कमाल के हैं धोनी

  • 10 जुलाई 2010
साक्षी और महेंद्र सिंह धोनी
Image caption धोनी ने अपनी शादी से मीडिया को दूर ही रखा.

महेंद्र सिंह धोनी के खेल की इमारत ग़ैर-परंपरागत नींव पर टिकी हुई है. वे क्रिकेट की तकनीक के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, अपने बल्ले को घुमाने के लिए ताक़त का प्रयोग करते हुए गेंद को सीमा-रेखा से बाहर भेजते हैं.

विकेट के पीछे उनका हुनर उनकी बल्लेबाज़ी से थोड़ा बेहतर हो सकता है लेकिन वो टीम की कप्तानी एक निरंकुश कल्पनाशीलता के साथ करते हैं. मैदान पर उनके बहुत से निर्णयों का तर्क मैच का अंतिम फ़ैसला होने पर ही समझ में आता है.

जब उनके फ़ैसले काम कर जाते हैं तो लोग उनकी तारीफ़ों के पुल बांधते हैं और जब काम नहीं करते तो उन्हें ख़ासी आलोचना का सामना करना पड़ता है.

लेकिन अधिकतर बार धोनी कामयाब रहते हैं. वे ‘अगर मैं नहीं जीत सकता तो तुम्हें भी नहीं जीतने दूंगा’ वाले मुहावरे को मानने वाली खेलों की निष्ठुर दुनिया से विपरीत एक बेहद कामयाब जुआरी हैं.

विनम्र पृष्ठभूमि

उनकी विनम्र पृष्ठभूमि धोनी के व्यक्तित्व की रहस्यात्मकता और प्रभाव में चार चांद लगाते हैं, जबकि आमतौर पर ये माना जाता है कि ऐसी पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों को शहरों में पढ़े-लिखे अन्य खिलाड़ियों के साथ जमने में दिक्कतें आ सकती हैं.

Image caption धोनी अपने साथी क्रिकेट खिलाड़ियों को काफ़ी पीछे छोड़ गए हैं.

धोनी ने कामयाबी की होड़ में एक-दूसरे की नकल करते अपने साथियों की भीड़ को अपनी शर्तों पर मात ही नहीं दी बल्कि वे उनसे कहीं आगे भी निकल गए.

धोनी ने एक ऐसा काम भी किया है जो अक़्सर कद्दावर सेलेब्रिटी नहीं कर पाते. उन्होंने अपनी सोच-विचार और व्यक्तिगत जीवन में कभी भी किसी को झांकने के इजाज़त नहीं दी है. वे कभी किसी पत्रकार के सामने भी नहीं खुले हैं और पत्रकारों को अक़्सर उनके जीवन के बारे में दूसरे स्रोतों से पता करना पड़ता है.

अपनी शादी से मीडिया को दूर रखकर उन्होंने एक बार फिर ये मज़बूती के साथ साबित कर दिया है कि वे अपने व्यक्तिगत जीवन की कद्र करते हैं और वे हमेशा उसे ऐसे ही सुरक्षित रखेंगे, चाहे उन्हें उन लोगों को भी चिढ़ाना पड़े जो ताक़तवर हैं और धोनी को अपना दोस्त समझते हैं.

हिम्मत वाला काम

मीडिया और विशेषकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया ऐसे मौक़ों की तलाश में रहता है लेकिन उन्हें उनकी ख़ुराक से दूर रखना एक हिम्मत वाला काम है.

हम एक बहुत ही प्रतिस्पर्धी विश्व में रहते हैं जहां अधिकतर लोग एक-दूसरे के फ़ायदे की बात करके काम चलाते हैं यानि ‘तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्हारी’. इस नियम को चुनौती देने की हिम्मत करने वाले को एक जोख़िम के साथ ही जीना पड़ता है.

जहां तक धोनी की बात की जाए तो वे क्रिकेट के मैदान पर जीए ही नहीं बल्कि फले-फूले भी हैं. वे इस समय अपनी ताक़त के चरम पर हैं और लोगों को उनकी ज़्यादा ज़रुरत है बजाय कि उन्हें किसी की. जब उनकी उम्र ढलने लगेगी और उनका पतन शुरु होगा तब लोग उनसे कैसा व्यवहार करते हैं इसका अनुमान लगाना मुश्किल है.

फ़िलहाल ‘इलेक्ट्रॉनिक आंख’ के छलने और अपने निजी मामले को ‘तमाशा’ नहीं बनने देने के लिए महेंद्र सिंह धोनी प्रशंसा के पात्र हैं.

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