेदी के साहस और समर्थन के बिना दिल्ली की टीम का रणजी चैंपियनशिप जीतना असंभव था.

यहां जेटली की वह बात नहीं भूलनी चाहिए जो कि उन्होंने सहवाग के विद्रोह के वक्त कही थी कि पूर्व में बेदी ने भी कुछ ऐसा ही किया था और उन्हें उसका फ़ायदा भी मिला.

टाइगर पटौदी जो कि किसी भी मौक़े पर मज़ाक करने से नहीं चूकते, अपने साथी सुरिंदर नाथ को देखते ही बोल पड़े, ‘भगवान का शुक्र है कि मेरे अलावा मेरी उम्र का कोई और भी ज़िदा है.’

मदनलाल ने चुटकी ली, ‘हम सबको ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि अब हमारे आखिरी ओवर शुरू हो चुके हैं और ऐसे में पुरानी दुश्मनी या ईर्ष्या को ताज़ा करने का कोई औचित्य नहीं है.’

और ये ऐसी टिप्पणी थी जिसमें उस शाम के मिजाज़ का सार छिपा था. बीते दिनों की सुनहरी यादों पर वर्तमान की काली छाया साफ दिख रही थी. समारोह में मौजूद हर व्यक्ति भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर चौकन्ना दिख रहा था.

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