ताकि फिर कलंकित न हो क्रिकेट

शशि थरूर और ललित मोदी
Image caption ललित मोदी का कहना है कि कोच्चि आईपीएल टीम के मालिकों को लेकर भ्रम की स्थिति है

जो लोग ये सोचते हैं कि भारत ने विकास की करवट ले ली है और भ्रष्टाचार और फूहड़पन बीते ज़माने की बातें हो गई हैं तो हाल ही में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में हुआ रहस्योदघाटन उन्हें चौंकाने के लिए काफ़ी है.

ब्रैंड आईपीएल को कलंकित करने वाले लोग वे ही हैं जो पहले इसे विश्व क्रिकेट का सबसे बड़ा आयोजन बता रहे थे. अब आईपीएल में भ्रष्टाचार और फ्रेंचाइज़ी के मालिकों को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ मीडिया में आ रही हैं.

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट बिरादरी इन कहानियों से अनजान थी, लेकिन ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध का मिश्रण इतना मोहक था कि मीडिया ने इसे अनदेखा करने में ही भलाई समझी.

हम नौटंकी और सोप ओपेरा के ज़माने में रह रहे हैं और यहाँ कोई बात तब तक सच नहीं है जब तक कि टेलीविज़न उस पर अपनी मुहर नहीं लगा देते. जैसे ही ललित मोदी ने शशि थरूर पर हमला बोला मीडिया ने भी अपनी भाषा तुरंत बदल दी.

आईपीएल मुख्यालय पर आयकर विभाग के छापे, और तमाम आरोपों के बावजूद अपनी अकड़ बनाए रखने वाले आईपीएल के 'सिकंदर' ललित मोदी के अलावा बेहद प्रभावशाली और अपने बयानों के लिए अक्सर चर्चाओं में रहने वाले केंद्रीय मंत्री शशि थरूर लगातार मीडिया की सुर्खियों में हैं.

आईपीएल का क्रिकेट मैच अब मैदान से निकलकर ख़बरों की दुनिया में पहुँच गया है.

करोड़ों-अरबों का ये खेल टेलीविज़न चैनलों को अब भी टीआरपी दे रहा है, लेकिन क्रिकेट मैच के लिए नहीं, बल्कि ख़बरों के लिए. मोदी और थरूर की ये तक़रार अब राजनीतिक रंग लेने लगी है.

आशंका ये भी है कि भारतीय क्रिकेट और ख़ासतौर पर आईपीएल में भ्रष्टाचार का ये असल मुद्दा कहीं कांग्रेस और भाजपा की राजनीतिक लड़ाई की शक्ल भर न ले ले.

पारदर्शिता ज़रूरी

इस खेल में पारदर्शिता सबसे बड़ा मुद्दा है. अभी तक इसकी अनदेखी होती रही है और पैसे बनाने के इस खेल में क्रिकेटर मोहरा बनाए जाते रहे हैं. खिलाड़ियों को मज़बूर किया जा रहा है कि वे लगातार दो महीने तक किसी निजी टीम के लिए खेलें और लगभग हर रात किसी न किसी समारोह में शिरकत करें.

इसका असर ये होगा कि खिलाड़ी जब वेस्टइंडीज में होने जा रहे टी-20 विश्वकप के लिए रवाना होंगे तो पूरी तरह थक कर चूर हो चुके होंगे.

इससे भी अधिक चिंता की बात ये है कि आईपीएल की इन पार्टियों में मॉडल और कई बड़ी हस्तियों के अलावा वे लोग भी होते हैं जो 40 हज़ार रुपये का टिकट ख़रीदने का माद्दा रखते हों.

निश्चित तौर पर ऐसी पार्टियों से एक युवा और भविष्य का सितारा बनने की कूवत रखने वाले खिलाड़ी पर अच्छा असर नहीं पड़ेगा और ये भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए नुक़सानदेह होगा.

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि क्रिकेट पर एक दशक पहले मैच फिक्सिंग की काली छाया पड़ी थी और कई बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को इस खेल को बेचने का क़सूरवार पाया गया था. भारतीयों के लिए ये खुलासा और भी शर्मनाक़ था क्योंकि सट्टेबाज़ी में लिप्त क्रिकेटर और सट्टेबाज़ दोनों ही भारतीय ज़मीन से थे.

आईपीएल और निजी स्वामित्व वाली टीमों के इस युग में जहाँ क्रिकेट का मुख्य मक़सद पैसा कमाना और अपने प्रभाव में इज़ाफा करना है, क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड को ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए जिससे क्रिकेटरों को लालच और ऐसी दूसरी बुराइयों से बचाया जाए.

इससे पहले कि चाकुओं की धार मेरी तरफ हो, मैं ये साफ कर दूँ कि मैं किसी पर आरोप नहीं मढ़ रहा हूँ.

मैं 2008 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के डायरेक्टर पॉल कॉन्डन के उस बयान का हवाला देना चाहूँगा जिसमें उन्होंने कहा था, "शारजाह के बाद से आईपीएल में भ्रष्टाचार का सबसे अधिक ख़तरा है."

आज, जबकि हमें ये बताया जा रहा है कि आईपीएल में कुछ बेनामी पैसा लगा हुआ है, तब भी क्या कॉन्डन के उस बयान को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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