हाशिए पर विकलांग खिलाड़ियों की ज़रूरतें?

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दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में एक छोटी सी दुकान में बैठी सुवर्णा राज बड़ी कुशलता से दुकान का कामकाज संभालती हैं.उन्हें देखकर पहली बार ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि वे टेनिस खिलाड़ी हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा वाले विकलांग खिलाड़ियों की संभावित सूची में शामिल है.

सुवर्णा सुबह से दोपहर तक दुकान का काम करती हैं और फिर दोपहर को यही हाथ राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए टेबल टेनिस का रैकेट थाम लेते हैं.

बहुत से लोगों को तो ये भी जानकारी नहीं है कि इस बार राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान ही विकलांग खिलाड़ियों के भी मुकाबले होंगे. इस वर्ग में जीते गए पदक किसी भी देश की पदक तालिका का हिस्सा बनेंगे.कुल 15 श्रेणियों में 45 पदक दांव पर लगे हैं.

सरकार की ओर से अब तक हमें व्हील चेयर तक नहीं दिलावई गई है. मैने कॉलेज की एक शिक्षक की मदद से चेयर ख़रीदी है. कैंप में खाना ऐसा मिलता था कि तबीयत खराब हो गई थी, न तो टेबल टेनिस रैकट दिए गए हैं. कोच ऐसे हैं कि उनके पास कोई अनुभव नहीं है. एक कोच ऐसे थे जो लॉन टेनिस के थे. अभी एक खिलाड़ी को कोच बना दिया गया है

सुवर्णा राज

विश्व भर से कम से कम चार हज़ार विकलांग खिलाड़ी भारत आएँगे. सवाल है कि क्या भारत में, यहाँ के स्टेडियमों में ऐसे खिलाड़ियों की विशेष ज़रूरतें पूरी करने के लिए सुविधाएँ हैं?

क्या राष्ट्रमंडल खेलों के लिए विकलांग खिलाड़ियों की तैयारी पर उचित ध्यान दिया गया है? हमने खिलाड़ियों से मिलकर जानने की कोशिश की. टेबल टेनिस खिलाड़ी सुवर्णा राज खेल प्रशासन से खास़ी नाराज़ हैं. सुवर्णा के मुताबिक प्रशिक्षण के लिए उन्हें निजी कोच रखना पड़ा है. इसके लिए उन्हें ओएनजीसी ने आर्थिक सहायता दी है और कोच के रहने खाने का ख़र्च वे ख़ुद उठा रही हैं.

उनका आरोप है,"सरकार की ओर से अब तक हमें व्हील चेयर तक नहीं दिलावई गई है. मैने कॉलेज की एक शिक्षक की मदद से चेयर ख़रीदी है. कैंप में खाना ऐसा मिलता था कि तबीयत खराब हो गई थी, न तो टेबल टेनिस रैकट दिए गए हैं. कोच ऐसे हैं कि उनके पास कोई अनुभव नहीं है. एक कोच ऐसे थे जो लॉन टेनिस के थे. अभी एक खिलाड़ी को कोच बना दिया गया है."

कैसे रहेंगे अंतराष्ट्रीय एथलीट?

ज़ाहिर आरोप गंभीर है. हमने खेल मंत्रालय से इस मुद्दे पर बात करने के लिए संपर्क किया.पहले तो कहा गया कि आप रिकॉर्डर के बिना मिलने आ जाएँ लेकिन बाद में कोई जवाब नहीं दिया.

अगर स्टेडियमों की बात करें तो विकलांग एथलीटों के लिए ख़ास सुविधाओं का होना ज़रूरी है-जैसे व्हीलचेयर, रैंप, विशेष बसें आदि.

प्रशिक्षण पर तो हमसे खेल मंत्रालय ने बात नहीं की पर भारतीय खेल प्राधिकरण का दावा है कि स्टेडियम के निर्माण में ऐसे खिलाड़ियों का विशेष ध्यान रखा गया है. अधिकारी एचएस कींगरा कहते हैं, "हमने स्टेडियमों में विशेष शौचालय, चेंजिंग रूम और आने-जाने के लिए सीढ़ीरहित रास्ते बनाए हैं. विकलांग दर्शकों के लिए भी रैंप हैं, व्हीलचेयर चलाने वालों के लिए प्रावधान है."

लेकिन विकलांग लोगों के अधिकारों से लड़ने वाली संस्थाओं का कहना है कि इतना भर काफ़ी नहीं है.

