चाय बागान से जर्मनी के मैदान तक का सफ़र

सिलीगुड़ी के फ़ुटबाल खिलाड़ी
Image caption चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों के बच्चे अपने प्रशिक्षण को लेकर रोमांचित हैं

संजीव केरकट्टा और निशांत टोप्पो ने कभी इसकी उम्मीद नहीं की होगी कि एक विदेशी फ़ुटबॉल टीम के साथ खेले गए महज़ एक प्रदर्शनी मैच से उनकी ज़िंदगी इस तरह बदल जाएगी.

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले में कमलाबाड़ी चाय बागान के मज़दूरों के ये दोनों बेटे इसी सप्ताह फ़ुटबॉल के प्रशिक्षण के लिए जर्मनी के बायर्न म्युनिख क्लब गए हैं.

इन दोनों समेत सिलीगुड़ी फ़ुटबॉल अकादमी के छह जूनियर फ़ुटबॉल खिलाड़ी बायर्न म्युनिख के बुलावे पर दस दिनों के प्रशिक्षण के लिए वहां गए हैं.

दक्षिण अफ्रीक़ा विश्वकप में जर्मनी के स्टार रहे थामस मूलर बीते साल जनवरी में बायर्न म्युनिख की एक टीम के साथ सिलीगुड़ी आए थे. वहां उन्होंने प्रदर्शनी मैच खेला था. तब मूलर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं बनी थी. लेकिन अब इन खिलाड़ियों को मूलर से फ़ुटबॉल की बारीकियां सीखने का मौक़ा मिल सकता है.

उसी समय इन खिलाड़ियों की प्रतिभा को देखते हुए क्लब ने इनको दस दिनों के मुफ़्त प्रशिक्षण का प्रस्ताव दिया था.

उसके बाद राज्य सरकार भी इनकी सहायता के लिए आगे आई. उसने इन लोगों के लिए पासपोर्ट, वीज़ा और किराए की व्यवस्था की.

नए सपने

पूरा देश जब आज़ादी के जश्न में डूबा था तब ये जूनियर फ़ुटबॉलर अपनी आंखों में नए सपने लिए जर्मनी के लिए उड़ान भर रहे थे.

संजीव और निशांत दुनिया के बेहतरीन फ़ुटबॉलरों के नाम का सही तरीक़े से उच्चारण तक नहीं कर पाते. इन दोनों ने कभी किसी क्लब के साथ नहीं खेला है. लेकिन जर्मनी प्रवास के दौरान उनको नामी खिलाड़ियों के साथ फ़ुटबॉल की बारीकियां सीखने का मौक़ा मिलेगा.

संजीव और निशांत के परिवार की कई पीढ़ियां सौ साल से भी पुराने कमलाबाड़ी चाय बागान में चाय की हरी पत्तियां तोड़ते खप गईं. लेकिन इन दोनों ने अपने लिए एक नया रास्ता चुना.

बागान में कोई सुविधा नहीं होने की वजह से दोनों फ़ुटबॉल खेलने के लिए बस से घंटे भर का सफऱ करके सिलीगुड़ी पहुंचते थे.

संजीव का कहना है, "हम इस विश्वकप के दौरान बड़े गर्व से बताते थे कि हमने मूलर के साथ खेला है. अब जर्मनी में भी हमें उनके साथ खेलने का मौक़ा मिल सकता है."

वो कहते हैं कि हम पिछड़े तबक़े के हैं. जर्मनी जाने का यह मौक़ा काफ़ी दुर्लभ है. इसलिए बागान में सब लोग बेहद खुश हैं.

संजीव और निशांत अब अपने पूर्वजों की तरह चाय बागान में मज़दूरी कर ज़िंदगी नहीं गुज़ारना चाहते.

फ़ुटबॉलर बनने की चाह

निशांत का कहना है, "मैं पेशेवर फ़ुटबॉलर बनना चाहता हूं. मैं चाय बागान में नहीं रहना चाहता."

सिलीगुड़ी के विधायक और राज्य के नगर विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य बताते हैं, "इन खिलाड़ियों के जर्मनी में रहने-खाने का ख़र्च बायर्न म्युनिख वहन करेगा. सरकार ने प्रायोजकों के ज़रिए इनके टिकट और दूसरे ख़र्चों की व्यवस्था की है."

राज्य सरकार ने इन युवकों के हाथों थामस मूलर के नाम एक पत्र भेज कर उनको पश्चिम बंगाल आने का न्योता भी दिया है. इन खिलाड़ियों के लौटने पर उनके स्वागत में सरकार ने एक समारोह भी आयोजित करने की व्यवस्था की है.

सिलीगुड़ी फ़ुटबॉल अकादमी के कोच जयब्रत घोष कहते हैं, "यह एक शानदार मौक़ा है. इससे इलाक़े के उभरते हुए खिलाड़ियों में बेहतर प्रदर्शन की भावना पनपेगी. इस दौरे से इन खिलाड़ियों की प्रतिभा और निखरेगी."

निशांत और संजीव के साथ दीपू बर्मन, लिटन सील, अमित छाकुरी और अभिषेक छेत्री भी अपनी आंखों में एक नए सुनहरे भविष्य का सपना लिए जर्मनी गए हैं.

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