'खेल की कोई सरहद नहीं'

रोहन बोपन्ना और ऐसामुल हक़ कुरैशी
Image caption इससे पहले कुरैशी लिएंडर पेस के साथ भी खेल चुके हैं.

टेनिस सिर्फ़ एक खेल नहीं बल्कि अपने आप में एक अलग दुनिया है. यहां खिलाड़ी पूरी शिद्दत से खेलते हैं और खेल में हारने के बजाय टेनिस कोर्ट में दम तोड़ना पसंद करते हैं.

इस जुनून के बावजूद खिलाड़ियों में खेल का ये जज़्बा भी बरक़रार रहता है कि ये सिर्फ़ खेल है, सामने वाले के साथ हो रही कोई जंग नहीं.

खिलाड़ी अलग-अलग देश-परिवेश से आते हैं और एक दूसरे के ख़िलाफ़ दम भर खेलते हैं. लेकिन टेनिस कोर्ट में हार-जीत के फ़ैसले के बाद सबकुछ भूलकर वो दुख-दर्द बांटते हैं.

खिलाड़ियों के बीच अकसर ऐसे भावनात्मक रिश्ते बन जाते हैं जो टेनिस कोर्ट की प्रतिस्पर्धा को पीछे छोड़ कहीं आगे निकल जाते हैं.

टेनिस की दुनिया में खिलाड़ियों के देश से ज़्यादा उनकी अपनी पहचान मायने रखती है.

यही वजह है कि ज़रूरत पड़ने पर देश और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर खिलाड़ी एक दूसरे की मदद करते हैं.

एक मिसाल

भारत-पाक जोड़ी रोहन बोपन्ना और ऐसामुल हक़ कुरैशी की खेल जुगलबंदी इस बात की मिसाल है कि खेल की दुनिया किस तरह राजनीति, सरकारी दाँव-पेंच और खेल-महासंघों की औपचारिकताओं से परे है.

दोनों खिलाड़ियों ने मिलकर यू एस ओपन में जो बेहतरीन प्रदर्शन किया है उसके लिए उन्हें भारत-पाक रिश्तों का ‘शांति दूत’ कहा जाने लगा है.

लाहौर के रहने वाले कुरैशी और बंगलौर के रहने वाले रोहन बोपन्ना पिछले कुछ सालों से डबल्स मुक़ाबले में एक साथ खेल रहे हैं.

यू एस ओपन से पहले यह जोड़ी कभी उस तरह चर्चा में नहीं रही जिस तरह अब है.

कम उम्र से ही टेनिस खेल रहे कुरैशी दूसरे कई पाकिस्तानी खिलाड़ियों की तरह भारत के साथ अक़्सर खेलते रहे हैं.

एक समय वो एशिया के सर्वश्रेष्ठ टेनिस खिलाड़ियों में से एक थे.

बोपन्ना की तरह कुरैशी भी एक संपन्न परिवार से हैं. एक इसराइली खिलाड़ी के साथ अपनी भागीदारी को लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वो चर्चा में रहे.

उनकी ये भागीदारी खेल को लेकर उनकी साफ़गोई का सबूत थी. उन्होंने साबित कर दिया कि मुसलमान हो कर एक यहूदी के साथ खेलना उनके लिए कोई बुरी बात नहीं.

पाकिस्तान में कुछ एक कट्टरपंथियों की टिप्पणियों के अलावा इस पर कोई बवाल भी नहीं हुआ और कुरैशी ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन जारी रखा.

बोपन्ना और कुरैशी जब अपने लिए एक सहभागी की तलाश कर रहे थे तो किस्मत ने उन्हें मिला दिया.

भारत-पाक जुगलबंदी

Image caption बोपन्ना और कुरैशी ने मिलकर यू एस ओपन जीतने का सपना देखा.

खेल की ज़रूरतों के अलावा उन्हें साथ लाने में कई चीज़ों की अहम भूमिका थी. एक ही परिवेश से होने की वजह से यूरोपीय खिलाड़ियों की बजाय वो एक दूसरे के साथ ज़्यादा सहज थे.

ये पहली बार नहीं था कि कुरैशी ने एक भारतीय के साथ अपनी टीम बनाई हो. इससे पहले वो लिएंडर पेस के साथ खेल चुके थे. उनकी जुगलबंदी ऐसी रही कि लिएंडर ये कहने पर मजबूर हो गए कि कुरैशी जब भी चाहें वो डबल्स खेलने के लिए उन्हें एक फ़ोन घुमा कर बुला सकते हैं.

जब बोपन्ना और कुरैशी की टीम ने यूएस ओपन में अपने सपनों को साकार करने की बाज़ी खेली तो सारी दुनिया ने उनसे ये जानना चाहा कि एक भारतीय और एक पाकिस्तानी के लिए मिल कर इस सपने को जीना कैसा अनुभव था. ख़ासतौर पर सपने को हक़ीकत में बदलने के लिए एक दूसरे का साथ देना.

बोपन्ना और कुरैशी पूरी ईमानदारी से दुनिया के इन सवालों का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं.

दोनों देशों के इतिहास में ये पहला मौका होगा जब भारत में किसी ने ये नहीं चाहा कि एक पाकिस्तानी हार जाए और इसी तरह पाकिस्तान में हर किसी ने ये चाहा कि ये भारतीय इस बार जीत जाए.

बोपन्ना और कुरैशी के बहाने दोनों देशों की दोस्ती की ये दास्तान इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसके पीछे कोई कूटनीतिक कोशिश नहीं. इसके पीछे है तो सिर्फ खेल का जज़्बा, ताकि खिलाड़ी बिना किसी राजनीतिक दबाव के खेल सकें.

इन खिलाड़ियों ने जो रास्ता चुना वो एक बार फिर इस बात की गवाही देता है कि खेल की कोई सीमा, कोई सरहद नहीं. वो हर क़ीमत पर लोगों को जोड़ना जानता है, तोड़ना नहीं.

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