फिर मातम न मनाना...

  • 28 नवंबर 2009
भारतीय टीम
Image caption कानपुर में भारत ने टेस्ट मैचों में 100वीं जीत दर्ज की

मैं कोई कट्टर देशभक्त नहीं हूँ जो किसी टीम की एकतरफा जीत को लेकर बहुत खुश होऊँ, फिर चाहे जीतने वाली टीम अपनी ही टीम क्यों न हो. खेल में मुक़ाबला सीधे तौर पर खिलाड़ियों की दक्षता के बीच होता है. जितनी ज़्यादा कड़ी प्रतिस्पर्धा होगी मुक़ाबला भी उतना ही रोचक होगा.

भारत में उन टेस्ट मैचों का लंबा इतिहास रहा है जहाँ मुक़ाबले धीमे, बेहद सुस्त और घुमाव लेते विकेटों पर खेले गए हैं. प्रतिद्वंद्वी टीम को छकाने के लिए इन हथियारों का इस्तेमाल किया जाता रहा है.

उस दौर में जबकि टेस्ट मैच क्रिकेट की आत्मा होते थे, ऐसे विकेट पर अपना हुनर दिखाकर विपक्षी टीम को घुटने टेकने पर मज़बूर कर भारतीय टीम गौरव की अनुभूति करती थी.

अगर तेज़ गेंदबाज़ी भारत की कमज़ोरी थी तो यहाँ के दौरे पर आने वाली टीम क्वालिटी स्पिन को खेलने में असमर्थ होती थी.

मैदान पर बिशन सिंह बेदी, चंद्रशेखर और प्रसन्ना की तिकड़ी होती थी तो माहौल बेहद रोमांचक होता था. उनकी घूमती गेंदों पर बल्लेबाज़ असहाय से नज़र आते थे और बल्लेबाज़ को घेरे क्षेत्ररक्षकों के हाथ बल्ले और पैड से टकराकर आती गेंदों का इंतज़ार करते थे.

जैसे ही गेंद क्षेत्ररक्षक के हाथों में पहुँचती, हज़ारों दर्शकों की चीख हवा में गूँज जाती और दर्शकों की इस आवाज़ के बीच अंपायरों के लिए बल्ले से गेंद टकराने की आवाज़ सुनना बेहद मुश्किल हो जाता था.

नीरसता

अनिल कुंबले जैसे स्पिनर तो बल्लेबाज़ों के लिए और मुश्किल होते गए और भारतीय टीम अपनी धरती पर अपराजेय बन गई.

अब ऐसे दौर में जबकि क्रिकेट के लघु संस्करण वनडे और ट्वंटी-20 क्रिकेट लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं, ऐसे में अगर बल्ले और गेंद का मुक़ाबला एकतरफा रहा तो टेस्ट क्रिकेट ज़िंदा नहीं रह सकता.

क्या ऐसी क्रिकेट देखने का कोई मजा है जब बल्लेबाज़ रनों के अंबार लगाते नज़र आए या फिर गेंदबाज़ एक के बाद एक विकेट चटकाते दिखें. या फिर ऐसा मैच देखने में भी क्या मजा है जिसमें टॉस जीतने के बाद टीम विकेट का मिजाज भांपते हुए पहले बल्लेबाज़ी करते हुए आराम से 600 रनों का पहाड़ खड़ा कर दे.

क्या ऐसा नहीं है कि अगर टक्कर बराबर की न हो तो खेल बेमजा और बोरिंग हो जाएगा, फिर भले ही जीतने वाली टीम आपके देश की क्यों न हो.

मैंने ये सवाल अहमदाबाद टेस्ट में उठाए थे जो कि बेनतीजा खत्म हुआ और कानपुर में भी पहले ही दिन से खेल एकतरफा हो गया था.

ऐसे मुक़ाबलों से टेस्ट क्रिकेट की मदद नहीं होगी जो वनडे और ट्वंटी-20 से जद्दोजहद कर रहा है.

सवाल

Image caption कानपुर टेस्ट में भारतीय बल्लेबाज़ों ने जमकर रन बटोरे

सवाल ये नहीं है कि कौन सी टीम जीत रही है या फिर किस टीम की पराजय हो रही है. कानपुर में श्रीलंका को रौंदकर भारतीय खिलाड़ी और दर्शक जश्न मना रहे होंगे, लेकिन असल सवाल जस के तस हैं.

क्या वाकई गेंद और बल्ले की टक्कर ने बतौर क्रिकेटप्रेमी हमें उत्साहित और रोमांचित किया ?

कानपुर का विकेट भी विश्वासघाती नहीं था. वो तो श्रीलंकाई टीम भारत के पहाड़ सरीखे स्कोर के नीचे दब गई वरना इस टेस्ट का हश्र भी अहमदाबाद टेस्ट जैसा ही होता.

मैं खुश हूँ कि भारत ने ये मैच जीता और श्रीसंत अब वो करते नज़र आ रहे हैं जो उन्होंने कुछ साल पहले टेस्ट कैप पहनते हुए वादा किया था. ख़राब हालात में भी गेंद को विकेट के दोनों ओर स्विंग कराना वाकई काबिलेतारीफ़ है.

इस सिरीज़ में सबसे चिंताजनक बात है विकेटों का मिजाज. अगर मुंबई का विकेट भी पहले दो टेस्ट की तरह ही हुआ तो भारत में टेस्ट क्रिकेट की मौत पर किसी को मातम नहीं मनाना चाहिए.

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