मेलबर्न खेलों में सैफ़ पर टिकट

राष्ट्रमंडल खेलों में कई भारतीय खिलाड़ियों ने नाम कमाया है. मेलबर्न खेलों में तो सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भारतीय ही था. पर लगता है कि 2006 में हुए मेलबर्न खेलों में भारतीय फ़िल्मी सितारों से भी आयोजक काफ़ी 'प्रसन्न' थे.

समापन समारोह में भारत की ओर से कई बड़े सितारों ने रंगारंग प्रस्तुति पेश की थी. समापन समारोह के बाद ऑस्ट्रेलिया में एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया था जिसमें सैफ़ अली खान हरा कुर्ता पहने भंगडा की धूम मचा रहे हैं.

कहने को तो रानी मुखर्जी, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता और एश्वर्या राय जैसे सितारों ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया था लेकिन डाक टिकट पर चमकने का मौका केवल सैफ़ को मिला.

मार्च 2006 में हुए इसी समारोह में ही भारत को राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी सौंपी गई थी.

समर्थन के सुर

राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर अब तक मीडिया की ओर से काफ़ी नकारात्मक प्रतिक्रिया रही है. अब तो बाकी देशों के प्रतिनिधि भी कड़े बयान दे रहे हैं. कुछ खिलाड़ी नाम वापस ले चुके हैं और कुछ वापस लेने की धमकी दे रहे हैं. लेकिन इस बीच कीनिया की ओर से समर्थन के स्वर सुनाई दे रहे हैं.

एक भारतीय अख़बार में छपी ख़बर के मुताबिक कीनिया ने कहा है कि दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर अमीर देशों ने कुछ भी कहा है वो इन अमीर देशों का ऐटिट्यूड प्रॉब्लम है यानी उनके रवैये में ही दिक्कत है. साथ ही कहा गया है कि सिडनी से लेकर बीजिंग खेलों में भी दिक्कतें रही हैं. कहीं से तो समर्थन का स्वर सुनाई दे रहा है...

तहज़ीब पर किताब

खेल गाँव में गंदगी को लेकर काफ़ी बवाल हुआ है. ललित भनोट ने तो यहाँ तक कह दिया था कि ये ज़रूरी नहीं कि सफ़ाई को लेकर उनका मापदंड बाहर से आए खिलाड़ियों-अधिकारियों के मापदंड से मिलता हो.

अभी कुछ दिन पहले ही पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने भी अपनी किताब लॉन्च की है- ब्रूम एंड ग्रूम जो इन्हीं पहलूओं को छूती है. किरण बेदी ने भारत में शिष्टाचार और साफ़-सफ़ाई जैसे मु्द्दों को उठाया है.

किरण बेदी का कहना है कि उनकी नज़र में विदेशियों में भारतीयों को लेकर मोटे तौर पर छवि है कि भारत के लोगों में सिविक सेंस या तहज़ीब की कमी है जो अपने आप में बहस का विषय है. राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए उन्होंने इस किताब को लिखने में तेज़ी बरती.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “हम अपने चारों ओर अशिष्टता देखते हैं, विदेशियों को लगता है कि हम ऊँचा बोलते हैं, बाहर से आए लोगों को घूरते हैं, कतार में नहीं खड़ा होना चाहते, कूड़ेदान में नहीं बाहर चीज़ें फ़ेंकते हैं. होटल में जाकर बहुत से लोग वहाँ बिछी चादर से जूते तक पोंछते हैं.”

वैसे अभी तक राष्ट्रमंडल आयोजन समिति की ओर से इस बारे में दिशा निर्देश जारी नहीं किए गए हैं कि विदेशों से आए मेहमानों के साथ कैसे पेश आया जाए. जबकि लंदन ओलंपिक की मार्गदर्शिका अभी से जारी हो चुकी है.

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