दस बातें एशियाड के बहाने

एशियाड
Image caption ओलंपिक खेलों के बाद चीन ने एशियाड का सफल आयोजन किया

किसी भी शहर के लिए कई खेलों वाला कोई आयोजन करना आसान नहीं होता. हर खेल की समझ, उसके लिए स्टेडियम और बाक़ी सारी सुविधाएँ समय से तैयार करना एक चुनौती होती है.

भारत और ख़ासकर दिल्ली के लोग ये समझ चुके हैं राष्ट्रमंडल खेलों के ज़रिए और अब 2019 के एशियाई खेलों का आयोजन करना चाहते हैं.

इस बीच यहाँ ग्वांगजो में अब जबकि एक सफल एशियाई खेल आयोजित हो चुके हैं मैं इन खेलों की दस प्रमुख बातों का यहाँ ज़िक्र करना चाहता हूँ.

1- परंपरा से हटकर हुआ उदघाटन और समापन समारोह

आम तौर पर इस तरह के खेलों का आयोजन किसी बड़े स्टेडियम में होता है जहाँ हज़ारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं बीच मैदान में रंगारंग कार्यक्रम होता है और फिर मशाल जलाई जाती है.

मगर जू जियाँग या पर्ल नदी के बीच में बने एक छोटे से टापू हाइशिनसा पर खुले से स्टेडियम में उदघाटन और समापन समारोह का आयोजन बेहद रोमाँचक था.

उदघाटन ने ख़ास तौर पर लोगों का मन मोहा और बीजिंग ओलंपिक के उदघाटन को भी कहीं पीछे छोड़ दिया.

2- हँसते वॉलंटियर्स ने छोड़ी छाप

शहर में घुसने के साथ ही हरे सफ़ेद से कपड़ों में नौजवान लड़के-लड़कियाँ जगह-जगह खड़े दिखने लगे थे.

जब भी कुछ पूछने पहुँचिए एक से ज़्यादा आपकी मदद को तत्पर, मगर परेशानी ये कि अँगरेज़ी उनको ठीक से नहीं आती और चीनी बाहर वालों को नहीं आती.

बहुत से लोग खीझे, परेशान हुए उन वॉलंटियर्स पर समय-समय पर ग़ुस्सा भी उतारा मगर क्या मजाल की उनके चेहरे से विनम्र मुस्कान ग़ायब हो जाए.

धीरे-धीरे इस मसले का भी हल हुआ क्योंकि बात करने के लिए भाषा की ज़रूरत हमेशा नहीं होती. इशारों से, संकेतों से बात होती गई और परेशानियाँ सुलझती गईं.

इन युवाओं को इतने विदेशियों के साथ घुलने-मिलने का मौक़ा फिर कब मिलता. ये उनके लिए भी एक आजीवन याद रखने वाला अनुभव बना है.

3- दर्शक लापता रहे तो हुई तुरंत कार्रवाई

याद होगा कि राष्ट्रमंडल खेलों के शुरू में जब दर्शक स्टेडियम से नदारद थे तो कितना हल्ला मचा था. कहा गया कि निशानेबाज़ी में मुश्किल से 25-30 लोग थे.

यहाँ तो उतने भी नहीं थे. सिर्फ़ मीडिया भरा था और जनता बाद तक भी ग़ायब ही रही.

मगर आयोजकों ने मसले को हाथ से निकलने से पहले ही चार लाख अतिरिक्त टिकट बेचने की घोषणा कर दी.

नतीजा ये हुआ कि जब एथलेटिक्स के मुक़ाबले शुरू हुए तो यहाँ का आओती मेन स्टेडियम लोगों से खचाखच भरा हुआ था. लोग पूरे परिवार के साथ पिकनिक जैसे माहौल में खेल देखने पहुँचे.

4- स्टेडियम भव्य मगर दूरी दुखदाई

स्टेडियम सभी बेहद भव्य और सुविधाओं से युक्त बने थे.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष ज़्याक़ रॉग ने तो यहाँ तक कहा कि ग्वांगजो ओलंपिक का आयोजन करने के लिए तैयार है.

मगर समस्या ये थी कि एथलीट्स के रहने के लिए खेल गाँव और पत्रकारों का मीडिया सेंटर शहर से काफ़ी दूर बना था.

ख़ाली सड़क पर बस तेज़ गति से चले तब भी लगभग एक घंटे का समय लगता था शहर के बीच में बने स्टेडियम तक पहुँचने के लिए.

मुक्केबाज़ी, शॉटगन और रोइंग के स्टेडियम तो काफ़ी दूर थे और एथलीट्स का आने-जाने में ही थक जाना स्वाभाविक था.

एथलीट्स और पत्रकार ये दूरियाँ तय करते हुए ही नींद पूरी किया करते थे.

5- उम्मीदों पर खरे उतरे स्थानीय हीरो लिन और लिउ

यहाँ पर लोग बैडमिंटन स्टार लिन डान और 110 मीटर बाधा दौड़ के एथलीट लिउ शियांग के लिए बेहद पागल हैं.

मगर ये एथलीट सिर्फ़ जनता के बीच लोकप्रिय ही नहीं हैं बल्कि मैदान में भी सफलता के झंडे गाड़ते हैं.

लिन डान बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक में स्वर्ण जीत चुके थे सिर्फ़ एशियाड का स्वर्ण उनसे छूटा हुआ था. इस बार फ़ाइनल में मलेशिया के ली चोंग वेई को हराकर उन्होंने वो कमी भी पूरी कर ली.

