एशियाड में कड़े मुक़ाबले की संभावना

मिल्खा सिंह
Image caption पूर्व धावक मिल्खा सिंह मानते हैं कि इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत से सब संभव है.

‘फ़्लाइंग सिख’ के नाम से मशहूर धावक मिल्खा सिंह मानते हैं कि इच्छाशक्ति और मेहनत से सब कुछ संभव है.

बीबीसी से बात करते हुए मिल्खा सिंह ने कहा, "आज के खिलाड़ियों को मेरी सलाह ये है कि इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत से आप ज़रुर आसमान छू सकते हैं और अपने देश के लिए स्वर्ण पदक जीत सकते हैं".

चीन के गुआंझू में सोलहवें एशियाई खेल जारी हैं.

वर्ष 1958 और 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले मिल्खा सिंह कहते हैं, "1951 में जब मैंने दौड़ना शुरु किया था तब हिन्दुस्तान में न तो दौड़ने के लिेए जूते बनते थे और न ही कोच थे. मैं नंगे पैर ही दौड़ता था. लेकिन आज हिन्दुस्तान में बहुत पैसा है और नए-नए उपकरण हैं. इसके बावजूद जितना सुधार होना चाहिए था उतना नहीं हुआ है".

पिछले महीने नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा बेहतरीन प्रदर्शन के बाद उनसे उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई हैं.

लेकिन पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी और अब कोच पुलेला गोपीचंद को लगता है कि राष्ट्रमंडल खेलों का प्रदर्शन दोहराना भारत के लिए आसान नहीं होगा.

गोपीचंद कहते हैं, "एशियाई खेलों में बैडमिंटन में बहुत कड़ा मुक़ाबला होता है. विश्व रैंकिंग के शीर्ष देश ज़्यादातर एशिया में ही हैं. इसलिए वहां प्रतियोगिता के स्तर को देखते हुए भारत के लिए नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों जैसा प्रर्दशन दोहराने में कठिनाई हो सकती है. लेकिन फिर भी सायना नेहवाल, अश्विनी पोन्नपा, ज्वाला गुट्टा और वी दीजू से पदक की उम्मीद कर सकते हैं".

Image caption पूर्व राइफ़ल शूटर अंजलि भागवत मानती हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को एशियाई खेलों में कड़ी टक्कर मिलेगी.

ऐसी ही सोच पूर्व राइफ़ल शूटर अंजलि भागवत की भी है.

अंजलि कहती हैं, "मुझे लगता है कि निशानेबाज़ी के लिए एशियाई खेल ओलंपिक्स से भी बड़े हैं. ओलंपिक्स और राष्ट्रमंडल खेलों में हर इवेंट के लिए हर देश से दो निशानेबाज़ों की टीम होती है जबकि एशियाई खेलों में तीन निशानेबाज़ों की टीम होती है. मुक़ाबला बहुत कड़ा है क्योंकि एशिया में चीन, कोरिया और जापान जैसे दिग्गज देश है. इसलिए एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतना बहुत बड़ी है".

लेकिन अंजलि ये भी कहती हैं, "फ़िलहाल भारतीय टीम के हौसले बहुत बुलंद हैं. इस साल उन्होंने विभिन्न विश्व कप, विश्व चैंपियनशिप इत्यादि में भाग भी लिया है. और उन्होंने जीतना भी सीख लिया है".

2006 में दोहा एशियाई खेलों में भारत का प्रर्दशन कुछ ख़ास नहीं रहा था. उन खेलों में भारत दस स्वर्ण पदकों के साथ महज़ आठवें स्थान पर ही रहा.

बात अगर हॉकी की करें तो एशियाड में भारत अब तक केवल दो बार—1966 और 1998—में ही स्वर्ण जीत पाया है.

पूर्व ओलंपियन और भारतीय हॉकी टीम के कप्तान ज़फ़र इक़बाल मानते हैं कि मौजूदा टीम स्वर्ण पदक जीत सकती है.

वो कहते हैं, "इन खेलों के लिए भारतीय टीम में जीतने की क़ाबलियत है और उन्हें उसी सोच के साथ खेलना चाहिए. नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में लीग मैचों और ख़ासकर सेमीफ़ाइनल में जिस तरह का प्रर्दशन टीम ने दिखाया है, अगर वो बरक़रार रखते हैं तो यक़ीनन एशियाड में जीत कर आएंगे".

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