क्या होगा राष्ट्रमंडल खेलों के सामान का?

अगर सब कुछ ठीक रहता तो राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ा मर्चेन्डाइज़िंग का सामान अब तक बाज़ार में, दुकानों में, लोगों के घर में होना चाहिए था-चाहे वो स्वागत करता शेरा हो, दिल्ली 2010 वाली टी-शर्ट हो, कॉमनवेल्थ लोगो वाली घड़ियाँ हों, ख़ास भोंपू हो या भारतीय तिरंगा हो.

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पर ये चीज़ें अभी तक इन्हें बनाने वाली कंपनी के ऑफ़िस की शोभा बढ़ा रही हैं.प्रीमियर ब्रांड्स कंपनी ने राष्ट्रमंडल आयोजन समिति के साथ अपना क़रार कुछ दिन पहले ही ख़त्म कर दिया है.

किसी भी बड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता से पहले इस तरह की चीज़ें आम तौर पर लोगों में काफ़ी लोकप्रिय रहती हैं.

इसी सामान का जायज़ा लेने के लिए हम कंपनी के ऑफ़िस गुड़गाँव पहुँचे. सामान बिल्कुल तैयार है लेकिन इसके बावजूद बिक्री शुरु नहीं हुई है.

क्या होगा

ये वो चीज़ें हैं जो प्रतियोगिता से पहले खेलों को लेकर माहौल बनाने में मदद करती हैं, उत्साह पैदा करती हैं और सबसे अहम इनसे अच्छी ख़ासी आमदनी भी होती है.

लेकिन विवादों के बीच प्रीमियर ब्रांड्स ने तो क़रार ही समाप्त कर दिया है. पर अब जब खेल शुरु होने में ज़्यादा समय नहीं बचा है, कंपनी और राष्ट्रमंडल समिति के बीच बातचीत की कोशिश चल रही है कि किसी तरह फिर अनुबंध हो सके.

अगर अब ये सामान बाज़ार में आ भी जाता है तो उसके वितरण का काम उस पैमाने पर तो नहीं हो पाएगा जैसा पहले होता. शायद दूर दराज के राज्यों तक सामान न भेजा जाए.

बाज़ार सामान में आ पाएगा और अगर आएगा तो कितनी बिक्री होगी ये अपने आप में बड़ा सवाल है.

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