तो 'वंडर ड्रग' है टी-20

  • 10 अक्तूबर 2009
वीरेंद्र सहवाग
Image caption वीरेंद्र सहवाग जैसे विस्फोटक बल्लेबाज़ टी-20 मैचों का ख़ास आकर्षण होते हैं

पहले से ही तृप्त क्रिकेट प्रशंसक शायद लगातार और एक के बाद एक टूर्नामेंटों के बोझ से कराह रहे हैं, लेकिन ऐसे भी कुछ दीवाने हैं जिनकी क्रिकेट की भूख टूर्नामेंट दर टूर्नामेंट बढ़ती ही जा रही है.

चैम्पियंस लीग के उदघाटन मुक़ाबलों को लेकर लोगों में जिस तरह का उत्साह देखने को मिला, उससे तो यही लगता है कि ये टूर्नामेंट ज़बरदस्त हिट हो सकता है.

देखा जाए तो चैम्पियंस लीग ऐसा टूर्नामेंट है जो लीक से हटकर है और इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के बाद पहली वैश्विक क्रिकेट स्पर्धा बनने का पूरा मसाला इसमें है.

क्लब, राज्य और देश के प्रति वफादारी को छोड़ खिलाड़ी इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी टीमों के लिए लड़ते-भिड़ते नज़र आएँगे.

क्रिकेट में फ़ुटबॉल की तरह खिलाड़ियों का लंबा या भारी-भरकम पूल नहीं है, लेकिन इसमें शक नहीं कि टी-20 फॉर्मेट में क्रिकेट के दूसरे फॉर्मेट्स से कुछ न कुछ लिया गया है.

ख़तरा

ख़तरा तो सिर्फ़ लालची प्रशासकों से है जो क्रिकेट की ओवरडोज़ से उन लोगों में सुस्ती पैदा कर देंगे जो इस ‘वंडर ड्रग’ के नशे में हैं. ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि ये नशा आगे चलकर लोगों की क्रिकेट की भूख तो बढ़ाएगा और खिलाड़ियों के प्रदर्शन में गिरावट आएगी.

ये कहना काफ़ी है कि जब तक लोगों की दिलचस्पी इस खेल में बनी रहेगी और मैचों की टीआरपी में उछाल आता रहेगा, कारोबारी घराने इस खेल को क्रिकेट की दुनिया की सबसे लोकप्रिय स्पर्धा बनाने के लिए पैसा झोंकते रहेंगे.

Image caption एडम गिलक्रिस्ट ने संन्यास लेने के बावजूद आईपीएल के जरिए अपनी क्रिकेट की पारी जारी रखी है

इससे क्रिकेट के अन्य दो प्रारुपों का क्या होगा? पहले बहस टेस्ट क्रिकेट को लेकर हुई, जो वनडे क्रिकेट के गंभीर ख़तरे के बावजूद ज़िंदा है. लेकिन अब तो वनडे क्रिकेट के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगे हैं.

अगर कोई मीडिया में चल रही बहसों पर चले तो ऐसा लगता है कि दुनिया 20-20 ओवर के मैचों के अलावा और कुछ देखना ही नहीं चाहती. टेस्ट क्रिकेट बेमानी है और अब तो वनडे क्रिकेट भी.

बहस

चैम्पियंस ट्रॉफ़ी वैसे तो अपने अच्छे दिनों में भी बहुत हिट नहीं रही थी, लेकिन हाल ही में ख़त्म हुए टूर्नामेंट में खिलाड़ियों का जैसा प्रदर्शन रहा, उसने इस बहस की चमक फीकी कर दी है.

दिलचस्प ये है कि कई खेलप्रेमी और खिलाड़ी 50-50 ओवरों के मुक़ाबले को ही बेहतर मानते हैं क्योंकि इन मैचों में बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी का बेहतर प्रदर्शन देखने को मिलता है.

साठ के दशक में जब ये खेल शुरू हुआ था तो इसकी भी आलोचना की गई थी.

Image caption सचिन तेंदुलकर ने वनडे में दो-दो पारियों का सुझाव दिया था

एकदिवसीय क्रिकेट को बचाने के लिए अब जो दलीलें दी जा रही हैं, वे ठीक वैसी ही हैं जो तब टेस्ट क्रिकेट के लिए दी जाती थी.

कहा जाता है कि टेस्ट और वनडे क्रिकेट में बल्लेबाज़ों को अपना हुनर दिखाने का पर्याप्त मौका मिलता है. साथ ही गेंदबाज़ों को बल्लेबाज़ों के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया दिखाने का अवसर भी मिलता है.

वे खिलाड़ी और खेल प्रेमी जिन्हें क्रिकेट के लंबे संस्करण के खत्म होने का भय सता रहा है, अब वनडे क्रिकेट को बचाने की गुहार लगा रहे हैं.

वनडे क्रिकेट के बचाव में क्या वो ये कहना चाह रहे हैं कि ‘हम जानते हैं कि टेस्ट मुक़ाबलों को तो क्रिकेट कलेंडर से बाहर कर ही दिया जाएगा, लेकिन कृपया वनडे क्रिकेट को खत्म मत कीजिए.’

तो क्या हम उस दौर में पहुँच रहे हैं जहाँ वनडे क्रिकेट को खिलाड़ियों के कौशल की परीक्षा का खेल माना जाएगा और टी-20 को बतौर मनोरंजन लिया जाएगा जो खिलाड़ियों और प्रशासकों की जेबें भरेगा?

कहने का मतलब है कि टी-20 के आगमन के बाद वनडे क्रिकेट आधुनिक युग का टेस्ट क्रिकेट बन सकता है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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