मिलिए असली शेरा से ..

राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम हो, जनाब शेरा को तो आपने वहाँ देखा ही होगा. शेरा यानी राष्ट्रमंडल खेलों का शुभंकर. हँसते- मुस्कुराते, हाथ मिलाते ये आपको इन दिनों कहीं न कहीं दिख ही जाएगा.

कभी सोचा है कि सर्वव्यापी हो चुके शेरा की असली पहचान क्या है? असली शेरा से मिलने के लिए हम पहुँचे दिल्ली में राष्ट्रमंडल आयोजन समिति के दफ़्तर. शेरा के पीछे का असली चेहरा हैं 23 बरस के युवक सतीश.

राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर चाहे जितना भी विवाद हो लेकिन शेरा का भेस धारण कर सतीश हर जगह लोगों के दिलों को जीत रहे हैं.

मैं राष्ट्रमंडल कार्यालय में पिछले डेढ़ साल से बतौर ऑफ़िस ब्वॉय काम कर रहा हूँ. मेरे बॉस ने मुझे कई बार देखा और उन्हें लगा मैं बहुत दोस्ताना तरीके से पेश आता हूँ, बहुत मज़ाकिया हूँ. बस उन्होने तय कर लिया कि मैं ही शेरा बनूँगा. मुझे ये काम बहुत भा रहा है. जहाँ भी मैं जाता हूँ लोग मेरे पीछे-पीछे आते हैं. बच्चे शेरा शेरा करके चिल्लाते हैं. बढ़े बूढ़े सब प्यार करते हैं. फ़ोटोग्राफ़, ऑटोग्राफ़ लेते हैं.

सतीश, शेरा का रोल निभा रहे युवक

जब हम उनसे मिलने पहुंचे तो सतीश शेरा बनने की तैयारी में थे. रोज़ वे कम से कम तीन-चार आयोजनों में शेरा बनकर जाते हैं. शुरु में तो उन्हें पूरी ड्रेस पहनकर तैयार होने में वक़्त लगता था. लेकिन अब वे इस काम में माहिर हो चुके हैं. हमारे देखते-देखते सतीश बड़ी मुस्तैदी से केवल पाँच मिनट में भेस बदल.. शेरा बनकर तैयार हो गए.

सतीश आख़िर कैसे बने शेरा और कैसा रहा उनका अनुभव ? सतीश बताते हैं, "मैं राष्ट्रमंडल कार्यालय में पिछले डेढ़ साल से बतौर ऑफ़िस ब्वॉय काम कर रहा हूँ. मेरे बॉस ने मुझे कई बार देखा और उन्हें लगा मैं बहुत दोस्ताना तरीके से पेश आता हूँ, बहुत मज़ाकिया हूँ. बस उन्होने तय कर लिया कि मैं ही शेरा बनूँगा. मुझे ये काम बहुत भा रहा है. जहाँ भी मैं जाता हूँ लोग मेरे पीछे-पीछे आते हैं. बच्चे शेरा शेरा करके चिल्लाते हैं. बढ़े बूढ़े सब प्यार करते हैं. फ़ोटोग्राफ़, ऑटोग्राफ़ लेते हैं."

विजेंदर के फ़ैन

असल ज़िंदगी में सतीश को बॉक्सिंग काफ़ी पसंद है और दोस्तों के साथ उन्हें बॉक्सिंग करते हुए देखा जा सकता है. राष्ट्रमंडल खेलों की पहचान बन चुके सतीश क्या सोचते हैं खेलों के बारे में और शेरा बमकर कितनी बदली है उनकी ज़िंदगी?

सतीश कहते हैं, "शेरा बनने के बाद मेरी ज़िंदगी और दिलचस्प हो गई है. मुझे राष्ट्रपति से लेकर बड़े-बड़े खिलाड़ियों- पीटी ऊषा, अभिनव बिंद्रा, विजेंदर, मेरी कॉम सबसे मिलने का मौका मिलता है. विजेंदर और सुशील मेरे पसंदीदा खिलाड़ी हैं. मैं चाहता हूँ कि वे जीतें और हम 100 से भी ज़्यादा मेडल जीत कर आएँ."

हम शेरा के साथ हाल ही में एक स्कूल भी गए थे. जैसा कि सतीश ने पहले कहा था शेरा बच्चों के बीच वाकई काफ़ी हिट हैं. स्कूलों में शेरा को बच्चे हाथों-हाथ लेते हैं. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी वे काफ़ी लोकप्रिय हो चुके हैं.

बच्चों के बीच शेरा ख़ूब मस्ती करते हैं हालांकि मीडिया से बात करने में वो थोड़े सकुचाते हैं.

सतीशा को देखकर ये जिज्ञासा ज़रूर हुई कि क्या दिन भर शेरा की आठ किलो की पोशाक पहने-पहने उन्हें दिक्कत नहीं होती. सतीश कहते हैं कि ये विशेष ड्रेस है जिसमें हेड फ़ैन लगे हुए हैं और इसे पहनकर आम कपड़ों सा का एहसास होता है और गर्मी नहीं लगती.

चंडीगढ़ के रहने वाले साधारण परिवार के सतीश अपने माता-पिता के साथ अब दिल्ली में रहते हैं.

राष्ट्रमंडल खेलों का मेला कुछ ही दिनों का है, चंद दिनों में ख़त्म हो जाएगा. खेलों के बाद सतीश का नाम कई और नामों की फ़ेहरिस्त में ग़ुम हो जाएगा. चेहरा भी लोग शायद ही पहचानें लेकिन शेरा के तौर पर पर उनकी पहचान हमेशा रहेगी.

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