खेलों के आयोजन के नाम पर खेलकूद बंद

  • 14 अगस्त 2010

सरकारी खेल परिसरों में शाम-सवेरे दिल्ली के युवाओं और बुज़ुर्गों को शारीरिक ऊर्जा बढ़ाने के लिए साथ-साथ खेलकूद की गतिविधियों में शामिल देखना सुखद अनुभव देता है.

बुज़ुर्गों के लिए ये पराश्रित होने की बात को भूल कर खेल के मैदान में उल्लास दिखाने का अवसर होता है, जिसके फ़ायदों को इंद्रियगोचर तरीक़े से मापना संभव नहीं जोकि एक महत्वाकांक्षी युवा के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात होती है.

उन लोगों के लिए जिन्होंने अपने आसपास की दुनिया से अवगत होना शुरू ही किया है, ये वो जगह है जहाँ वे रैकेट या बैट पकड़ने या गेंद को ढंग से खेलने की कला का पहला पाठ पढ़ते हैं.

डीडीए निर्मित इन परिसरों को पेशेवर लोग कुशलता से संभाल रहे हैं. ये दिल्ली की उन गिनीचुनी जगहों में से हैं जहाँ एक बड़ी रकम ख़र्च किए बिना आप खेल सकते हैं.

शौक पर विराम

ऐसे समय में जब कि दिल्ली में हर ओर राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजकों या पखवाड़े भर के इस आयोजन के लिए बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने वालों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की ही चर्चा है, इन परिसरों में खेलने आने वालों को उस समस्या की चिंता है जो कि उनके शौक पर विराम लगा सकती है.

Image caption राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ दिया गया है

पिछले हफ़्ते इन लोगों को पता चला कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के सिलसिले में इन परिसरों को दो महीने के लिए बंद किया जा सकता है. उनके लिए शुद्ध मनोरंजन के इस एकमात्र ज़रिये को छीनने वालों के ख़िलाफ़ उनकी आवाज़ में अविश्वास, सदमे के साथ-साथ ग़ुस्से का भाव भी साफ़ देखा जा सकता है.

बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार और आयोजकों की अक्षमता को लेकर पहले से ही उबल रहे ये लोग अब भी सब कुछ भूलने और माफ़ करने को तैयार हैं यदि उन्हें अपने शौक पूरा करने से नहीं रोका जाए.

राष्ट्रमंडल खेलों को ये महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि ये राष्ट्रीय गौरव से जुड़ा हुआ है. लेकिन किसी प्रसिद्ध या लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के भाग नहीं लेने की बात को जानने के बाद उनमें राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर सचमुच का उत्साह नहीं है.

उपेक्षा ने ग़ुस्से का रूप लिया

इन सारी बातों को देखते हुए उनका उपेक्षा भाव अब ग़ुस्से का रूप ले चुका है(जो रोज़ खेलते-कूदते हैं उनसे पूछिए), ख़ास कर उन परिसरों में जिन्हें कि बंद किया जा रहा है.

उन्हें लगता है कि उनकी खेलकूद की गतिविधियों को लंबी अवधि तक रोके जाने से तो बेहतर था कि राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन ही नहीं होता जो कि उनकी नज़र में खज़ाने की लूट का खेल बन कर रह गया है.

मैंने इस मुद्दे की विस्तार से चर्चा इसलिए की है ताकि आयोजन को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ने वालों और शहर में रहने वाले उनलोगों के बीच बनी एक बड़ी खाई की बात को उभारा जा सके जो कि असह्य भारी ट्रैफ़िक और बढ़ते करों के कारण तेज़ होती महंगाई की मार से त्रस्त हैं. और अब तो जिनका खेलकूद से संबंध है वो भी ग़ुस्से से बलबला रहे हैं.

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