भारतीय टीम की दुर्दशा के दिन

  • 3 अक्तूबर 2009
भारतीय टीम

तरह-तरह के सिद्धांत सामने रखना, आलोचना करना और एक टीम को फटकारना बड़ा आसान होता है, ख़ासकर ऐसी स्थिति में जब टीम अपने प्रशंसकों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती.

अपनी अच्छी रैंकिंग के बावजूद भारतीय टीम एक बार फिर एक बड़ी प्रतियोगिता से बाहर हो गई, वो भी बिना कुछ ख़ास किए.

ट्वेन्टी-20 विश्व कप की तरह इस हार ने भी उन लोगों को हिला दिया है जो टीम इंडिया की 'अपराजेयता' में भरोसा करने लगे थे.

तो गड़बड़ी क्या हो गई? सतही तौर पर देखें तो इन पराजयों का कारण ढूँढ़ना कठिन नहीं है. प्रमुख खिलाड़ियों का घायल हो जाना, ख़राब फ़ील्डिंग और गेंदबाज़ी का पूरी तरह नाकाम होना- इस शर्मनाक हार की वजह रही.

जिन लोगों ने ये सोचा था कि आईपीएल के अनुभव से युवा खिलाड़ियों को फ़ायदा मिलेगा, वो भी ग़लत साबित हुए क्योंकि इन खिलाड़ियों ने भी भारत को निराश किया.

भारतीय टीम की परेशानी दक्षिण अफ़्रीका में आईपीएल-2 के ख़त्म होने के साथ ही शुरू हो गई थी.

परेशानी

उस समय भी यही सोच थी कि भारतीय खिलाड़ी इंग्लैंड जाकर ट्वेन्टी-20 विश्व कप में सभी टीमों को धूल चटा देंगे और चैम्पियन बन जाएँगे. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट.

व्यस्त कार्यक्रम के चलते भारत के दो प्रमुख खिलाड़ियों वीरेंदर सहवाग और ज़हीर ख़ान खेलने में असमर्थ हो गए, तो जो खिलाड़ी बच गए वो भी मैदान में थके-थके और बिना किसी उत्साह के नज़र आए.

टी-20 विश्व कप के बाद भारतीय टीम को एक महीने का आराम मिला. लेकिन इसके बाद एक बार फिर बिना रुके लंबे समय तक क्रिकेट खेलने का एक और दौर शुरू हुआ.

इस दौर का पहला पड़ाव श्रीलंका था, जहाँ भारतीय टीम ने जीत हासिल की और टीम एक बार फिर ट्रैक पर चलती नज़र आई.

श्रीलंका में जीत के बावजूद उन्हें मैदान में खेलते देखकर ऐसा नहीं लगा कि एक महीने के आराम से उनका कुछ भला हुआ है.

उनकी फ़ील्डिंग का स्तर लगातार गिरता रहा और गेंदबाज़ों में लय का अभाव दिख रहा था. ऐसी स्थितियों में जहाँ पहले बल्लेबाज़ी करने से क़रीब-क़रीब जीत तय मानी जाती है, भारत की जीत बहुत प्रभावी नहीं लगी. हालाँकि कई बार टीम बड़े अंतर से जीती.

श्रीलंका के बल्लेबाज़ों ने भारत की कमज़ोरी को भी उजागर किया. सचिन तेंदुलकर को इस समीकरण से अलग कर दीजिए और आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि मेरा क्या मतलब है.

दक्षिण अफ़्रीका में भी टीवी पर जो तस्वीरें पेश की गई, तो अलग प्रतीत नहीं होती. मैदान पर वही आलस्यपन, उसी तरह की थकान और उबे हुए चेहरे- एक ऐसी टीम की छवि पेश कर रहे थे, जो वहाँ थी ही नहीं.

ईशांत शर्मा और आरपी सिंह जैसे खिलाड़ी भी कहीं नज़र नहीं आ रहे थे और आश्चर्यजनक रूप से हरभजन सिंह ने भी यही संकेत दिया कि वे ठीक से अभ्यास नहीं कर पाए हैं.

नाकामी

नई युवा भारतीय टीम श्रीलंका में सचिन तेंदुलकर पर आश्रित रही, जिन्होंने श्रीलंका में जीत हासिल करने में मदद की. यहाँ वे नाकाम हुए तो भारतीय टीम भी नाकाम रही.

Image caption भारत की गेंदबाज़ी भी ख़राब रही

तो सवाल फिर हमारे सामने है कि क्या गड़बड़ी हुई? मैं जीत-हार की बात नहीं कर रहा हूँ. लेकिन क्यों युवा और जो अब उतने युवा नहीं है, उन खिलाड़ियों के चेहरे से खेलने का उत्साह और मज़ा ग़ायब है.

ये संभव है कि हार के कारण टीवी स्क्रीन पर पेश की गई छवियों ने जो प्रभाव छोड़ा है, उसका ग़लत मतलब निकाला जा सकता है.

ज़्यादातर लोगों की तरह मैं भी जवाब की तलाश में हूँ. सवाल ये उठना चाहिए कि क्यों आईपीएल-2 के बाद टीम अपनी ख़ुद की छवि की कमज़ोर परछाई लगती है.

इन सबसे अहम बात ये कि एक महीने का आराम करने के बाद भी टीम में गहराई नज़र क्यों नहीं आती.

इन सवालों के जवाब से भारतीय टीम अपने लय-ताल को हासिल कर सकती है और एक बार फिर चैम्पियन टीम की तरह खेल सकती है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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