क्या विदेशों से आने वाले खिलाड़ियों को खेल गाँव में क़ैद करके रखेंगे और कहेंगे कि आपको कहीं जाने की अनुमति नहीं है? ज़ाहिर है वो दिल्ली देखना चाहेंगे, स्टेडियम से बाहर जाएँगे. पर क्या दिल्ली के सार्वजनिक स्थलों में ये सुविधाएँ हैं कि विकलांग लोग वहाँ जा सकें. क्या आप उन्हें कहेंगे कि नहीं जा सकते क्योंकि हमारे पास सुविधाएँ नहीं हैं?

जावेद आबदी

जावेद आबदी स्वंय विकलांग हैं और पिछले कई वर्षों से विकलांगों के अधिकारों के लिए काम करते हैं. उनका सवाल है, "क्या विदेशों से आने वाले खिलाड़ियों को आप खेल गाँव में क़ैद करके रखेंगे और कहेंगे कि आपको कहीं जाने की अनुमति नहीं है? ज़ाहिर है वो दिल्ली देखना चाहेंगे, स्टेडियम से बाहर जाएँगे. पर क्या दिल्ली के सार्वजनिक स्थलों में ये सुविधाएँ हैं कि विकलांग लोग वहाँ जा सकें. पूरी दिल्ली तो ख़ुदी पड़ी है. अकसर खिलाड़ी ताज महल वगैरह जाना चाहते हैं. तो आप उन्हें कहेंगे कि नहीं जा सकते क्योंकि हमारे पास सुविधाएँ नहीं हैं या कहेंगे कि ये जगह विकलांग लोगों के अनुरूप नहीं है."

सुवर्णा कहती हैं कि रैंप न होने के कारण वे किसी एटीएम से पैसे नहीं निकाल सकती, बसों में सफ़र करना मुश्किल है और दिल्ली में रहने के बावजूद वे लाल क़िला नहीं जा सकती क्योंकि वहाँ विकलांग लोगों के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं.

उदासीनता क्यों

अभी कुछ दिन पहले विकलांग खिलाड़ियों ने खेल मंत्री के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया था.

इस बात में कोई शक़ नहीं कि ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों से उलट भारत में विकलांग लोगों के लिए सुविधाओं की कमी है.अपने शहर के किसी भी सार्वजनिक स्थल पर एक नज़र घुमाएँ तो ये बात साफ़ हो जाती है.सामाजिक,राजनीतिक या फिर मीडिया के स्तर पर भी ये वर्ग कभी बड़ा मुद्दा नहीं रहा.

विकलांग एथीलीटों में हताशा किस कदर छाई हुई है इसका अंदाज़ा राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में जुटे तैराक प्रशांत की बातों से साफ़ झलकती है. ये आलम तब है जब प्रशांत अपने वर्ग में विश्व में 18वें नंबर के खिलाड़ी हैं और पिछले साल उन्होंने वर्ल्ड गेम्स में चार स्वर्ण जीते थे.

विकलांग खिलाड़ियों के लिए स्पोर्ट्स कोटा में नौकरी नहीं है. जब रोज़ी-रोटी का ही ठिकानी नहीं है तो हम अपने आप को कितना खींचते रहें. कभी-कभी सोचता हूँ कि प्रशांत तुम क्या कर रहे हो. सोचता हूँ कि अब खेलना छोड़ दूँगा लेकिन मन में एक जुनून है कि कुछ कर गुज़रना है

प्रशांत, तैराक

वे कहते हैं, "विकलांग खिलाड़ियों के लिए स्पोर्ट्स कोटा में नौकरी नहीं है. जब रोज़ी-रोटी का ही ठिकानी नहीं है तो हम अपने आप को कितना खींचते रहें. कभी-कभी सोचता हूँ कि प्रशांत तुम क्या कर रहे हो. सोचता हूँ कि अब खेलना छोड़ दूँगा लेकिन मन में एक जुनून है कि कुछ कर गुज़रना है."

राष्ट्रमंडल की तैयारियों में जुटे ये वो खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपनी विकलांगता के सामने कभी हार नहीं मानी.ऐसे बुलंद हौसले रखने वालों को सबके प्रोत्साहन ज़रूरत है.राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने ही सही विकलांग लोगों के अधिकारों और उनकी ज़रूरतों पर कम से कम बहस तो हो रही है.

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