काश हमारी भी एक टीम होती..

हॉकी की राजधानी चंडीगढ़ में पिछले दिनों हम भारतीय हॉकी टीम के कप्तान राजपाल सिंह से मिलने पहुँचे.

चंडीगढ़ में सेक्टर 42 के स्टेडियम के बाहर बने टर्फ पर कुछ लड़कियाँ हॉकी लिए एक गेंद के पीछे लगी हुईं थीं. हालांकि इनके खेल में कोई लय नहीं थी पर इनके जोश में कोई कमी नहीं थी.

हमने बच्चों से बाते करनी शुरु की तो दिलचस्प बातें सामने आईं.

इरम ख़ान आठवीं कक्षा में पढ़ती है, हॉकी खेलने के बारे में पूछने पर वो कहती हैं, "हमारी क्लास के लड़के यहाँ की हॉकी अकादमी मे खेलते हैं, जब भी वो क्लास में आते है, एकदम अकड़कर आते है. उनका स्टाइल अलग है, उनकी एक पर्सनेलिटी है, वो हमारे स्कूल के लिए खेलते हैं तो उनकी एक इज़्जत है, मैं भी चाहती हूँ कि मेरी भी एक पर्सनेलिटी हो, हमारी भी एक टीम हो".

यहाँ खेल रही लड़कियाँ इस बात से नाराज़ हैं कि उनके स्कूल में लडकियों की हॉकी टीम नहीं है.

उपनीत कौर कहती हैं, "जहाँ मर्जी चले जाओ, किसी भी राज्य में, किसी भी देश में, मैने देखा है पता नहीं क्यों लड़कियाँ कमज़ोर होती हैं. मैं चाहती हूँ कि लड़कियाँ भी लड़कों जितना अच्छा खेलें, उनमे भी उतनी ही क्षमता हो".

नाराज़गी

अपनी टीम न बन पाने के पीछे का कारण भी इरम ख़ान जानती है.

Image caption इरम ख़ान कहती हैं कि लड़कियाँ हॉकी खेलना चाहती हैं, पर माँ-बाप उनको खेलने नहीं देते.

वो कहती हैं, "हमारी क्लास की ज्यादातर लड़कियाँ हॉकी खेलना चाहती हैं. पर उनके माँ-बाप उनको खेलने नहीं देते, कहते है कि पढ़ाई छूट जाएगी, आठवीं क्लास है, बोर्ड के पेपर हैं."

हमने इरम से पूछा कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुम्हारा स्कूल का काम पूरा न हुआ हो?

इस पर इरम कहती हैं, "मेरा भी स्कूल का काम भी कभी-कभी छूट जाता है, सुबह उठती हूँ, स्कूल जाती हूँ, स्कूल में जाकर ही काम करती हूँ. आधा ध्यान पढ़ाई में लगाते हैं, आधा ध्यान खेल में. दिमाग मे कनफ्यूज़न सा रहता है. जिंदगी में हलचल मची रहती है. स्कूल से आकर जल्दी से हॉकी खेलने भागो. खेलकर फिर हॉकी के लिए बैठो, फिर सो जाओ. सुबह देर से उठते है नींद नहीं खुलती".

वहीं छटी कक्षा में पढ़ने वाली गगन दीप कौर भले ही उम्र में छोटी हों पर आसपास होने वाली घटनाओं को अच्छी तरह समझती हैं और आपको समझा भी सकती हैं.

गगन दीप कौर कहती, "हॉकी वर्ल्ड कप होता है तो कोई ध्यान नहीं देता है, क्रिकेट वर्ल्ड कप होता है तो लोग ऑफिस से छूट्टी ले लेते हैं. मोहाली में कोई क्रिकेट मैच होता है तो लोग छुट्टी लेकर इन्हे देखने जाते हैं. हॉकी पर कोई ध्यान नहीं देता, ये ग़लत है".

लेकिन इस सब बातों को जानने के बावज़ूद ये बच्चे हॉकी खेलना चाहते हैं, पूरे जोश के साथ.

भले ही हॉकी का मौजूदा हाल देखकर इसके भविष्य को लेकर बहस चल रही हो पर इन बच्चों से बात कर मेरे मन में कोई शंका नहीं कि हॉकी का भविष्य पर कोई सवालिया निशान है.

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