हवा में तैरती उम्मीदें...

कहते हैं कि अगर किसी काम की शुरुआत अच्छी हो जाए तो आगे का रास्ता आसान हो जाता है. राष्ट्रमंडल खेलों को बेहतरीन शुरुआत दिलाने का दारोमदार दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम और इससे जुड़े लोगों पर है. इसी का जायज़ा लेने बीबीसी की टीम स्टेडियम पहुँची.

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राष्ट्रमंडल खेलों का उदघाटन और समापन समारोह इसी स्टेडियम में होने वाला है और इसके लिए जहाँ ज़ोर शोर से काम चल रहा है. स्टेडियम का बुनियादी ढाँचा तैयार है क्योंकि ये काफ़ी पुराना स्टेडियम है लेकिन इसमें सुधार का काम चल रहा था और कई नए पहलू जोड़े गए हैं.

यहाँ का मुख्य आकर्षण है एरोस्टेट....हवा में तैरता बड़ा सा हिलियम का गुब्बारा जिसे उदघाटन समारोह के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. ये गुब्बारा ज़मीन से 30 मीटर ऊपर तैरगा यानी स्टेडियम की छत तक पहुँच जाएगा. इसे ख़ास तौर पर विदेश से मँगवाया गया है और लागत है 40 करोड़ से भी ज़्यादा. अधिकारियों का दावा है कि ये कोई आम गुब्बारा नहीं है बल्कि तकनीक और कला का अदभुत नमूना है.

गुब्बारे पर कैमरे, शीशे और प्रोजेक्टर लगे रहेंगे जिससे 360 डिग्री के दायेर में प्रोजेक्शन हो पाएगा. यानी दर्शक दीर्घा में आप कहीं भी बैठे हों लेकिन एरोस्टेट के सारे तामझाम को आप हर कोने हर पहलू से देख पाएँगे.

स्टेडियम के अंदर लोग मुस्तैदी से काम को अंतिम रूप देने में लगे हैं, हर तरफ़ दौड़ते भागते लोग देखे जा सकते हैं.गुब्बारे के तकनीकी काम को अंजाम देने के लिए विदेशी तकनीशियन मौजूद हैं.लेकिन कुछ काम अब भी बाकी हैं. ख़ासकर स्टेडियम के बाहर सौंदर्यीकरण का कुछ काम बचा है.

दिल्ली में लगातार हो रही बारिश के कारण भी दिक्कत आ रही है. अंदर दर्शक दीर्घा में भी बारिश के कारण पानी भर रहा है जिसे सुखाने की कोशिश की जा रही है.

स्टेडियम का असली नज़ारा लेना हो तो शाम ढलने का इंतज़ार कीजिए. रंगबिरंग रोशनी की किरणें शाम होते ही पूरे स्टेडियम को सराबोर कर देती हैं.

अधिकारियों का तो दावा है कि स्टेडियम उदघाटन समारोह के लिए तैयार है. हालांकि दौरे के बाद अभी ये नहीं कहा जा सकता है कि सारा का सारा काम पूरा हो चुका है....तैयारियों को अंतिम रूप देना अभी बाक़ी है. बाक़ी मौसम की मेहरबानी भी ज़रूरी है क्योंकि ख़राब मौसम का असर एरोस्टेट पर भी पड़ेगा.

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