एशियाड, आँकड़े और भारत

अश्विनी अकुंजी
Image caption 400 मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीतनेवाली भारतीय एथलीट अश्विनी अकुंजी

आँकड़े बताने से अधिक छिपाते हैं – ये पंक्ति क्रिकेट में अक्सर दोहराई जाती है, जब कोई किसी खिलाड़ी की योग्यता को उसके खेल के कौशल से मापना चाहता है ना कि उसके करियर के औसत से.

ऐसे समय जबकि भारत 2010 एशियाड में रिकॉर्ड संख्या में मेडल बटोरकर और तालिका में छठे नंबर पर आकर झूम रहा है, मैंने तय किया कि ज़रा इस क्रिकेट वाले तर्क को उलटकर एशियाड में भारत की पिछली उपलब्धियों पर एक नज़र डाली जाए.

मुझे पता है कि आँकड़ों से सिर टकराना एक कठिन काम है, ख़ासकर तब जबकि इससे कहीं अधिक आसान है 400 मीटर बाधा दौड़ में अश्विनी अकुंजी की यादगार जीत के बारे में लिखना जिससे विश्वपटल पर उनके लिए एक गौरवमय भविष्य तय लगता है.

या फिर आप लिन डान के बारे में भी ज़रूरत से ज़्यादा प्रशस्ति कर सकते हैं, जो कि बिल्ली की भांति चपल हैं, लोमड़ी की तरह चतुर हैं और शटल पर जिनकी पकड़ उन्हें हमारे इस दौर के महानतम और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की श्रेणी में ला खड़ा करती है.

मगर, इस सबकी जगह, एक बदलाव के लिए, मैं यहाँ आँकड़ों की बात करूँगा, कि पदक तालिका में कितने पदक जीते गए और तालिका में स्थान कौन सा रहा.

उतार-चढ़ाव

भारत 1951 में खेलों की दुनिया की एक बड़ी शक्ति था, ये दिल्ली में हुए पहले एशियाड खेलों की पदक तालिका से प्रकट हो जाता है.

भारत दूसरे नंबर पर आया था, जापान के बाद, 15 स्वर्ण पदक जीतकर.

भारत ये दोनों उपलब्धियाँ कभी नहीं दोहरा सका.

कहने के लिए कोई कह सकता है कि पहले एशियाड में केवल 11 देश थे और छह प्रतियोगिताएँ, लेकिन इसके बावजूद आप इस तथ्य को दरकिनार नहीं कर सकते कि भारत उस वर्ष में एशिया में खेलों के मामले में दूसरे नंबर का देश था.

बाद के वर्षों में जब खेल फैलता गया, जब 1974 में चीन मैदान में आया और नए-नए खेलों को शामिल किया जाने लगा, तब भारत की स्थिति साँप-सीढ़ी के खेल की तरह होती गई, 1982 में दिल्ली में 13 स्वर्ण पदक मिले तो 1990 में हिरोशिमा में मात्र एक.

1990 के एशियाड में भारत ने अभी तक का सबसे कमज़ोर प्रदर्शन किया जहाँ वह तालिका में 12वें नंबर पर रहा, ये एकमात्र खेल था जहाँ वो पहले 10 देशों में शामिल नहीं हो पाया.

घरेलू आयोजन

हो सकता है यहाँ ऐसे लोगों को सोचने के लिए एक खुराक मिले कि अपने देश में आयोजन से खेलों को बढ़ावा मिलता है क्योंकि अबूझ कारणों से 1982 में दिल्ली एशियाड में 57 पदक जीतने के बाद अगले तीन एशियाडों में लगातार हमें निराशा हाथ लगी.

1986 में 37 पदक मिले, 1990 में 23 और 1994 में 22.

ऐसा ही कुछ 1951 के दिल्ली खेलों के बाद हुआ था जब अगले ही एशियाड में पदकों की संख्या 51 से घटकर 13 पर आ गई.

मैंने ये कुछ उदाहरण अभी तक के खेलों की पदक तालिका से लिए हैं, हालाँकि ये दिलचस्प है कि अभी तक हुए 16 खेलों में एक बार को छोड़कर हर बार भारत टॉप टेन देशों मे रहा है और सात बार टॉप फ़ाइव में.

भारत जापान और कोरिया को टक्कर दे सकेगा, ये सोचना छोड़ दिया गया है, और रही चीन की बात, तो वो तो किसी की भी पहुँच से बाहर है.

भारत को चिंता जिस बात से होनी चाहिए वो ये है कि अब ईरान भी तालिका में हमसे दूर भागता जा रहा है और कज़ाख़स्तान को छूने के लिए भी हमें गति बढ़ानी होगी.

हो सकता है कि भारत ने अपने खेल का दायरा और गहराई बढ़ा ली हो और तालिका में पदकों की संख्या को बढ़ा लिया हो, लेकिन संख्या से मापे जानेवाले इस खेल में भारत की गति मंथर पड़ती जा रही है.

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