कोलकाता में भारत की जीत के मायने

भारतीय टीम
Image caption भारत ने दक्षिण अफ़्रीका को हराकर यह सीरीज बराबर कर ली.

कोलकाता टेस्ट मैच के शुरू होने से कुछ दिन पहले तक ईडन गार्डेन की पिच को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं.

भारत की पिचों को लेकर जितनी बातें होती हैं उतनी दुनिया के किसी अन्य देशों की पिचों को लेकर नहीं होती हैं.

किसी अन्य देश के लोग उस पिच को लेकर दिलचस्पी नहीं रखते हैं जिसपर उनकी टीम खेलने वाली है जितनी भारत के क्रिकेट प्रशंसक.

दुनिया की अन्य टीमें यह बेहतर जानती हैं कि पिच क्यूरेटर के काम में कितना हस्तक्षेप किया जा सकता है.

लेकिन इस बात में भी संदेह नहीं है कि टीम प्रबंधन के अधिकारी भी क्यूरेटर को इस बात के निर्देश दे सकते हैं कि पिच किस तरह की बनाई जाए कि उससे भ्रमणकारी टीम के लिए परेशानी पैदा हो.

यहाँ यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि क्रिकेट में 22 गज की पिच के अलावा भी कई अन्य चीज़ें होती हैं लेकिन भारत में पिच पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया जाता है.

तैयारी

मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि हम अपनी जटिलताओं के चलते कई बार विपक्षी टीमों के हाथों खेलने भी लगते हैं.

हमारे नए खिलाड़ी उछाल लेने वाली पिचों के लिए बहुत उपयुक्त नहीं हैं जैसा पहले के खिलाड़ी इस तरह की पिचों के लिए तैयारी करते थे.

कई बार ऐसा भी देखने में आया है, ख़ासकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जब भारतीय पिच क्यूरेटरों ने अपने तेज़ गेंदबाज़ों को मदद करने वाली पिच तैयार की. लेकिन यह बताने के लिए कि ऐसा किसने किया, किसी पुरस्कार की ज़रूरत नहीं है.

ईडन गार्डेन के मैदान पर वैसा ही खेल हुआ जिसके लिए वहाँ की पिच तैयार की गई थी.

इस पिच पर सात शतक लगने के बाद भी मैच का नतीजा निकला लेकिन ऐसा कई पिचों पर नहीं होता है जहाँ कई शतक लगने के बाद टेस्ट मैच ड्रा हो जाते हैं.

पिच पाँचों दिन तक ठीक-ठाक रही. यहाँ तक कि पाँचवे दिन दोपहर बाद जब तेज़ गेंदबाज़ ईशांत शर्मा गेंदबाज़ी करने आए तो वे गेंद में उछाल लाने में सफल रहे जिससे बल्लेबाज़ों को थोड़ी परेशानी हुई.

इस पिच पर गेंद न बहुत अधिक स्पिन हो रही थी और न हीं बहुत अधिक उछाल ले रही थी ऐसे में गेंदबाज़ों को गेंद पर पकड़ और उछाल के लिए फ़्लाइट करानी पड़ रही थी.

आलोचना

हरभजन सिंह जिनकी गेंदबाज़ी के चलते काफ़ी आलोचना हो रही थी. उन्होंने पाँच विकेट लिए जिसने न केवल यह टेस्ट मैच जीतने बल्कि इस सिरीज़ को बराबर करने में भी मदद की.

उन्हें अमित मिश्र और ईशांत शर्मा की ओर से भी काफी मदद भी मिली. पाँचवे दिन ज़हीर ख़ान की ग़ैर मौज़ूदगी में भी भारत ने दक्षिण अफ़्रीका को आउट कर दिया.

हाशिम अमला ने इस हार को टालने के लिए अकेले ही जिस तरह का खेल दिखाया उसके लिए उनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है.

वह सुरक्षात्मक खेल दिखा रहे थे लेकिन उन्हें जब भी रन लेने को मौक़ा मिला वे रन लेने से चूके नहीं लेकिन यह समझना कठिन है कि शाम के समय उन्होंने कुछ रन लेने से मना क्यों कर दिया. ऐसा करके वे भारत को बल्लेबाज़ी करने के लिए बुला सकते थे और मैच भी बचा सकते थे.

उन्हें अपनी टीम के केवल निचले क्रम से ही कुछ सहयोग मिला लेकिन टीम के ऊपरी क्रम ने भी निचले क्रम की तरह खेल दिखाया होता तो कहानी ही कुछ और होती.

यह सही मायनों में भारत का खेल टीम भावना वाला था और यह जीत टेस्ट क्रिकेट में मिली शानदार जीतों में से एक थी. इसने भारतीय टीम को अपना नंबर एक का ताज बचाए रखने में भी मदद की.

(प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट ग्रुप के सौजन्य से)