इसी तरह लिउ शियांग के नाम 110 मीटर बाधा दौड़ का विश्व रिकॉर्ड तक रहा है. बीजिंग ओलंपिक में वो चोट के चलते हिस्सा नहीं ले सके थे और स्थानीय लोग बहुत निराश हुए थे.

जब एथलेटिक्स स्टेडियम में वो 110 मीटर बाधा दौड़ में उतरे तो पूरा स्टेडियम जैसे खड़े होकर उनके नारे लगा रहा था, ज़बरदस्त शोर था. लिउ उम्मीदों पर खरे उतरे और उन्होंने स्वर्ण जीता.

इन एथलीट्स ने स्थानीय लोगों में इन खेलों को लेकर काफ़ी रुचि जगाई.

6- क्रिकेट का पदार्पण मगर शो फीका

क्रिकेट का एशियाई खेलों में पदार्पण हुआ मगर इस क्षेत्र में क्रिकेट की महाशक्ति भारत ने टीम ही भेजने से इनकार कर दिया.

पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका ने भी जूनियर टीम ही भेजी. ऐसे में क्रिकेट जितनी लोकप्रियता हासिल कर सकता था वो हुआ नहीं.

ज़्यादातर लोग इसके लिए भारत को दोषी ठहराते मिल रहे हैं. इसका नुक़सान ये हुआ कि 2014 में दक्षिण कोरियाई शहर इंचियॉन क्रिकेट आयोजित करने के लिए उत्साहित नहीं है.

वैसे इस खेल के लॉबी करने वाले इतने लोग हैं कि इसे आसानी से निकाला भी नहीं जा पा रहा है और कोशिश हो रही है कि भारत अगली बार किसी भी तरह इन खेलों में शामिल हो जाए.

7- उत्तर और दक्षिण कोरियाई एथलीट्स का नज़रिया

इन खेलों के दौरान ही कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव हो गया.

उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच गोलीबारी हुई और उसकी गूँज यहाँ ग्वांगजो तक सुनाई दी.

अधिकारी चिंतित हो गए कि खेलों पर इसका क्या असर होगा.

मगर घटना के अगले ही दिन तीरंदाज़ी के महिला एकल मुक़ाबले में दक्षिण कोरियाई तीरंदाज़ में स्वर्ण और उत्तर कोरियाई ने काँस्य जीता.

दोनों पदक स्टैंड पर एक दूसरे के बगल में खड़े हुए और दोनों देशों के एथलीट्स में पूरा सदभाव भी दिखा.

बाक़ी जगहों पर भी दोनों देशों के एथलीट्स का यही अंदाज़ रहा जिसकी वजह से ये खेल उस राजनीतिक तनाव से अछूते रह पाए.

8- पाकिस्तान की हॉकी में 20 साल बाद जीत

पाकिस्तान और भारत की हॉकी टीमों की हालत यूरोपीय टीमों के मुक़ाबले ख़स्ता ही है. कभी हॉकी पर राज करने वाली ये दोनों ही टीमें बुरे दौर से गुज़री हैं.

पाकिस्तानी टीम तो अगर आपको याद हो तो दिल्ली में हुए विश्व कप में सबसे अंतिम स्थान पर थी.

उसके बाद से टीम में बदलाव किए गए मगर सुल्तान अजलान शाह कप हो या राष्ट्रमंडल खेल पाकिस्तानी टीम को लय नहीं मिल पा रही थी.

यहाँ भी उसे भारत से तो हार मिली मगर आख़िरकार उसने फ़ाइनल जीत लिया. पाकिस्तान को 20 साल बाद एशियाड में हॉकी का स्वर्ण मिला और उसे सीधे ओलंपिक में प्रवेश भी मिल गया.

उम्मीद है कि देश में इससे हॉकी को और बढ़ावा मिलेगा.

9- काँस्य का आख़िर विजेंदर से मोह छूटा

मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह के पीछे काँस्य पदक जैसे हाथ धोकर पड़ गया था.

दोहा एशियाई खेल, बीजिंग ओलंपिक, पिछले साल मिलान में हुई विश्व चैंपियनशिप और इस साल दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेल- हर जगह सेमीफ़ाइनल में हार और काँस्य पदक.

यहाँ विजेंदर ने वो दुष्चक्र तोड़ दिया और न सिर्फ़ फ़ाइनल में पहुँचे बल्कि फ़ाइनल में विश्व चैंपियन अब्बोस अतोएव को हराकर स्वर्ण भी लिया.

विजेंदर ने अब ध्यान योग का सहारा लिया है जिससे मुक़ाबले के दौरान अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रख सकें.

समापन समारोह में हाथ में भारतीय झंडा लिए विजेंदर काफ़ी ख़ुश दिख रहे थे.

10- सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन

इन खेलों में भारत ने एशियाड का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया और 14 स्वर्ण सहित कुल 64 पदक जीते.

एथलेटिक्स, मुक्केबाज़ी और टेनिस ने इस पदक तालिका में अच्छी भूमिका निभाई.

ये प्रगति उत्साहवर्द्धक है, मगर जैसे ही पदक तालिका में ऊपर चढ़िए और चीन की ओर नज़र डालिए तो उत्साह कुछ ठंडा भी पड़ जाता है.

चीन के 199 स्वर्ण पदकों का कोई जवाब नहीं है. एक और स्वर्ण आ जाता तो स्वर्ण का दोहरा शतक मारने का रिकॉर्ड भी बन जाता.

चीन ने ख़ुद को न सिर्फ़ आर्थिक महाशक्ति के रूप में पेश किया है बल्कि खेलों की महाशक्ति के रूप में भी वो स्थापित हो रहा है.

बीजिंग के बाद लंदन में भी पदक तालिका में चीन ही अगर सबसे ऊपर दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

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