फ़ुटबॉल में बदलेगा 'रेफ़री सिस्टम'

  • 9 जुलाई 2010
फ़्रैंक लैम्पार्ड का वह गोल जो माना नहीं गया
Image caption अब बॉल पर नज़र रखने के लिए अतिरिक्त इंतज़ाम किए जाएँगे

दुनिया भर में फ़ुटबॉल की नियामक संस्था फ़ीफ़ा ने विश्वकप में टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल के संकेत देते हुए कहा है कि इस समय चल रहा विश्वकप वर्तमान रेफ़री व्यवस्था के अंतर्गत आख़िरी विश्वकप होगा.

फ़ीफ़ा के महासचिव जेरोम वाल्के ने बीबीसी से कहा कि 2014 के विश्वकप से पहले रेफ़री सिस्टम में परिवर्तन कर दिए जाएँगे.

वाल्के का कहना है टीवी के रिप्ले से पता चलता है कि इंग्लैंड के फ़्रैंक लैंपार्ड ने जर्मनी के ख़िलाफ़ गोल कर लिया था लेकिन उसे गोल नहीं माना गया और वह आयोजकों के लिए एक 'ख़राब दिन' था.

उन्होंने कहा, "हम एक ऐसे गोल के बारे में बात कर रहे हैं जिसे रेफ़री ने नहीं देखा और इसीलिए हम टेक्नॉलॉजी के बारे में बात कर रहे हैं."

नीति में परिवर्तन

फ़ीफ़ा के महासचिव ने कहा है कि भविष्य में विश्वकप में गोल लाइन के पास दो अतिरिक्त रेफ़री रखे जा सकते हैं. पिछले यूरोपा लीग में ऐसा प्रयोग किया गया था और अगले चैंपियंस लीग में इसका प्रयोग होना है.

उन्होंने कहा, "हमें देखना होगा कि रेफ़री को चार जोड़ी अतिरिक्त आँखें दे देने से उसे अपना काम करने में आसानी होती है या नहीं."

वाल्के ने कहा, "मैं कह सकता हूँ कि मौजूदा रेफ़री सिस्टम के तहत ये आख़िरी विश्वकप है."

वाल्के के इस बयान को फ़ीफ़ा की नीतियों में परिवर्तन की तरह से देखा जाएगा क्योंकि गत मार्च में अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल एसोसिएशन बोर्ड (आईफ़ैब) ने गोल लाइन टेक्नॉलॉजी और अतिरिक्त रेफ़री के सुझाव को नकार दिया था.

लेकिन फ़ीफ़ा के महासचिव रेफ़री की पूरी व्यवस्था को ही बदल देना चाहते हैं.

उन्होंने कहा, "टीम और खिलाड़ी बहुत मज़बूत और तेज़ हैं. अब खेल बदल गया है और रेफ़री सभी खिलाड़ियों की तुलना में अधिक उम्र के हैं."

वे कहते हैं, "खेल की रफ़्तार इतनी ज़्यादा है और बॉल इतनी तेज़ी से घूमती है कि हमें रेफ़री की सहायता करनी होगी और इसके लिए कुछ करना होगा इसलिए मैं कह रहा हूँ कि वर्तमान रेफ़री सिस्टम के तहत यह आख़िरी विश्वकप होगा."

नया नज़रिया

फ़ीफ़ा के अध्यक्ष सेप ब्लैटर लगातार गोल-लाइन टेक्नॉलॉजी और टीवी रिप्ले के उपयोग को ख़ारिज करते रहे हैं क्योकि उनका कहना है कि मानवीय भूल हमेशा से खेल का हिस्सा रहा है.

जो लोग टेक्नॉलॉजी का विरोध कर रहे हैं वे कहते रहे हैं कि यदि टेक्नॉलॉजी का उपयोग होना है तो इसे सभी स्तर के खेलों में लागू करना होगा.

लेकिन इंग्लैंड की जर्मनी के हाथों हुई 4-1 से हार में लैंपार्ड के गोल के योगदान और मैक्सिको के ख़िलाफ़ अर्जेंटीना के कार्लोस तेवेज़ के ऑफ़साइड गोल से मिली 3-1 की जीत ने ब्लैटर को अपना रूख़ बदलने पर मजबूर कर दिया है. और अब वे कह रहे हैं कि टेक्नॉलॉजी की फ़ाइल न खोलना 'बेवकूफ़ी' होगी.

आईफ़ैब फ़ुटबॉल के खेल के लिए नियम बनाने वाली संस्था है. इस संस्था में फ़ीफ़ा के चार प्रतिनिधियों के रूप में इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और वेल्स के सदस्य हैं और इसकी अगली बैठक 21 जुलाई को होने जा रही है.

Image caption इस तरह के डिफेंस के मामलों पर भी विचार होगा फ़ीफ़ा की अगली बैठक में

हालांकि वाल्के का कहना है कि अक्तूबर में होने वाली बैठक से पहले टेक्नॉलॉजी के सवाल पर गंभीर चर्ची की संभावना नहीं है.

गत मार्च में आईफ़ैब के सामने दो कंपनियों ने अपनी टेक्नॉलॉजी का प्रदर्शन किया था जो दावा कर रहे हैं कि वे सटीक ढंग से यह बता सकते हैं कि बॉल ने कब गोल लाइन पार की.

लेकिन इसे ख़ारिज कर दिया गया था.

काइरोज़ कंपनी की गोल-लाइन टेक्नॉलॉजी के तहत फ़ुटबॉल में एक माइक्रोचिप लगाया जाता है, फ़ुटबॉल के इर्दगिर्द चुंबकीय क्षेत्र पैदा किया जाता है और दूसरी कंपनी हॉक-आई की टेक्नॉलॉजी में छह टेलीविज़न कैमरों से बॉल पर नज़र रखी जाती है.

इन तकनीकों का प्रयोग फ़ीफ़ा ने वर्ष 2007 में जापान में हुई वर्ल्ड कप चैंपियनशिप के समय करके देखा था लेकिन उनके इस दावे के बावजूद कि प्रयोग सफल रहा आईफ़ैब ने इसे ख़ारिज कर दिया था.

इस पर वर्ष 2009 में एक बार फिर चर्चा हुई लेकिन फिर से इसे नकार दिया गया.

हॉक आई और काइरोज़ दोनों का कहना है कि इस तकनीक की क़ीमत को लेकर कोई परेशानी नहीं है क्योंकि दोनों ही कंपनियाँ स्पॉन्सरशिप राइट्स में हिस्सा देने के बदले यह तकनीक देने को राज़ी हैं.

आईफ़ैब ने इस प्रस्ताव को भी ख़ारिज कर दिया था कि दोनों और गोल लाइन पर दो अतिरिक्त रेफ़री तैनात कर दिए जाएँ.

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