क्रिकेट गुलज़ार, हॉकी शर्मसार

  • 24 जुलाई 2010
मुरलीधरन

मैं उस खिलाड़ी के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लिखना चाहता हूं जो अपनी कलाई को किसी धुरी के तरह घुमाते हुए गेंद को मन-मुताबिक़ मोड़ और उछाल सकते हैं.

क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कोई नहीं कर सका है. इसके अलग हॉकी में हो रहे आरोप-प्रत्यारोप से भी मैं आहत हूँ.

मुथैया मुरलीधरन की बंद कोहनी और लचीली कलाई ने गेंद के घुमाव और कोण की ज्यामिति को दोबारा से परिभाषित किया, ऐसी सफलता हासिल कर पाना शायद किसी क्रिकेटर के लिए संभव न हो.

ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ़ आँकड़ों के आधार पर ही महान खिलाड़ियों में हमेशा सबसे अलग रहे हैं.

उनका खेल देखना हमेशा से रोमांचक रहा है और अच्छे-अच्छे बल्लेबाज़ को पशोपेश में डालता रहा है.

ऐसा नहीं है कि वे डरावने अंदाज़ में दौड़ लगा कर गेंदबाज़ी करते हैं बल्कि धीमे और सौम्य तरीक़े से गेंदबाज़ी करते हैं. इसलिए उन्हें और शेन वॉर्न जैसे महान खिलाड़ियों को हमेशा खेलते रहना चाहिए. मुथैया जैसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी के गुणों के बखान करने के लिए मुझसे ज़्यादा काबिल लोग हैं इसलिए मैं इसे यही छोड़ता हूं और अपने खेलों के बारे में बात करता हूं.

बीमार हॉकी

अभी तक यह कह पाना मुश्किल है कि एमके कौशिक पर यौन प्रताड़ना के आरोप सही हैं या ग़लत. एक ऐसे व्यक्ति जो बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ एक अच्छे कोच भी रह चुके हैं, उनको बिना किसी साक्ष्य के कठघरे में खड़ा करना ठीक नहीं होगा.

Image caption हॉकी ने एक बार फिर ग़लत कारणों से सुर्ख़ियाँ बटोरी

खिलाड़ियों ने उनपर जो आरोप लगाए हैं उसमें वे वास्तव में दोषी हैं या उन्हें फंसाया गया है?

कुछ भी हो ये भारतीय खेलों के बेशर्म चेहरे का उदाहरण है जहाँ अपने हितों के लिए खिलाड़ियों के शोषण और अपने विरोधियों को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

इस मुद्दे पर हमें केपीएस गिल के उपदेश की ज़रूरत नहीं है, जिसे अदालत यौन प्रताड़ना का दोषी करार दे चुके हैं.

इतना ही उनके कार्यकाल में जब वे हॉकी महासंघ के अध्यक्ष थे तब उनके सचिव ज्योतिकुमारन को खिलाड़ी के चुनाव के लिए पैसे की मांग करते हुए हर किसी ने देखा था.

ना तो हमें विद्या स्टोक्स जैसी राजनीतिज्ञ की ज़रूरत है जो हॉकी प्रबंधन में बने रहने के लिए खेलमंत्री के दिशा-निर्देशों पर सवाल उठा रही है.

विद्या स्टोक्स को हिमाचल विधानसभा के विपक्ष की नेता के रूप में अपने काम पर ध्यान देना चाहिए न कि अपनी ही पार्टी के सरकार के खेल मंत्री के काम-काज पर सवाल उठाकर उनको लज्जित करना चाहिए, जिस दिशा-निर्देश से देश के खेल प्रबंधन को ज़िम्मेदार बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

हॉकी महासंघ के अध्यक्ष पद के लिए उनकी उम्र उन्हें अयोग्य ठहरा रही है लेकिन वे अड़ी हुई है और वैसे व्यक्ति के विरोध में खड़ी हो रही है जिसके लिए देश का हरेक खेल प्रेमी चाहता होगा कि वह इस खेल का प्रमुख बने और यह बात मैं दावे से कह सकता हूं.

मुझे यह विश्वास है कि भारत के और विश्व के बेहतरीन खिलाड़ी परगट सिंह जिस दिन हॉकी के प्रमुख बनने की मंशा ज़ाहिर करेंगे उस दिन हॉकी का पूरा कुनबा ख़ुशी-ख़ुशी उनका स्वागत करेगा.

उन्होंने भारत के लिए न सिर्फ़ बेहतर खेल खेलें बल्कि पंजाब के खेल निदेशक के तौर पर भी अपने आपको बेहतर प्रबंधक के रूप में प्रमाणित किया है.

इस समय हॉकी को परगट सिंह सरीखे ईमानदार लोग की ज़रूरत है, जिसकी कोशिश से बेकार लोगों को हटाया जा सके. उनके नाम का विरोध होना ही भारतीय खेलों के बीमार होने का बोध कराता है.

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