ग़ुनाहगार कौन: ललित मोदी या...

  • 24 अप्रैल 2010
प्रीटि ज़िटा और ललित मोदी
Image caption आईपीएल को भारत ही नहीं दुनियाभर के क्रिकेटप्रेमियों का ज़बरदस्त समर्थन मिला

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के ताज़ा संकट के बारे में कोई क्या लिख सकता है, जब पहले से ही इसका अंदाज़ा हो?

तीन साल पहले जिस धूमधड़ाके के साथ आईपीएल की शुरुआत हुई थी और एक ब्रैंड के रूप में लोगों ने इसे स्वीकार किया, उससे दुनिया भर में भारत की प्रतिष्ठा तो बढ़ी, लेकिन साथ ही क्रिकेट के इस स्वरूप से नाइत्तेफ़ाकी जताने वालों को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया गया या फिर उन्हें चुप रहने के लिए कहा गया.

बदकिस्मती से सच्चाई ये है कि हम अति हो जाने के बाद ही प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. किसी चीज़ की तारीफ़ या इसकी आलोचना करने से पहले इसकी अच्छाई या बुराई पर सोचना भी नहीं चाहते. एक महीने पहले तक ही आईपीएल भारत का गौरव हुआ करता था और ललित मोदी 'भगवान'.

लेकिन आज आईपीएल दागदार है और मोदी की छवि राक्षस की बन गई है जो कुछ भी सही नहीं कर सकता. आईपीएल के पैरोकार घोटाले के रहस्योदघाटन से सदमे की स्थिति में हैं.

कुछ भी अभी साबित नहीं हुआ है इसलिए इन लोगों का कहना है कि आईपीएल ब्रैंड इतना अच्छा है कि ये इस संकट से उबर जाएगा. आलोचक अचानक हावी होते दिख रहे हैं और उनका कहना है कि इस 'हास्यास्पद मनोरंजन' का ये हश्र तो तय था.

पैंतरा बदला

आईपीएल की मलाई खाने वालों में एक बड़े हिस्सेदार मीडिया ने भी पैंतरा बदल लिया है. वो ये भूल गया है कि आईपीएल को दागदार करने वालों को बढ़ावा देने वालों में उसकी भूमिका अहम रही है.

क्रिकेट को दागमुक्त और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भ्रष्टाचारमुक्त करने की अब ज़ोरदार मांग हो रही है. क्रिकेटप्रेमियों के साथ धोखा हुआ है और इसकी सज़ा 'मौत' से कम नहीं हो सकती, हालाँकि ये किसी को नहीं पता कि असली ग़ुनाहगार कौन है.

क्या असल अपराधी राजनेता और उद्योगपतियों का गठजोड़ है या फिर पूँजीवाद जिसने परीकथा जैसी आईपीएल की शुरुआत को इस शर्मनाक़ मुकाम तक पहुँचा दिया है.

या फिर असली ग़ुनाहगार ललित मोदी हैं जिन्हें गवर्निंग काउंसिल में अपने करीबियों और विश्वस्त बोर्ड अधिकारियों से मदद मिली?

कॉर्पोरेट गवर्नेंस में हम लोगों को बहुत यकीन है-बावजूद इसके कि दुनियाभर में आए आर्थिक संकट के लिए इसी कॉरपोरेट गर्वेंनेंस के तौर तरीके जि़म्मेदार थे. हम उन्हें माफ़ करने के लिए भी तैयार हैं और कुछ का तो ये भी कहना है कि आईपीएल को फ्रेंचाइज़ी के हवाले कर देना चाहिए.

शायद इंडिया सीमेंट्स और चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक एन श्रीनिवासन को अब बीसीसीआई सचिव के अलावा आईपीएल कमिश्नर की दोहरी ज़िम्मेदारी भी देनी चाहिए. ये मत सोचिए कि मैं कोई तंज कस रहा हूँ.

ऐसा बिल्कुल संभव है बशर्ते बीसीसीआई में शामिल अधिकतर लोग इसका विरोध न करें क्योंकि ऐसा करने से उद्योगपति कॉरपोरेट जगत को मोदी के हटने के बाद बोर्ड को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी- और ऐसा वो ज़रूर करना चाहेंगे ताकि उनका खज़ाना भरता रहे.

कड़े क़दम ज़रूरी

अगले हफ्ते भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड और इसके प्रमुख शशांक मनोहर ही ख़बरों के केंद्र में होंगे. बोर्ड ये अच्छी तरह जानता है कि इस घोटाले के रहस्योदघाटन के बाद उसे बहुत तेज़ी और निर्णायक रूप से काम करना होगा वरना उसके अस्तित्व तक के लिए ख़तरा पैदा हो सकता है. इसके लिए शंशाक मनोहर को दृढ़ निश्चय होना पड़ेगा.

बोर्ड ने इससे पहले भी ऐसे मामलों पर कमज़ोरी दिखाई है और शुतुरमुर्ग जैसा रवैया अपनाया है, लेकिन इस बार उसकी प्रतिष्ठा और अस्तित्व दोनों दांव पर हैं. तमाम गलतियों के बावजूद बोर्ड के पास आगे बढ़ने का एक ही रास्ता है कि वो पहले अपने घर की सफाई करे.

दाग धोने की प्रक्रिया में शशांक मनोहर को सबसे पहले बोर्ड के संविधान की उस संशोधित धारा को बहाल करना चाहिए, जिसके तहत बोर्ड का कोई भी सदस्य उस ग्रुप का हिस्सा नहीं हो सकता, जिसके साथ बोर्ड कारोबार कर रहा है.

सिर्फ़ मोदी की ही छुट्टी नहीं होनी चाहिए बल्कि श्रीनिवासन को भी स्पष्ट बता दिया जाना चाहिए कि वे आईपीएल फ्रेंचाइज़ी या बोर्ड सदस्य में से किसी एक को चुनें.

अगर बोर्ड इस आशय का बयान जारी करता है तो ये संकेत जाएगा कि बीसीसीआई नई शुरुआत के लिए तैयार है और अपना स्वार्थ सिद्ध करने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

साथ ही बोर्ड की छवि भी सुधरेगी. पिछले कुछ वर्षों में बोर्ड की छवि किसी कंपनी सरीखी हो गई है जिसका मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना होता है. यही नहीं अपनी कमाई और खर्च के ब्यौरे की जाँच कराने का इरादा जताने से बोर्ड लोगों का विश्वास भी हासिल कर सकेगा.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार