भारत भूलना चाहेगा दोहा का प्रदर्शन

शांति सुंदरराजन
Image caption शांति सुंदरराजन लिंग परीक्षण में विफल हो गईं थीं

दोहा में साल 2006 में आयोजित हुए 15वें एशियाई खेलों को ऐतिहासिक ही कहा जाना चाहिए. खाड़ी देश में हुए इस सफल आयोजन से क़तर ने सिद्ध कर दिया कि किसी भी खेल मेले की सफलता के लिए सिर्फ़ पैसे ही नहीं बल्कि दृढ़ संकल्प की भी ज़रूरत होती है.

वैसे क़तर में अगर दोहा शहर की पूरी जनसंख्या भी खेलों के काम में लगा दी जाती तो शायद काम अधूरे ही रह जाते इसीलिए क़तर की सरकार ने 100 देशों से 10 हज़ार से भी ज़्यादा वॉल्यंटियर्स बुलाकर दो हफ़्ते में क़रीब 10 लाख दर्शकों का खेलों से भरपूर मनोरंजन किया.

दोहा एशियाई खेलों ने सही मायनों में दुनिया के सिमटने का एहसास कराया. अलग-अलग देशों के बेहतरीन चुनिंदा तकनीकी विशेषज्ञों ने खेलों का काम सँभाला.

अगर स्टेडियम के निर्माण में चीन के इंजीनियरों ने काम किया तो टीवी प्रसारण में जर्मनी के विशेषज्ञों ने कमान सँभाली.

किसी हद तक खेलों के सफल आयोजन में सबसे बड़ा हाथ था नेटवर्किंग का जिस पर टेलीकास्ट और खेलों के नतीजों का मामला निर्भर था. मज़े की बात ये कि सारी नेटवर्किंग का ज़िम्मा भारत संचार निगम लिमिटेड यानी बीएसएनएल के हाथ में था और उसने ये काम बख़ूबी किया भी.

एथलीट्स और मीडियाकर्मियों को एक स्टेडियम से दूसरी जगह ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट का काम ऑस्ट्रेलियाई युवा लड़के, लड़कियों के हाथ में था और एक भी दिन कोई भी बस लेट नहीं हुई.

सफल आयोजन

Image caption जसपाल राणा ने भारत को शूटिंग में स्वर्ण पदक दिलाया था

आयोजकों के सफल प्रयास में खिलाड़ियों ने भी अहम भूमिका निभाई. कुल मिलाकर 33 विश्व और एशियाई रिकॉर्ड बने और चीन की 13 वर्षीया बालिका तैराक चेन सुओलिन को सबसे कम उम्र के गोल्ड विजेता बनने का गौरव प्राप्त हुआ.

पहली बार क़तर की किसी महिला ने भी एशियाई खेलों में हिस्सा लिया जब शोरोग अल सोवादी ने गोल्फ़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया.

चीन ने 165 स्वर्ण पदक जीतकर पदक तालिका में पहला स्थान लिया जबकि 58 स्वर्ण के साथ कोरिया जापान को पछाड़कर दूसरे स्थान पर रहा.

अगर भारत की दृष्टि से देखा जाए तो दोहा एशियाई खेलों में उसके प्रदर्शन को फ़्लॉप शो ही कहना होगा. भारत कुल 10 स्वर्ण के साथ आठवाँ स्थान ही ले सका.

भारत का प्रदर्शन

सबसे बड़ा धक्का भारत को तब लगा जब 55 साल के एशियाई खेलों के इतिहास में भारत पहली बार हॉकी में मेडल की स्पर्द्धा से बाहर ही रहा. लीग मैचों में पहले भारत चीन से 2-3 से हारा और उसके बाद कोरिया से 1-1 से बराबर रहकर सेमीफ़ाइनल तक भी नहीं पहुँच सका.

इसी ख़राब प्रदर्शन की वजह से बीजिंग ओलंपिक खेलों की हॉकी प्रतियोगिता से भी भारत बाहर ही रहा.

वैसे तो 1980 के ओलंपिक खेलों के बाद भारत की हॉकी का स्तर गिरता ही गया है लेकिन दोहा के बाद तो उसकी जैसे आख़िरी साँसें भी रुक गईं थी.

एथलेटिक्स में भी भारत का हाल ख़स्ता ही रहा था. सती गीता, पिंकी परमानिक, चित्रा कुलातुम्मुरियिल और मंजीत कौर ने चार गुणा चार सौ मीटर रीले दौड़ में एकमात्र स्वर्ण पदक जीता.

भारत की ओर से गोल्ड जीतने वालों में प्रमुख नाम थे शतरंज खिलाड़ी कोनेरू हंपी और टेनिस स्टार लिएंडर पेस. हंपी ने टीम और एकल के दो स्वर्ण जीते तो लिएंडर ने पुरुष युगल में महेश भूपति के साथ और मिश्रित युगल में सानिया मिर्ज़ा के साथ स्वर्ण पदक जीता.

कुल मिलाकर भारत के लिए दोहा एशियाई खेल स्मरणीय नहीं रहे और धक्का तब तो और भी लगा जबकि खेलों के आख़िरी दिन ये ख़बर आई कि 800 मीटर की धाविका शांति सुंदरराजन लिंग परीक्षण में विफल रहीं.

अब जबकि चीन के गुआंगजो में 16वें एशियाई खेल 12 नवंबर से शुरू होने वाले हैं तो भारत के ऊपर दोहरा दबाव होगा.

एक तो दोहा के गुनाहों को धोना और साथ ही दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के प्रदर्शन को दोहराना.

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