अभिनव की आत्मकथा

  • 5 नवंबर 2010
अभिनव बिंद्रा
Image caption निशानेबाज़ अभिनव बिद्रा आत्मकथा लिख रहे हैं

ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा की गिनती आज चोटी के खिलाड़ियों में होती है. अब जल्द ही उनके बारे में अनछुए पहलू लोगों के सामने आएंगे.

अभिनव के पिता एएस बिंद्रा ने बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में बताया कि अभिनव इन दिनों अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं.

उन्होंने कहा, "अभिनव बचपन में खिलौना बंदूकों से खेलता था. उसका शुरुआत से ही इस ओर रुझान था. हमने इसके इस टैलेंट को पहचान लिया, और 11 साल की उम्र में उसे कोचिंग दिलानी शुरू कर दी."

जब अभिनव ने ज़िला स्तर पर एक प्रतियोगिता जीती, तब उनके कोच ने उनके पिता को बताया कि अभिनव को प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग दिलानी चाहिए. उसके बाद उन्हें जर्मनी के मशहूर जर्मन स्कूल ऑफ़ राइफ़ल शूटिंग में कोचिंग के लिए भेजा गया.

अभिनव साल में दो महीने कोचिंग के लिए जर्मनी जाते रहे. ये सिलसिला 15 साल तक चलता रहा. एएस बिंद्रा कहते हैं, "उन दिनों भारत में अच्छे शूटिंग रेंज ही उपलब्ध नहीं थे. तब मैंने अभिनव के लिए चंडीगढ़ के अपने घर में ही आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित शूटिंग रेंज बनवाई."

अभिनव वर्ष 2000 के सिडनी ओलंपिक्स में हिस्सा लेने वाले सबसे कम उम्र के एथलीट थे. 2008 बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर वो भारत के खेलप्रेमियों के चहेते बन गए.

उन्होंने दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में निशानेबाज़ी की टीम जोड़ी स्पर्द्धा में स्वर्ण और व्यक्तिगत स्पर्द्धा में रजत पदक जीता था. अभिनव अगले हफ़्ते ग्वांगजो एशियाई खेलों में हिस्सा लेंगे.

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