क्या हुआ ब्राज़ील-अर्जेंटीना को?

Image caption लगता है कि ब्राज़ील की टीम मानसिक दबाव में थी

इस विश्व कप में दक्षिण अमरीका की दो शीर्ष टीमों का क्या हाल हुआ? क्यों हुआ?कहाँ कमी रह गई? क्यों लगातार दूसरे साल ब्राज़ील और अर्जेंटीना की टीम विश्व कप के क्वार्टर फ़ाइनल में ही क्यों निपट गई?

पहले दौर के मैचों की समाप्ति के बाद विश्व कप में जैसे दक्षिण अमरीकी देशों की तूती बोल रही थी. हर ओर उनकी ही चर्चा थी, ब्राज़ील की चर्चा थी, अर्जेंटीना की चर्चा थी, माराडोना और मेसी की चर्चा थी.

चलिए पहले ब्राज़ील की बात करते हैं. नीदरलैंड्स के ख़िलाफ़ मैच में 1-0 की बढ़त लेने के बावजूद पाँच बार की चैंम्पियन टीम की ऐसी भद्द पिटी की बहुतों को इसका भरोसा नहीं हुआ.

दक्षिण अफ़्रीका के एक फ़ुटबॉल प्रशंसक का कहना है, "पिछले वर्षों की तुलना में इस बार ब्राज़ील की टीम वैसी नज़र नहीं आ रही थी. जबकि नीदरलैंड्स की टीम ज़्यादा संगठित नज़र आ रही थी. हालाँकि हम सबको आश्चर्य हुआ लेकिन नीदरलैंड्स की टीम जीत की हक़दार थी."

लेकिन कहाँ कमी रह गई?

एक प्रशंसक ने कहा कि ब्राज़ीलियाई खिलाड़ियों ने जब ख़ुद से गोल कर लिया, उसी समय पासा पलट गया...जैसे ही उन्होंने देखा कि वे पिछड़ गए हैं, वे मानसिक रूप से नीदरलैड्स से पिछड़ गए. मानसिक दबाव तो ब्राज़ीलियाई खिलाड़ियों पर स्पष्ट रूप से दिख रहा था.

लेकिन पाँच बार विश्व चैम्पियन रही टीम को इतनी बड़ी प्रतियोगिता और इसके दबाव के बीच खेलने की आदत भी तो डालनी होगी. लेकिन लगता है खिलाड़ियों से यही चूक हो गई कि उन्होंने रणनीति के स्तर पर अच्छी तैयारी नहीं की.

एक ब्राज़ीलियाई समर्थक का कहना है कि कई खिलाड़ी रणनीति के हिसाब से नहीं खेल रहे थे. इनमें काका भी शामिल हैं. और जब उन्होंने ये बात समझी और अच्छा खेलना शुरू किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. शुरू में तो वे ऐसे खेल रहे थे जैसे एक गोल मार देने के बाद बस वे जीत ही गए हैं.

अर्जेंटीना का हाल

कुछ ऐसा ही हाल अर्जेंटीना के खिलाड़ियों का हुआ, जब वे जर्मनी के ख़िलाफ़ उतरे.

Image caption मेसी का जादू चल नहीं सका

एक नाराज़ समर्थक ने कहा, "मेरा मानना है कि उन्होंने जर्मन खिलाड़ियों को हल्के में लिया...उनकी टीम में मेसी और हिग्वेन जैसे खिलाड़ी थे. वे यह सोच रहे थे वे निश्चित रूप से यह मैच जीत जाएँगे. लेकिन जर्मनी की टीम भावना ने ये मैच आसानी से जीत लिया."

अर्जेंटीना के एक समर्थक को इतने दुखी थे कि उन्होंने ये कहा कि अर्जेंटीना के लिए हर चीज़ ग़लत साबित हुई.

उन्होंने कहा, "हमारे लिए हर चीज़ ग़लत साबित हुई. मेरा मानना है कि हम एक खिलाड़ी पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर थे. हमारी डिफ़ेंस लाइन अच्छी नहीं थी और जर्मनी से पहले इसकी परख भी नहीं हो पाई और जब हमारे सामने अच्छी टीम आई तो पोल खुल गई."

