त्रिमूर्ति से उम्मीदें तो हैं

Image caption सुनील गावस्कर को हाल ही में आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल में शामिल किया गया है

रवि शास्त्री ने जब ललित मोदी को 'क्रिकेट का मूसा' करार दिया तो क्या वाकई उन्हें पता था वो क्या कह रहे हैं? या फिर ये ग्लैमर की चकाचौंध, पैसे और इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल की तेज़ रफ़्तार थी जिसने ललित मोदी को खत्म किया.

सुनील गावस्कर, जिन्हें आमतौर पर टेस्ट क्रिकेट का सही प्रतीक माना जाता है, को भी आईपीएल इतना रोमांचक लगा कि टेलीविज़न कमेंट्री की आड़ में उन्हें कई विज्ञापन करने में कोई ऐतराज नहीं हुआ.

यही नहीं आईपीएल की शानदार सफलता का असर मंसूर अली ख़ान पटौदी पर इस क़दर हुआ कि वो सही-ग़लत को परखने का ताक़त ही गंवा बैठे.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों पर तो हममें से किसी को यकीन नहीं है, लेकिन सभी उम्मीद करते हैं कि अपने जमाने में मैदान पर इस खेल को नई ऊंचाइयाँ देने वाले भारतीय क्रिकेट इतिहास के ये तीनों धुरंधर इस खेल के हितों की रक्षा करेंगे.

शास्त्री, गावस्कर और पटौदी की तिकड़ी से उम्मीद है कि वे क्रिकेट और क्रिकेट प्रशंसकों के हितों का ख़्याल रखेंगे.

विश्वास

जब वे बोलते हैं तो लोग न केवल उन्हें सुनते हैं, बल्कि उनमें विश्वास भी रखते हैं. लेकिन बोर्ड के भोंपू बनकर जब वे इस विश्वास को तोड़ते हैं तो तकलीफ़ होती है.

मैं मानता हूँ कि वे कोई फाइनेंशियल एक्सपर्ट नहीं हैं जिन्हें तमाम सौदों में हुई धोखाधड़ी का पता हो. लेकिन चाहे क्रिकेटरों की नीलामी का मसला हो या फिर आईपीएल की नाइट पार्टियों का मामला (जिसके चलते खिलाड़ी टी-20 विश्व कप से पहले थककर चूर हैं), इन तीनों दिग्गजों ने हमें निराश किया है.

कहा जा रहा है कि आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल का हिस्सा बनना आर्थिक रूप से इतना फायदेमंद है कि शायद ही कोई इस लालच से बच सके और क्रिकेट और खिलाड़ियों की क़ीमत पर आईपीएल को बेचने के मुद्दे पर अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ सुने.

इसलिए, इन बिना पर कि वे कभी प्रसिद्ध खिलाड़ी हुआ करते थे, उन्हें दोष देना ग़लत होगा.

एक ऐसी व्यवस्था जिसमें चापलूसों को तरक़्की मिलती है और सत्ता के दलाल आज़ाद घूमते हैं, वहाँ अपने विश्वास पर डटे रहना बहुत मुश्किल है. ऐसी व्यवस्था में विरोध के सुर बुलंद करने से आसान है समझौता करना और जीवन में आगे बढ़ जाना.

बीसीसीआई ने आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल में मोदी को छोड़कर किसी और को दंडित नहीं कर सामूहिक ज़िम्मेदारी के सिद्धांत के माखौल उड़ाया है और अब ये तीनों गवर्निंग काउंसिल में हैं. इस त्रिमूर्ति को अब आईपीएल-चार के लिए फ्रेंचाइज़ी के साथ सौदेबाज़ी करने की ज़िम्मेदारी दी गई है.

क्या हम अब भी उम्मीद करें कि ये त्रिमूर्ति बोर्ड की तिजोरी भरने से पहले क्रिकेट और क्रिकेटरों के बारे में सोचेगी? ऐसा होने की संभावना कम ही है, लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि अब तक जो कुछ हुआ वो शर्मसार करने के लिए काफ़ी था और अब वे अपनी चूकों के लिए प्रायश्चित करना चाहेंगे.

हमें ये मत बताइए कि आईपीएल में समस्या सिर्फ़ वित्तीय भ्रष्टाचार थी. ये वो ब्रैंड है जो क्रिकेट के अन्य दो प्रारूपों ख़ासकर टेस्ट क्रिकेट के लिए ख़तरा बना हुआ है.

आईपीएल का घोटाला खुल जाने से क्रिकेट को अपनी जागीर बनाने के कंपनियों की कोशिशें फ़िलहाल विफल हो गई हैं लेकिन इसका ख़तरा बना हुआ है.

गावस्कर, शास्त्री और पटौदी मिलकर क्रिकेट के परंपरागत प्रशंसकों और टी-20 के दीवानों के हितों की रक्षा के लिए बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें कर सकते हैं.

ऐसा मानना हमारा भोलापन होगा कि ये तीनों एकाएक चुप्पी साधे क्रिकेट प्रशंसकों की आवाज़ बने जाएँगे, लेकिन उम्मीद के अलावा और किया ही क्या जा सकता है?

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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