आईपीएल में 'सबसे बड़ा रुपैया'

ललित मोदी और शिल्पा शेट्टी
Image caption शिल्पा शेट्टी राजस्थान रॉयल्स की मालकिन हैं

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पेचीदा गलियारों में, असलियत को 'झूठ और धोखे', 'लालच और राष्ट्रीय गर्व' से अलग करना एक असंभव सा काम है.

जिस दिन खिलाड़ियों की नीलामी हो रही थी, हमें बताया गया कि आईपीएल में पाकिस्तानी क्रिकेटरों को न लेने का फ़ैसला टीम के मालिकों का है.

ललित मोदी के एक पंक्ति के बयान से कि 'हमें किसी को कोई स्पष्टीकरण नहीं देना है', वहाँ मौजूद पत्रकार भी पाकिस्तानी क्रिकेटरों की तरह भौचक्के रह गए थे.

इस मसले पर जैसे ही पाकिस्तान की प्रतिक्रिया आई, मानो आसमान ही टूट गया. कुछ टीम मालिकों ने झूठ को छिपाने के लिए अपनी बात को मज़बूती से रखा कि क्रिकेटरों की नीलामी योग्यता के आधार पर ही हुई है और पाकिस्तानी क्रिकेटरों को इसी नाते बाहर रखा गया.

लेकिन राजस्थान रॉयल्स के कोच ने इसे 'धोखेबाज़ी' बताया और किंग ख़ान ने भी पाकिस्तानी क्रिकेटरों के पक्ष में अपनी राय रखी.

झूठ बेनकाब

ऐसा आभास दिलाया गया कि भारत सरकार ने आईपीएल पदाधिकारियों को ये संकेत दिए हैं कि पाकिस्तानी क्रिकेटरों को सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मद्देनज़र नहीं चुना जाए. लेकिन जैसे ही गृह मंत्री ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों को नीलामी की प्रक्रिया से बाहर रखने पर अपनी नाख़ुशी का इज़हार किया, सारा झूठ बेनकाब हो गया.

Image caption पाकिस्तानी क्रिकेटरों को आईपीएल से बाहर रखने पर गृह मंत्री चिदंबरम ने भी अप्रसन्नता जताई

अब सवाल ये उठता है कि पाकिस्तानी क्रिकेटरों को आईपीएल-3 से अलग रखने का निर्णय आख़िरकार किसका था?

क्या ये वाकई कुछ टीम के मालिकों का फ़ैसला था, जिन्हें डर था कि प्रतियोगिता में कोई व्यवधान उत्पन्न होने पर उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ सकता है और क्या इसके चलते ही दूसरी टीमों पर भी पाकिस्तानी क्रिकेटरों को अलग रखने का दबाव बना?

या फिर इस सबके लिए आईपीएल की शासकीय समिति (यानी ललित मोदी) ही पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं?

इन सब सवालों के जवाब सिर्फ़ और सिर्फ़ भारतीय क्रिकेट बोर्ड दे सकता है जो आईपीएल चलाता है.

लेकिन बोर्ड अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहा है और ललित मोदी को खुश करने में लगा है. वही ललित मोदी जिन्हें कुछ बोर्ड अधिकारी 'भारतीय क्रिकेट का अमर सिंह' कहते हैं और जिन्हें इस करोड़ों-अरबों रुपए के खेल का जन्मदाता कहा जाता है.

इस शो में जहाँ पैसा क्रिकेट या राष्ट्रीय गौरव से अधिक अहमियत रखता है, कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए जब पाकिस्तानी क्रिकेटर हर दिन अपने बयान बदलते नज़र आएँ.

एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तानी क्रिकेटरों की शुरुआती प्रतिक्रिया बहुत नाराज़गी वाली थी और उन्होंने कहा कि वे आईपीएल में कभी नहीं खेलेंगे. लेकिन जैसे ही उन्हें ये लगा कि उन्हें आईपीएल में खेलने का मौका मिल सकता है, उन्होंने अपना रुख़ बदल दिया और अब वे 'माफ़ कर दो और भूल जाओ' की नीति पर चलने की इच्छा जताने लगे हैं.

पहले ग़ुस्सा और अब समाधान की इच्छा जताना. यानी साफ़ है पाकिस्तानी क्रिकेटरों को अपने सम्मान, अपने लोगों और देश की भावनाओं से ज़्यादा फि़क्र ख़ुद को होने वाले मुनाफ़े और घाटे से है.

अब समय आ गया है कि सीमा के दोनों तरफ के लोग इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि आईपीएल का राष्ट्रीय गौरव या भावनाओं से लेना-देना नहीं है बल्कि ये सीधे-सीधे कारोबार है जो पैसे को अहमियत देता है.

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