कुछ भी नामुमकिन नहीं है

सचिन तेंदुलकर

खेल के बारे में एक ख़ास बात यह है कि जब भी कोई खिलाड़ी किसी तरह की कोई उपलब्धि हासिल करता है तो जैसे पूरी मानवता स्वयं को गौरवान्वित और अधिक ताक़तवर महसूस करने लगती है.

जब यूसैन बोल्ट वायु की गति से भागे और बेइजिंग ओलंपिक में उन्होंने 100 मीटर का रिकॉर्ड तोड़ा तो बुज़ुर्गों को भी लगने लगा कि वे भी तेज़ भाग सकते हैं.

युवाओं की तो आँखों में ज़ाहिर है सपने होते हैं और उनकी कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं है लेकिन अधिक उम्र के लोग जो कि अनुभवी होते हैं, उनमें भी ऐसे मौक़ों पर ऊर्जा का संचार हो जाता है.

एक अदभुत अहसास

यह एक ऐसी सुखद अनुभूति है जिसकी कोई हद नहीं है. चाँद पर मानव के क़दम या चिकित्सा अथवा विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया अविष्कार भी इतना उत्साहित नहीं करेगा जैसे स्पोर्ट्स में किसी रिकॉर्ड के टूटने पर होता है.

अभी दो दिन पहले ही सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट जगत को ऐसे ही बहुमूल्य क्षण प्रदान किए. ऐसा एक भी क्रिकेट प्रेमी नहीं होगा जिसके चेहरे पर उस समय मुस्कान नहीं आई होगी जब उसने सचिन को सीमित ओवरों में 200 रन पार करने वाला पहला व्यक्ति बनते सुना या देखा होगा.

जब वह रिकॉर्ड के क़रीब थे तो उस समय दर्शकों के चेहरों पर साफ़ दिख रही चिंता और धोनी के प्रति एक प्यारी सी खीज, जिन्होंने लगता था अगले कुछ ओवरों में क्रीज़ पर क़ब्ज़ा कर रखा था, इस बात की परिचायक है कि वे सचिन के कितने दीवाने हैं.

धोनी ने स्वयं भी कुछ शॉट इतने अंधाधुंध खेले और इतनी ताक़त से बल्ला घुमाया जैसे लगता था कि मज़बूत चमड़े का बॉल टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा. कोई अन्य दिन होता तो यह वहाँ मौजूद लोगों के लिए एक अनोखा नज़ारा होता लेकिन उस दिन तो इतिहास रचा जा रहा था और लोग अपने चहीते धोनी का भी उसके रास्ते में आना सहन नहीं कर पा रहे थे. जबकि धोनी ऐसा जानबूझ कर नहीं कर रहे थे.

विरोधियों ने भी सराहा

जब अमला ने धोनी के बैट से छू कर निकला वह बॉल रोका जो निस्संदेह एक चौका लग सकता था तो विरोधी टीम की ओर से भी तालियाँ बजीं क्योंकि इससे मास्टर को अपने हाथ आज़माने का मौक़ा मिल गया और वह कर दिखाने का भी जो पहले कभी नहीं हुआ था.

धोनी ने एक बार फिर दिखा दिया कि वह कितने परिपक्व और समझदार हैं क्योंकि ड्रेसिंग रूम की ओर जाते समय उन्होंने सचिन के कंधे पर अपना हाथ नहीं रखा बल्कि कुछ क़दम पीछे रहे ताकि सचिन उस समय दर्शकों की नज़रों में रहें और पूरा श्रेय हासिल कर सकें.

यह छोटी-छोटी मुद्राएँ ही होती हैं जो साबित करती हैं कि भारतीय टीम और उसकी कप्तानी अत्यंत कुशल हाथों में है. आपको याद होगा कि धोनी ने भी 35 गेंदों में 68 रन दे कर भारत को 400 के आंकड़े को पार कराने में मदद की थी.

तेंदुलकर कई चोटियाँ चढ़े हैं लेकिन यह वाली विशिष्ट है क्योंकि इससे पहले यहाँ कोई पहुँचा ही नहीं है. और यही बात है जो इसे अति विशिष्ट बनाती है. यह उचित ही था कि उन्हें अगले गेम से विश्राम दिया गया है क्योंकि अगले वर्ष उन्हें इससे भी ऊँची चोटी पार करनी है. तैयारी शुरू हो गई है और जैसाकि सचिन ने ग्वालियर में दिखा ही दिया है, कुछ भी नामुमकिन नहीं है.

(प्रोफ़ेशनल मैनेजमेंट ग्रुप के सौजन्य से)

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