खिलाड़ियों और टीम की रणनीति के अलावा दोनों टीमों के कोच पर भी सवाल उठे हैं. ब्राज़ील के कोच डूंगा और अर्जेंटीना के कोच माराडोना खिलाड़ी के रूप में विश्व विजेता टीम का हिस्सा रहे हैं.

लेकिन कोच के रूप में टीम को विश्व विजेता बनाने का उनका ख़्वाब चकनाचूर हो गया.

लेकिन भारतीय मूल के रसूल का तो सीधा-सादा तर्क है. वो चाहे माराडोना हों या डूंगा.

रसूल ने कहा, "महान खिलाड़ी महान कोच नहीं हो पाता..ऐसा न क्रिकेट में हुआ है और न ही फ़ुटबॉल में. ऐसा बहुत कम होता है. महान कोच तो वो होता है जो विपक्षी टीम को हराने के लिए रणनीतिक रूप से काम करता है और मैं नहीं समझता कि माराडोना या डूंगा के पास ये गुण हैं."

विश्व कप जैसी प्रतियोगिता के इस अहम मोड़ पर आकर दक्षिण अमरीका की दो शीर्ष टीमों के हारने के कारण इनकी शैली, इनके खेल और इनकी तकनीक पर काफ़ी सवाल उठे हैं.

क्यों हुआ ऐसा ब्राज़ील और अर्जेंटीना के साथ? एक ब्राज़ीलियाई समर्थक को तो अब भी इसका भरोसा नहीं.

वे कहते हैं, "मैं अब भी चकित हूँ. मैंने सोचा था कि ब्राज़ील और अर्जेंटीना के बीच फ़ाइनल खेला जाएगा. अर्जेंटीना के ख़िलाफ़ जर्मनी और ब्राज़ील के ख़िलाफ़ नीदरलैंड्स ज़्यादा संगठित टीमें थी और दक्षिण अमरीकी देशों को यही अंतर मात दे रहा है."

टीमवर्क की कमी?

लेकिन एक आरोप जो अफ़्रीकी टीमों पर लगा था, वही आरोप अब दक्षिण अमरीकी देशों पर लग रहा है. व्यक्तिगत खेल टीम वर्क पर हावी हो रहा है. एक जर्मन समर्थक ने काफ़ी गंभीर बातें कहीं.

उन्होंने कहा, "दक्षिण अमरीकी देश कुछ खिलाड़ियों पर निर्भर करते हैं. जैसे अर्जेंटीना हिग्वेन, तेवेज़ जैसे खिलाड़ियों पर. लेकिन जर्मनी और नीदरलैंड्स की बात करें तो उनकी पूरी की पूरी टीम अच्छा खेल रही है.एक या दो खिलाड़ी नहीं. इसलिए जर्मनी, नीदरलैंड्स और स्पेन जैसी टीमें आगे बढ़ रही हैं और दक्षिण अमरीकी देश पिछड़ रहे हैं."

लेकिन अर्जेंटीना के समर्थक तो टीम से इतने नाराज़ हैं कि उन्होंने टीम और खिलाड़ियों के रुख़ पर सवाल उठा दिया.

वे कहते हैं, "मेरा मानना है कि उनका अक्खड़पन इसकी प्रमुख वजह है. दक्षिण अफ़्रीकी खिलाड़ियों की तरह दक्षिण अमरीकी टीमें ये सोचती हैं कि उनके पास अच्छा कौशल है और इसके भरोसे वे कुछ भी कर सकते हैं. जर्मनी और नीदरलैंड्स की टीमें काफ़ी कसी हुई टीमें हैं, संगठित हैं. जर्मनी के ख़िलाफ़ अर्जेंटीना ने अपने कौशल पर भरोसा किया और बार-बार आगे गए और डिफ़ेंस को भूल गए."

बड़ी प्रतियोगिता में हार बहुत कुछ सवाल उठाती है, आत्मविश्लेषण का लंबा-चौड़ा दौर चलता है, खिलाड़ी टीम से हटाए जाते हैं, कोच की पद से छुट्टी हो जाती है, लेकिन अपनी टीम से इतनी उम्मीद लगाए लंबा सफ़र करके दक्षिण अफ़्रीका पहुँचे लोगों के लिए तो विश्व कप यहीं ख़त्म हो गया है.

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