खेलों से जुड़े कुछ रोचक बयान

सुरेश कलमाड़ी- अध्यक्ष, आयोजन समिति

सुरेश कलमाड़ी

जनवरी 2010, बीबीसी से बात करते हुए

आयोजन समिति का अध्यक्ष होना बहुत ज़िम्मेदारी का पद है. अँगरेज़ी में कहावत है कि 'बक स्टॉप्स हियर' (सभी चीज़ों की अंतिम ज़िम्मेदारी मेरी है). काफ़ी ज़िम्मेदारी भी है और चुनौती भी है क्योंकि एशियाई खेलों के बाद से हमने कोई खेल आयोजित नहीं किए. अच्छी बात है कि दिल्ली के बुनियादी ढाँचे में बढ़ोत्तरी हो रही है. खेल के तो 15 दिन हैं मगर दिल्ली वालों के लिए तो ये क़ायम रहेंगे. 'कॉमनवेल्थ फ़ॉर कॉमन मैन' (राष्ट्रमंडल खेल आम लोगों के लिए).

23 सितंबर 2010- स्टेडियम बनने में हो रही देरी के बारे में पूछे जाने पर

इन सबसे मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ है और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि खेल बेहद अच्छे तरीक़े से आयोजित किए जाएँगे. हमने पिछले कई सालों में काफ़ी संसाधन लगाए हैं और एथलीट्स को यहाँ आकर काफ़ी अच्छा लगेगा.

मणिशंकर अय्यर- पूर्व खेल मंत्री

27 जुलाई 2010- मीडिया से बात करते हुए

राष्ट्रमंडल खेलों का बेड़ा गर्क होगा क्योंकि मैं समझता हूँ कि अगर ये खेल सफल हो गए तो कल कहेंगे कि एशियाई खेल आयोजित करेंगे, ओलंपिक आयोजित करेंगे. खेलों के आयोजन के लिए हमने हर राष्ट्रमंडल देश की ओलंपिक समिति को एक लाख डॉलर दिए, इसको मैं रिश्वत कहता हूँ, पता नहीं क़ानून के नज़रिए में ये रिश्वत है कि नहीं. इस तरह से जो खेल लिए गए हैं तो इसकी रहनुमाई शैतान ही करेगा कहाँ ख़ुदा करेगा.

डॉक्टर मनमोहन सिंह- प्रधानमंत्री, भारत

15 अगस्त 2010, लाल किले की प्राचीर से

लगभग डेढ़ महीने बाद दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजित होंगे. ये पूरे देश और ख़ास तौर से दिल्ली के लिए एक गौरव का क्षण होगा. मुझे पूरा विश्वास है कि हमारे देशवासी इन खेलों को एक राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाएँगे और इसे सफल बनाने में कोई क़सर नहीं छोड़ेंगे. इन खेलों का सफल आयोजन एक और संकेत होगा कि किस तरह भारत विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है.

माइकल फ़ेनेल- अध्यक्ष, राष्ट्रमंडल खेल महासंघ

19 अगस्त 2010, मीडिया को संबोधित करते हुए

खेल गाँव में भी काफ़ी काम होना है और उपकरण सही जगह लगाने और पानी और साफ़ सफ़ाई का काम देखने के बाद ये भी देखना होगा कि खाने-पीने की सेवाएँ और साफ़ सफ़ाई उच्च स्तरीय हों. हमें देखना होगा कि एथलीट्स के लिए खाना पीना काफ़ी साफ़ सुथरे ढंग से तैयार हो और इसीलिए निगरानी की व्यवस्था की गई है. खेल गाँव की सफ़ाई पर अभी और ध्यान दिया जाना है. हमारे पास अब समय नहीं बचा है. इतना सब होने के बाद खेल गाँव किसी भी अन्य खेल गाँव से कहीं बेहतर होगा.

एम एस गिल- खेल मंत्री

15 सितंबर 2010, बीबीसी से बात करते हुए

ये ठीक बात है कि कुछ काम कच्चा रह गया और देर से हुआ. मगर अब रात दिन लगे हैं और उसे पूरा कर लेंगे. आप विश्वास रखना कि एक हफ़्ते में सब ठीक हो जाएगा. ये हिंदुस्तान की शादी जैसा ही मामला है और क्या कहूँ ये कहना पड़ता है. पहले कर लेते तो अच्छा था मगर ये मत समझिए कि तैयार नहीं होंगे.

माइक हूपर- मुख्य कार्यकारी, राष्ट्रमंडल खेल महासंघ

21 सितंबर 2010, खेल गाँव में साफ़ सफ़ाई के मसले पर

हमने खेल गाँव की साफ़-सफ़ाई के मुद्दे पर ज़ोर दिया है. मुझे कहना होगा कि खेल गाँव की कई इमारतों में बेहद गंदगी है और वो जगह रहने लायक़ भी नहीं है. आप वहाँ नहीं रह सकते. वहाँ कमरों और रास्तों में कचरा और मलबा फैला हुआ है. बाथरूम में दरवाज़े उल्टे लगे हैं. टॉयलेट काम नहीं कर रहे. ये सब बेहद गंदा है और अस्वीकार्य है.

ललित भनोट- महासचिव, आयोजन समिति

21 सितंबर 2010, साफ़ सफ़ाई की शिकायतों पर प्रतिक्रिया देते हुए

वे साफ़ सफ़ाई का एक स्तर चाहते हैं जो मेरे या उनके या किसी और के स्तर से अलग हो सकता है. अगर आप इस कमरे के बारे में बात करें कि ये साफ़ है या नहीं तो मेरे और आपके हिसाब से कमरा साफ़ है मगर उनका साफ़ सफ़ाई का एक स्तर है. इस अंतर को दूर करने के लिए हमने अपने लोगों से कहा है कि उसी तरह की साफ़ सफ़ाई कराई जाए.

क्रेग हंटर- इंग्लैंड के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख

21 सितंबर 2010

ये बात तो समझ में आती है कि अलग-अलग देशों में सफ़ाई के मानदंड अलग हैं मगर किसी भी खेल गाँव में सफ़ाई का एक न्यूनतम स्तर होता है और यहाँ का खेल गाँव उस न्यूनतम स्तर पर खरा नहीं उतरता. वेल्स के हमारे सहयोगियों ने बताया कि उन्होंने दो कुत्तों को खिलाड़ियों के लिए ख़ास तौर पर बनाई गई रज़ाई पर सोते हुए देखा.

जयपाल रेड्डी- खेलों की निगरानी कर रहे मंत्रियों के समूह के प्रमुख

21 सितंबर 2010, एक ओवरब्रिज गिरने के बाद

खेलों के समाप्त होने के बाद ही आपको अपनी राय बनानी चाहिए. अगर खेलों के आयोजन में परेशानी होती है तो आपको सवाल उठाने चाहिए. अभी तो हम तैयारी ही कर रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि इस मसले से भारत की या सरकार की छवि पर कोई असर होगा.

शीला दीक्षित- मुख्यमंत्री, दिल्ली

22 सितंबर 2010, मीडिया से नाराज़गी जताते हुए

हमने एक हज़ार का बस स्टैंड बना जो दुनिया में कहीं नहीं है. आपने एक दिन उसकी फ़ोटो दे दी फिर कभी दी ही नहीं. इतना सुंदर जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम बना है वो कभी दिखाते नहीं. आपको हरियाली दिख रही है, सफ़ाई दिखाई दे रही है और लोग उसे क्यों नहीं देखते हैं.

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