सच में तब्दील होता दुस्वप्न

खेल गांव
Image caption कॉमनवेल्थ खेलों के लिए तैयार गांव की दयनीय स्थिति काफ़ी निराश कर रही है.

यह बड़ा ही भयावह अनुभव है किसी दु:स्वप्न का अनुमान लगाना और फिर इसे वास्तविकता में देखना. पिछले कुछ दिनों ने उन सबको सही साबित कर दिया है जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों के लिए तबाही वाले परिदृश्य का अनुमान किया था.

बड़ी संख्या में लोगों ने इन खेलों के आयोजन से जुड़े लोगों पर अकुशलता, असंवेदनशीलता और भ्रष्ट तौर-तरीक़ों के आधार पर गंभीर सवाल उठाए थे, लेकिन इन सबके बावजूद ऐसा लगता था कि भारत इन सबसे बाहर निकल जाएगा.

वर्ष 1982 में हुए एशियाई खेल आयोजन और महत्वाकांक्षा दोनों के स्तर कहीं अधिक छोटे थे, हमारे लिए ये एक ख़ास मिसाल हैं कि जब हमने आश्चर्यजनक तरीक़े से समय और गुणवत्ता के साथ इन खेलों का आयोजन संपन्न किया.

मानसून वेडिंग की तरह उस समय हमने इनका सफल आयोजन किया और गर्व की अनुभूति की.

साबित करने का मौका

क़रीब तीन दशकों के बाद भारत अब कोई तीसरी दुनिया का देश नहीं रह गया है, कम-से-कम धनवान ऊपरी मध्य वर्ग की नज़रों में और सुपरपॉवर कहे जाने के विशेषाधिकार के साथ-यह हमारे लिए यह साबित करने का एक बड़ा मौक़ा था कि शीर्ष पर हमारी जगह बिल्कुल सही है.

बुनियादी ढांचे के निर्माण में हो रही निराशाजनक देरी, भ्रष्टाचार के बड़े आरोप और सड़कों पर अफरा-तफरी की वजह से हमारे भीतर उतावलापन पैदा हो रहा था और मन ही मन एक ग़ुस्सा भी लेकिन देश की अस्मिता के नाम पर उन सबको ढक कर रख दिया गया.

हमारे समाज में मौजूद कहीं अधिक भद्र लोग हमें ढाँढस के साथ इस बात का अहसास दिला रहे थे कि एक बार ये खेल हो जाने दें और उसके बाद दोषियों को दंडित किया जाएगा.

एक फुटब्रिज के भर-भराकर गिरने में मिनट भर लगे और निर्माणकार्य की गुणवत्ता पर हमारी आशंका सही साबित हुई. पुल के गिरने पर जहाँ एक तरफ हमारे भ्रष्ट पहलू के दर्शन हुए तो वहीं गांवों में नहीं रहने लायक और गंदी स्थिति ने हमारे अकुशल संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन किया.

महज एक दिन के भीतर ही हमारे सपने ढहते नजर आए.

इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि अब तक हमने इसके लिए कितना काम किया और खेलों की शुरुआत के बाद इसे कितनी सफलता मिलेगी, लेकिन हम उन लोगों की ओर से भारत को मिले उस शर्म और परेशानी से नहीं उबर सकेंगे जिन्होंने भारत की अस्मिता का सौदा ब्लैक में बेचे गए किसी सिनेमा के टिकट की तरह कर दिया.

उम्मीद

अब जबकि कई हज़ार करोड़ रूपए दुनिया को दिखाने के नाम पर ख़र्च कर दिए गए हैं, तो बस यह उम्मीद करें कि इसके बाद भारत को और बदनामी नहीं झेलनी पड़ेगी.

उम्मीद करें कि हम उन खिलाड़ियों को निराश नहीं करेंगे जिन्होंने दुष्प्रचार को नज़रअंदाज़ करते हुए इन खेलों में भाग लेने का फ़ैसला किया.

और अपने एथलीटों के लिए उम्मीद करें कि वे अपने ही लोगों के सामने बड़ी संख्या में पदक जीतने के अपने सपने को पूरा करेंगे. ये एथलीट इन विपरीत स्थितियों का सामना हमेशा ही बहादुरी से करते हैं.

इस समय उन्हें बीच मंच पर आने दें. साथ ही, यह भी उम्मीद करें कि जिन लोगों के उपेक्षात्मक रवैए और लालच की वजह से हमे शर्मसार होना पड़ा, खेलों की समाप्ति के बाद उन्हें उचित दंड दिया जाएगा.

(लेखक हिंदुस्तान टाईम्स के खेल सलाहकार हैं.)

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