नस्लवाद के प्रति असंवेदनशीलता

Image caption हार्वड की छवि कई देशों में दक्षिणपंथी व्यक्ति की रही है

यह बड़ी तकलीफ़ पहुँचाने वाली बात है कि क्रिकेट बिरादरी में 'गोरों के गुट' और उनके समर्थक अब भी रंगभेद और नस्लवाद से जुड़े मुद्दों को लेकर संवेदनशील नहीं हैं.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड को दुनिया भर में एक दक्षिणपंथी बल्कि नस्लवादी व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है, जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद आईसीसी के अध्यक्ष पद के लिए उनका नाम सामने आया तो कई लोग सकते में आ गए.

क्रिकेट की काली बिरादरी के लिए हावर्ड के कारनामों को पचा पाना आसान काम नहीं है, नस्लवादी अफ्रीका के ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाने का विरोध करने से लेकर आप्रवासियों के ख़िलाफ़ 2001 के चुनाव में भावनाएँ भड़काने और इराक़ युद्ध का समर्थन करने वाले हावर्ड के 'ब्लैक ब्लॉक' में लोकप्रिय होने के कोई आसार नहीं हैं.

यही वजह है कि दक्षिण एशियाई देशों, दक्षिण अफ्रीका और वेस्ट इंडीज़ ने उन्हें नकार दिया, इसके बाद ऑस्ट्रेलिया के कुछ निष्पक्ष माने जाने वाले क्रिकेट समीक्षकों ने जिस तरह की बातें लिखीं वो काफ़ी निराशाजनक हैं.

आईसीसी के प्रबंधन का समर्थन करना या पैसे की अपनी ताक़त से दूसरे लोगों की बोलती बंद करा देने वाले भारत की वकालत करने का मेरा कोई इरादा नहीं है.

भारत क्रिकेट के खेल के ज़रिए जो पैसे जुटाता है उसके दम पर वह दादागिरी करने लगा है, उसे अधिक ज़िम्मेदारी से पेश आना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है. ज़िम्बाब्वे में जो कुछ चल रहा है वह भी घृणित है.

शरद पवार आईसीसी के अध्यक्ष होने के लायक़ व्यक्ति हैं या नहीं, इस पर कोई बहस नहीं हो रही है. मैल्कम स्पीड पते की बात कर रहे हैं कि जिस व्यक्ति के ऊपर सवा अरब लोगों के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करने की ज़िम्मेदारी हो, उसके पास क्रिकेट के लिए वक़्त कहाँ होगा.

अगर वे क्रिकेट के लिए समय निकाल भी लेते हैं तो वह भारत के कृषि मंत्री के रूप में अपनी ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ करेंगे, अगर ऐसा होता है तो यह भारत के नागरिकों के लिए अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात होगी.

यही असली मुद्दे हैं जिन पर विचार होना चाहिए, इन मुद्दों पर मेरे विचार बाक़ी लोगों की तरह बहुत दृढ़ हैं.

लेकिन इसका ये मतलब नहीं हैं कि हावर्ड के ख़िलाफ़ राय ग़लत है, बहुत सारी ग़लतियाँ मिलकर सही नहीं हो जातीं. मज़ेदार बात है कि शरद पवार हावर्ड का समर्थन कर रहे थे, अगर भारत ने हावर्ड का समर्थन कर भी दिया होता तो दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, बांग्लादेश और यहाँ तक कि श्रीलंका का भी समर्थन उसे मिल पाता.

मुझे लगता है कि जो लोग हावर्ड का समर्थन कर रहे हैं उन्हें एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में पसंद करते हैं लेकिन वे इस मामले की जटिलता को नहीं समझ पाते हैं कि लोग हार्वड को कितना नापसंद करते हैं.

हावर्ड को नामांकित करके क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने यही दिखाया कि वह हमारे क्षेत्र के लोगों की भावनाओं से कितने अपरिचित और उसके प्रति कितने असंवेदनशील हैं.

अगर ऐसा नहीं होता तो उनको मालूम होता कि हावर्ड के नाम पर आईसीसी में रज़ामंदी बना पाना असंभव काम है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के लोगों के दुर्भाग्य से आईसीसी में बहुमत काले लोगों का है.

वे अब भी सच को नहीं समझ रहे हैं और भारत पर धनबल का इस्तेमाल करके हावर्ड के नामांकन को नाकाम करने का आरोप लगा रहे हैं, ऐसा करके वे क्रिकेट की बदहाल दुनिया को और बुरी हालत की ओर धकेल रहे हैं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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