दुनिया के बेहतरीन कोच

फ़ुटबॉल में टीम के कोच अहम भूमिका निभाते हैं. उनका खेल में सीधा दखल नहीं होता, लेकिन कोई भी टीम अच्छे कोच के बिना चमक नहीं सकती.

कोई भी फ़ुटबॉल टीम अगर किसी प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो उसका आधा श्रेय टीम के कोच को भी मिलता है.

कोच को कई बहुत महत्वपूर्ण फ़ैसले करने होते हैं. कौन से 11 खिलाड़ी मैच में उतरेंगे और कब किस खिलाड़ी को बदलना है. ये सब फ़ैसले टीम की हार-जीत से जुड़े होते हैं.

तो आइए नज़र डालते हैं विश्व फ़ुटबॉल की कुछ ऐसी ही हस्तियों पर, जिन्होंने कोच पद पर रहते अपनी काबलियत से सबका दिल जीता.

एन्ज़ो बेयर्ज़ोट

इटली में फ़ुटबॉल पर बेयर्ज़ोट का योगदान काफ़ी अहम है. पहले एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में और फिर कोच के रूप में. इटली ने वर्ष 1982 का विश्व कप उनके अधीन जीता था. एक फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में बेयर्ज़ोट ने इटली के कई क्लबों की शोभा बढ़ाई. इनमें इंटर मिलान भी शामिल है. लेकिन उन्हें कोच के रूप में ज़्यादा जाना जाता है और ख़ासकर 1982 का विश्व कप जीतने में उनकी भूमिका के लिए.

वर्ष 1974 के विश्व कप के दौरान वे इटली के सहायक कोच थे. अगले विश्व कप यानी 1978 के विश्व कप में उन्होंने प्रमुख कोच की भूमिका निभाई और इटली को सेमी फ़ाइनल तक ले गए. लेकिन ख़िताबी जीत वर्ष 1982 में मिली, जब 44 साल बाद उन्होंने इटली को विश्व कप जिताने में मदद की. इटली की 1982 की ख़िताबी जीत इसलिए भी अहम मानी जाती है क्योंकि विश्व कप से पहले इटली की राष्ट्रीय टीम को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा था. लेकिन बेयर्ज़ोट ने ऐसी रणनीति बनाई, जिससे टीम का ध्यान सिर्फ़ खेल पर रहा.

रिनॉस मिचेल्स

फ़ुटबॉल के इतिहास में मिचेल्स का अहम योगदान है. उनकी रणनीति ने नीदरलैंड्स की टीम को फ़ुटबॉल की दुनिया की एक शक्ति के रूप में स्थापित किया. नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय कोच बनने से पहले मिचेल्स ने फ़ुटबॉलर के रूप में भी अपनी धाक जमाई थी. आएक्स एम्सटर्डम क्लब से भी उन्होंने खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया और 257 मैचों में 120 लोग मारे.

मिचेल्स ने कोच के रूप में अपना करियर इसी क्लब से शुरू किया. बार्सिलोना एफ़सी के भी वे कोच रहे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय टीम के कोच के रूप में ज़िम्मेदारी संभाली. मिचेल्स कहा करते थे कि फ़ुटबॉल एक युद्ध है. फ़ुटबॉल में कई आधुनिक विचार डालने वाले के रूप में मिचेल्स का योगदान ज़बरदस्त है. फ़ुटबॉल को युद्ध से जोड़ने के कारण उन्हें जनरल का उपनाम दे दिया गया.

उन्हें 'टोटल फ़ुटबॉल' का जनक भी कहा जाता है. इस तरह के फ़ुटबॉल में किसी खिलाड़ी का स्थान नियत नहीं होता, सभी खिलाड़ी साथ में आक्रमण करते थे और साथ में विरोधी टीम के आक्रमण की हवा भी निकालते थे.

लुईस मेनोटी

फ़ुटबॉल के इतिहास में मेनोटी महानतम कोचों में से एक माने जाते हैं. उन्हें 1978 में अर्जेंटीना को विश्व कप का ख़िताब दिलाने के कारण याद किया जाता है. एक फ़ुटबॉलर के रूप में भी उन्होंने अर्जेंटीना की फ़ुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया. वे बोका जूनियर्स और सैन्टोस जैसे क्लबों से भी खेले. 1973 में उन्होंने हुराकैन क्लब टीम के कोच के रूप में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. इसी की बदौलत उन्हें अर्जेंटीना की राष्ट्रीय टीम का ज़िम्मा मिला. वर्ष 1978 में उन्होंने टीम चयन में शानदार रणनीति बनाई और अपनी टीम को पहली बार विश्व कप का ख़िताब दिलवाया.

मेनोटी का यह योगदान इसलिए भी काफ़ी अहम हो जाता है, क्योंकि देश की राजनीतिक स्थिति उस समय ठीक नहीं थी और राजनीतिक कारणों से उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इस स्थिति में विश्व कप जीतना वाकई बड़ी चुनौती थी. उस समय अर्जेंटीना मेज़बान भी था और अपने घरेलू मैदान पर जीत हासिल करने का उसके पास सुनहरा मौक़ा था, जो उन्होंने हासिल भी किया.

