गीत कई पर न सुर, न ताल...

  • 11 सितंबर 2010

अगर आप उन लोगों में से हैं जो राष्ट्रमंडल खेलों से पहले बनाए गए दिल्ली थीम गीत से अनजान हैं तो कोई हैरानी की बात नहीं.

पर कम से कम राष्ट्रमंडल खेलों का मुख्य थीम गाना तो आपने सुना ही होगा.

उम्मीद तो यही होती है कि जब देश में राष्ट्रमंडल खेल जैसा बड़ा आयोजन हो रहा हो तो इससे जुड़ा संगीत सबकी ज़ुबां पर होगा.

ऑस्कर विजेता एआर रहमान ने पाँच करोड़ की भारी भरकम फ़ीस लेकर थीम सॉन्ग बनाया है.

उदघाटन समारोह के लिए शास्त्रीय नृत्य में पारंगत कई दिग्गज कलाकार रहमान के ही एक गाने पर प्रस्तुति देने वाले थे. लेकिन अब पंडित बिरजू महाराज ऐसा नहीं करेंगे.

उनका कहना है, “सब गुरुओं ने रहमान के गाने पर प्रस्तुति देने से मना कर दिया है. वो गाना कुछ ऐसे शुरु हो रहा था बालम......जबकि शुरुआत ओम से या ऐसे किसी शब्द से होनी चाहिए. गुरुओं ने अपने-अपने साजिंदों से संगीत तैयार करवा लिया है.”

'ग़लत हिंदी'

वैसे राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में भले ही कमियाँ रही हों पर इन खेलों पर बन रहे गीतों की संख्या में कोई कमी नहीं है. दिल्ली पर बना गाना और राष्ट्रमंडल खेलों के थीम गाने के बारे में तो आपको बताया ही है..अब तो खेलों के शुभंकर शेरा के लिए भी अलग धुन तैयार की गई है. दलेर मेंहदी ने भी गाना तैयार किया है.

यानी आयोजन एक गाने अनेक. रहमान और राष्ट्रमंडल खेलों पर गानों को लेकर दिल्लीवासियों की मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं. विनोद का कहना है कि जैसे जय हो लेकर धूम मची थी वैसा संगीत रहमान नहीं दे पाए हैं. जबकि कुछ लोग हमें ऐसे भी मिले जिन्हें गीतों के बारे में जानकारी ही नहीं थी.

दिल्ली राष्ट्रमंडल थीम सॉन्ग बनाने वाले गायक पलाश सेन रहमान का बचाव भी करते हैं पर साथ ही उन्हें शिकायत भी है.

वे कहते हैं,“रहमान का नाम काफ़ी है और उन्होंने पैसे भी काफ़ी लिए, इसलिए लोगों को उम्मीदें ज़्यादा थीं. मुझे लगता है कि अगर आप देश के लिए कुछ कर रहे हैं तो पैसा मुद्दा नहीं होना चाहिए. गाना अच्छा बना है लेकिन मुझे एतराज़ इस बात का है उसमें ग़लत हिंदी इस्तेमाल की गई है.एक समिति ने उस गाने को मंज़ूरी दी थी, उसे तो देखना चाहिए था”

शेरा के थीम सॉन्ग के लॉन्च पर खेल मंत्री एमएस गिल ख़ुद मौजूद थे. वे रहमान और राष्ट्रमंडल के अन्य गानों की तुलना को बेमानी मानते हैं. वे कहते हैं, “रहमान के गाने से मैं तुलना नहीं करूँगा. हर श्रोता अलग होता है, उसके दिल को जो अच्छा लगता है वही गाना पसंद किया जाएगा.”

रहमान और पलाश सेन को जितना मेहनताना दिया गया है उस हिसाब से इन गानों को प्रोमोट करने की कोशिश नज़र नहीं आ रही, न ये संगीत लोगों में उत्साह पैदा कर पा रहा है जैसा शकीरा के 'वाका-वाका' ने फ़ुटबॉल विश्व कप के दौरान किया था.

रहमान के गाने का वीडियो आना बाक़ी है लेकिन कब आएगा इस बारे में राष्ट्रमंडल आयोजन समिति भी नहीं जानती. टीवी पर भी ये गाने कम ही नज़र आते हैं.

राष्ट्रमंडल खेल शुरु होने में कुछ ही दिन बचे हैं. या खेल मंत्री के शब्दों में कहें तो बारात दरवाज़े पर आने को है पर बारातियों के स्वागत के लिए बज रही शहनाई समाँ नहीं बाँध पा रही है...जैसा 1982 के एशियाई खेलों के लिए बने गाने 'स्वागतम' ने बाँधा था.

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