लालगढ़ का खिलाड़ी

पूर्णेंदु राय

पंद्रह साल के पूर्णेंदु राय ने कभी पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता तक को नहीं देखा.

वो माओवादी गतिविधियों और सुरक्षाबल के जवानों के अभियान की वजह से सुर्खियों में रहे पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में रहता है. लेकिन अपने कलात्मक खेल के जरिए वह अब जर्मनी जाने की तैयारी कर रहा है.

आखिर यह हुआ कैसे? दरअसल, राज्य पुलिस ने इलाक़े के बेरोज़गार युवकों को माओवादी संगठन में शामिल होने से रोकने के लिए लालगढ़ कप नामक एक फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन किया था.

टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को मशहूर जर्मन क्लब बायर्न म्युनिख के साथ दस दिनों के प्रशिक्षण के लिए भेजने का एलान पहले ही कर दिया गया था.

इस फुटबाल टूर्नामेंट में इलाके की आठ टीमों ने हिस्सा लिया. टूर्नामेंट जीता लालगढ़ रामकृष्ण विद्यालय की टीम ने.

टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया पूर्णेंदु राय और अब वो सरकारी खर्चे पर जर्मनी जाने की तैयारियों में जुटा है.

उसकी खुशियों का कोई ठिकाना है. उसे अब भी इस बात का भरोसा नहीं हो रहा है कि वह जर्मनी जाकर अपने मनपसंद खिलाड़ियों से मुलाक़ात कर सकता है.

वह कहता है,''मैं बेहद खुश हूं. एक दिन में ही मेरी ज़िंदगी बदल गई है. जब मुझे टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने जाने का एलान किया गया तो मुझे अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हुआ.''

इसी साल बारहवीं की परीक्षा पास करने वाले राय का परिवार ग़रीब है.

आगे पढ़ाने का साधन नहीं होने की वजह से अब वह घर में ही पढ़ता है. खाली समय में वह फुटबाल खेलता था. अब यही हुनर उसकी विदेश यात्रा का पासपोर्ट बन गया है.

वह कहता है,''मैं जर्मनी जाने वाला लालगढ़ इलाके का पहला व्यक्ति हूं. वहां मैं अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से मुलाक़ात करना चाहता हूं. राय के घरवाले भी खुश हैं.''

लालगढ़ इलाके में माओवादी और सुरक्षा बल के जवानों के बीच फंसे युवकों के सिर पर हमेशा खतरे की तलवार लटकती रहती है. कभी माओवादी उनको अपने संगठन में शामिल होने के लिए दबाव बनाते हैं तो कभी पुलिस उन पर माओवादी होने का संदेह करती है.

खुशियाँ ही खुशियाँ

पूर्णेंदु के पिता बसंत राय को उम्मीद है कि अब शायद उसके बेटे का भविष्य संवर जाएगा. वे कहते हैं कि यह बेहद खुशी की बात है.

पश्चिम मेदिनीपुर जिले के पुलिस अधीक्षक मनोज वर्मा कहते हैं कि इलाके के युवकों के पास खेलकूद और रोजगार के कोई मौके नहीं हैं. इसलिए हमने इस टूर्नामेंट का आयोजन किया था. इसे स्थानीय लोगों का भारी समर्थन मिला है.

ऐसे आयोजनों से पुलिस के प्रति स्थानीय लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा.

वे बताते हैं, ''इस टूर्नामेंट के बाद हमने लोगों को पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी. इलाक़े के ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी नहीं थी. पुलिस की ओर से आगे दूसरे इलाक़ों में भी ऐसे टूर्नामेंट आयोजित किए जाएंगे.''

वर्मा कहते हैं कि बायर्न म्युनिख क्लब के अधिकारियों के साथ इस प्रशिक्षण के सिलसिले में पहले ही बात हो चुकी है. राय के आने-जाने का तमाम खर्च राज्य सरकार वहन करेगी. जल्दी ही उसका पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी.

दिलचस्प बात यह है कि जिस नक्सल नेता छत्रधर महतो ने पुलिस अत्याचार के ख़िलाफ़ आंदोलन की कमान थामी थी उसके पुत्र धृति महतो ने भी इस टूर्नामेंट में हिस्सा लिया.

उसने कहा, ''मुझे फुटबाल खेलना अच्छा लगता है. इस टूर्नामेंट से इलाके में खेलकूद को बढ़ावा मिलेगा. मैं आगे भी खेलना चाहता हूं.''

फुटबाल के जरिए जर्मनी का टिकट पाने के बावजूद पूर्णेंदु आगे चल कर सेना में भर्ती होना चाहता है. वह कहता है, ''फुटबाल तो मैं शौकिया खेलता था. मेरा लक्ष्य सेना में भर्ती होना है.''

क्या राय की किस्मत खुलते देख कर इलाक़े के दूसरे युवक भी माओवादियों की बजाए पुलिस का साथ देने आगे आएंगे? कम से कम बंगाल के आला पुलिस अधिकारियों को तो यही उम्मीद है.

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