ये जिन्न क्रिकेट को लील लेगा

ललित मोदी और उनकी बनाई इंडियन प्रीमियर लीग और उसके इर्द-गिर्द विवाद का साया अभी बना हुआ है.

भारतीय क्रिकेट को एक भीषण आघात पहुँचाने के बाद अब ये भी सामने आ रहा है कि ललित मोदी की और भी बड़ी योजनाएँ थीं. इनके तहत उनका और उनके कॉरपोरेट जगत के कर्ता-धर्ताओं का विश्व के क्रिकेट पर नियंत्रण कायम हो सकता था.

इंग्लैंड उनका अगला निशाना था...और हो सकता है कि वे कामयाब भी हो जाते अगर अपने अड़ियलपन और अहं के कारण उन्होंने अपने पत्ते खोलने में जल्दबाज़ी न की होती.

इंग्लैंड में क्रिकेट प्रबंधन को धता बता कर लीग शुरू करने की पूरी योजना अजीबो-ग़रीब और कुछ काल्पनिक लग सकती है. लेकिन जब किसी खेल को आप प्रॉपर्टी और ब्रांड की शक्ल दे देते हैं तो कॉरपोरेट लोभ की कोई सीमा नहीं रहती.

विश्व क्रिकेट पर नियंत्रण का बीज तो उसी समय बोया गया था जब बीसीसीआई ने 'क्रिकेट' को सबसे अधिक बोली लगाने वाले को नीलाम करने का फ़ैसला किया था.

आईपीएल की शुरुआत से पहले नीलामी के दो दिन बाद ही मैंने अपने एक कॉलम में काफ़ी विस्तार से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को इससे पैदा होने वाले ख़तरों के बारे में आगाह किया था.

उस लेख में 22 फ़रवरी 2008 को मैंने लिखा था - "क्या भारत में क्रिकेट प्रायोजित सट्टेबाज़ी के दौर में प्रवेश कर गया है? और क्या इसके प्रशासक अपनी ज़िम्मेदारियाँ भुलाकर मुक्त बाज़ार की ताकतों को इस खेल पर कब्ज़ा करने दे रहे हैं?"

क्रिकेट के नियंत्रण का सवाल

मुंबई में 20 फरवरी 2008 को जो हुआ वह इस खेल के लिए वॉटरशेड कहा जा सकता है और कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि यह उसे किस दिशा में ले जाएगा.

क्या आईपीएल केवल एक फ़ैंटेसी या ख़्वाब है जो भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने खड़ा कर दिया है.

क्या भारत के धनी वर्ग को इसने इतना मोहित कर दिया है कि उसे लगता है कि उसमें हज़ारों करोड़ रुपया लगाकर 44 दिन के इंटरसिटी टी-20 लीग के ज़रिए उन्होंने ऐसी मुर्गी का अविष्कार किया है जो एक दिन सोने का अंडा ज़रूर देगी.

इस खेल के भविष्य के लिए इससे भी ज़्यादा ज़रूरी ये जानना है कि क्या इतनी बड़ी बड़ी रक़म इसलिए ली-दी जा रही है ताकि खेल का सीधा नियंत्रण ही अन्य लोगों के हाथ में चला जाए?

और क्या आज का भारतीय क्रिकेट बोर्ड आने वाले दिनों में निष्क्रिय संस्था बन जाएगा जो पूरी तरह से उन कॉरपोरेट पर निर्भर हो जाएगा जो आज खिलाड़ियों की नीलामी के कर्ता-धर्ता हैं और जिन्होंने इतना पैसा देकर उनको ख़रीदा है जिसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है.

शायद न जाने-समझे भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने कॉर्पोरेट जगत और पूरे क्रिकेट प्रशासन को आमने-सामने टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है.

क्या आज हम क्रिकेट में एक और क्रांति के चौराहे पर खड़े हैं जिसके परिणाम पैकर के बाद के दौर से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

पैकर की ही तरह इस विद्रोह की शुरुआत भी एक मीडिया बैरन सुभाष चंद्रा ने की थी जो ज़ी नेटवर्क के मालिक हैं.

'जिन्न को बोतल से निकाला?'

पैकर असफ़ल रहे, लेकिन इसका संबंध भारतीय क्रिकेट प्रबंधन से है जिसने अपने प्रभाव में कमी आते देखकर अपने पैसे के असर से इस विद्रोह को कुचल दिया.

इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भारतीय क्रिकेट प्रबंधन ने एक ऐसे दैत्य को खुला न छोड़ दिया हो जो उसे और विश्व क्रिकेट प्रबंधन के लिए ही ख़तरा बन जाए.

पूरे आईपीएल में बहुत सारा धन लगा हुआ है और इसीलिए हर प्रयास, पैसा और अन्य तरीकों से इसे लोकप्रिय बनाया जाएगा. अगर आईपीएल कामयाब रहता है तो कॉर्पोरेट्स भी अपना हिस्सा माँगेंगे और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता का हिस्सा बनाना चाहेंगे.

इस फ़ॉर्मेट की लोकप्रियता का मतलब हो सकता है कि वर्तमान में जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की संरचना है, वह ख़त्म हो जाए.

किसे नफ़ा या नुक़सान होता है, ये उनके लिए बेमानी है जिनके लिए सर्वोपरी यह है कि पैसा आता रहे.

दो साल के बाद ये सोच कर डर लगता है कि इस तरह की प्रलय के हम कितने क़रीब थे. मुझे शक़ है कि शायद भारतीय क्रिकेट बोर्ड को अभी तक इस बात का अहसास नहीं है कि उसने क्रिकेट की दुनिया में किस तरह की ताकत को बेलगाम कर छोड दिया है.

बोर्ड को आत्मविश्‍लेषण करने की ज़रूरत है, बजाए इसके कि वह इस पूरे विवाद को अपने और मोदी के बीच निर्णायक लड़ाई बना बैठे. ऐसा इसलिए ज़रूरी है ताकि क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित और समझ-बूझ वाले हाथों में रहे.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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