मास्टर चंदगी राम का निधन

  • 29 जून 2010
चंदगी राम
Image caption मास्टर चंदगी राम ने बैंकॉक के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता

भारत में कुश्ती को एक पहचान दिलाने वाले मास्टर चंदगी राम का निधन हो गया है.

हरियाणा के हिसार में 1937 में जन्मे चंदगी राम ने 21 साल की उम्र में कुश्ती लड़नी शुरू की थी. दसवीं पास करने और कला और शिल्प में डिप्लोमा प्राप्त करने वाले चंदगी राम ने भारतीय सेना के जाट रेजिमेंट में भी कुछ दिन काम किया.

इसके बाद वह एक स्कूल में अध्यापक के तौर पर रहे और तभी से उन्हें मास्टर का नाम मिला और वह मास्टर चंदगी राम के तौर पर जाने गए. हिंद केसरी, भारत केसरी, भारत भीम और रूस्तमे हिंद जैसे ख़िताबों के बाद उन्हें 1969 में अर्जुन पुरस्कार दिया गया.

मास्टर चंदगी राम के समय में भारत में कुश्ती पारंपरिक रूप से खेली जाती थी, जहाँ पहलवान एक दूसरे की जांघिया पकड़कर और मिट्टी के अखाड़ों में खेलते थे.

परंपरा बदली

चंदगी राम को पता था कि हर जगह गद्दों की तो व्यवस्था नहीं हो सकती मगर ओलंपिक में कुश्ती में हिस्सा लेने के लिए ज़रूरी है कि पहलवान अपने प्रतिद्वन्द्वी का जांघिया न पकड़ें और उन्होंने इस पर ज़ोर दिया. हालाँकि इसका विरोध भी हुआ पर आख़िरकार उनकी बात मानी गई.

गुरु हनुमान अखाड़े के कोच और गुरु द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित पहलवान महासिंह राव कहते हैं, “उन्होंने सबसे पहले ये कहा कि जांघिया पकड़ना बंद करो. हमने और कुछ और लोगों ने भी इसका विरोध किया मगर उनका कहना था कि जब ओलंपिक में जांघिया पकड़कर कुश्ती नहीं होती है तो हमारे बच्चे भी ये करना बंद करें.”

महा सिंह मानते हैं कि इसका फ़ैसला भी अच्छा आया जबकि सुशील कुमार जैसे पहलवान ने बीजिंग ओलंपिक में काँस्य पदक जीता. उनके अनुसार मास्टर चंदगी राम की सोच कुश्ती के प्रति दूरगामी थी.

मास्टर चंदगी राम के अंतरराष्ट्रीय जीवन का सबसे अहम पड़ाव 1970 में आया जबकि उन्होंने बैंकॉक में विश्व चैंपियन ईरान के अमवानी अबुफ़ाज़ी को हराकर एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता.

पद्म श्री

इसके बाद 1971 में उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया. मास्टर चंदगी राम ने 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था.

ओलंपिक में स्वर्ण पदक उनका सपना था और ये सपना पूरा करना चाहते हैं द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता और बीजिंग ओलंपिक में काँस्य पदक जीतने वाले पहलवान सुशील कुमार के कोच सतपाल.

वह कहते हैं, “जब सुशील का पदक आया था तो मास्टर जी हवाई अड्डे पर ख़ास तौर पर मिलने आए थे और उन्होंने हमें काफ़ी प्यार दिया था.”

पहलवान सतपाल के मुताबिक़, “मास्टर चंदगी राम कहते थे कि इस खेल में हमें स्वर्ण पदक मिलना चाहिए तो आज इस मौक़े पर हम यही प्रण करते हैं कि लंदन ओलंपिक में हम स्वर्ण पदक जीतने की पूरी कोशिश करें.”

मास्टर चंदगी राम ने सिर्फ़ पुरुषों ही नहीं बल्कि महिलाओं की कुश्ती को भी बढ़ावा दिया और ख़ुद उनकी बेटियाँ भी अखाड़े में उतरीं और उनकी बेटी पहली महिला भारत केसरी भी बनी थी.

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