विटोरियो पोत्सो

इटली के फ़ुटबॉल में पोत्सो का नाम काफ़ी सम्मान के साथ लिया जाता है. पोत्सो की प्रतिभा का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार दो विश्व कप में इटली को ख़िताबी जीत दिलवाई.

ये विश्व कप थे- 1934 और 1938 के विश्व कप. उनकी रणनीति काफ़ी लोकप्रिय हुई और काम की भी साबित हुई. इसी रणनीति की बदौलत उन्होंने लगातार दो विश्व कप में टीम को जीत दिलाई. उनकी रणनीति का ये भी फ़ायदा था कि टीम का डिफ़ेंस काफ़ी तगड़ा था और टीम आसानी से पलटवार भी कर सकती थी.

गुस्ताव शेबेश

हंगरी के फ़ुटबॉल का स्वर्ण युग शेबेश के काल में आया था. वे वर्ष 1952 के विश्व कप में राष्ट्रीय टीम के कोच थे. इस विश्व कप के फ़ाइनल में हंगरी की टीम जर्मनी से हार गई. लेकिन हंगरी ने उस विश्व कप में बड़ा उलटफेर करते हुए फ़ाइनल में जगह बनाई थी. पुश्काश और कॉचिश जैसे नामी खिलाड़ियों का उदभव भी उसी विश्व कप की देन है.

हंगरी ने वर्ष 1952 में ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीता. उस समय टीम के कोच शेबेश ही थे. शेबेश ने भी कई अच्छी रणनीतियाँ बनाई, जो फ़ुटबॉल में काफ़ी लोकप्रिय हुई.

सर अल्फ़्रेड अर्नेस्ट रैमसे

सर रैमसे पूर्व फ़ुटबॉल खिलाड़ी और इंग्लैंड की टीम के कोच थे. उन्हें वर्ष 1966 में इंग्लैंड के पहली और अब तक एकमात्र बार विश्व कप जीतने के लिए याद किया जाता है. इसके बाद ही उन्हें नाइटहुड से सम्मानित किया गया. फ़ुटबॉल खिलाड़ी के रूप में अपने करियर के दौरान वे काफ़ी प्रभावी डिफ़ेंडर थे.

लेकिन पेनल्टी लेने में भी उन्हें महारत हासिल थी. इसी कारण उन्हें 'जनरल ऑफ़ पेनल्टी' भी कहा जाता था. उन्हें टीम में युवा और बेहतरीन खिलाड़ियों को आगे लाने के लिए भी याद किया जाता है. टीम का कोच बनने के बाद उन्होंने टीम चयन में ख़ूब दखल दिया.

एमे ज़ैके

फ़्रांस टीम के कोच रहे ज़ैके ने पहली बार फ़्रांस को फ़ुटबॉल विश्व कप जीतने में अहम भूमिका निभाई थी. फ़्रांस ने वर्ष 1998 में अपनी धरती पर पहली बार विश्व कप जीता था. हालाँकि खिलाड़ी के रूप में भी ज़ैके ने बेहतरीन खेल दिखाया था. लेकिन उनका योगदान कोच के रूप में ज़्यादा रहा.

वर्ष 1993 में उन्हें कोच के रूप में फ़्रांसीसी टीम की ज़िम्मेदारी मिली थी. शुरू में उन्हें कोच बनाए जाने की काफ़ी आलोचना हुई थी. लेकिन बाद में उन्होंने कोच के रूप में अपनी उपयोगिता साबित कर दी.

मारियो ज़गालो

ज़गालो उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने फ़ुटबॉल खिलाड़ी और फ़ुटबॉल कोच- दोनों रूपों में अपनी काबलियत साबित की. उन्होंने एक खिलाड़ी, एक कोच और एक सहायक कोच के रूप में ब्राज़ील के लिए विश्व कप जीतने में सफलता पाई.

ये अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है. ब्राज़ील ने जब 1958 और 1962 में विश्व कप जीता, उस समय ज़गालो खिलाड़ी के रूप में टीम का हिस्सा थे. वर्ष 1970 में ब्राज़ील ने उनके कोच रहते विश्व कप जीता. जबकि 1994 में ब्राज़ील की ख़िताबी जीत के समय वे सहायक कोच थे.

लुईस फिलिप स्कोलारी

स्कोलारी भी दुनिया के मशहूर फ़ुटबॉल कोच में से एक हैं. उनके कोच रहते ब्राज़ील ने वर्ष 2002 में पाँचवीं बार ख़िताबी जीत हासिल की थी.

लेकिन 2002 के विश्व कप के बाद वे पुर्तगाल की टीम से जुड़ गए. यूरो 2004 में उन्होंने पुर्तगाल को फ़ाइनल तक पहुँचाया. वर्ष 2006 के विश्व कप में पुर्तगाल की टीम चौथे स्थान पर रही.

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