विश्व घटनाचक्र 2010

अमरीका- विकीलीक्स

अमरीका और विकीलीक्स

बनते-बिगड़ते सामरिक समीकरण, यूरोप में मची आर्थिक उथल पुथल, भारत- चीन जैसी नई उभरती महाशक्तियाँ, कोरिया में युद्ध के मंडारते बादल,अमरीकी दामन से निकलकर नई दिशा में बढ़ते इराक़ के हिचकिचाते क़दम, दुनिया को आँख दिखाता ईरान, चरमपंथ से जूझता अफ़ग़ानिस्तान...कुछ ऐसा रहा 2010 में विश्व का घटनाचक्र. एक बात जो पूरे घटनाचक्र में समान रही वो है विश्व में उलट पुलट होता सत्ता सुंतलन.

(विश्व परिक्रमा का वार्षिक अंक सुनने के लिए नीचे ऑडियो लिंक पर क्लिक करें - प्रस्तुति महबूब ख़ान)

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

विकीलीक्स के घटनाचक्र ने साल का अंत-अंत होते पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया...ये वार न किसी हथियार का था, न परमाणु बम का न किसी मिसाइल का. ये घात लगाया इंटरनेट और तकनीक ने और इसका सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा उठाना पड़ा अमरीका जैसे उस देश को जहाँ इंटरनेट को उसकी ताक़त समझा जाता है.

विकीलीक्स ने लाखों संवेदनशील कूटनयिक संदेश दस्तावेज़ों के रूप में प्रकाशित किए जिसमें अमरीका से लेकर पाकिस्तान और सऊदी अरब समेत कई देशों को लपेटे में लिया है....विभिन्न देशों की कूटनीतिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

मिसाल के तौर पर पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देशों के लिए अमरीका की सार्वजनिक वाहवाही को लीजिए,तो दूसरी ओर विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में इन देशों को लेकर अमरीका की गंभीर चिंताएँ और आशंकाएँ सामने आती हैं... विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में ये विरोधाभास झलकता है.

जैसे यूँ तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमरीका पाकिस्तान का साथ देता रहा है पर ये दस्तावेज़ दोनों के तनावपूर्ण रिश्तों को दर्शाते हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक अमरीका बेहद चिंतित है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार चरमपंथियों के हाथ न लग जाएँ, ये भी कहा गया है कि पाक अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान चरमपंथियों को सहयोग देता रहा है. विभिन्न देशों से जुड़े ऐसे ही कई दस्तावेज़ अब तक सामने आ चुके हैं.

कहाँ ले जाएगा विकीलीक्स

चरमपंथ पर भारत का समर्थन करने के अमरीकी दावों पर भी विकीलीक्स ने सवाल उठाए हैं. दस्तावेज़ों के मुताबिक 26/11 के बाद अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने ख़ुद को भारत से अलग रखने का फ़ैसला किया था. इतना ही नहीं सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी की अमरीका ने खिल्ली उड़ाई है जबकि अमरीका ख़ुद को भारत का सहयोगी करार देता है और नवंबर में ही ओबामा भारत के हाईप्रोफ़ाइल दौरे पर आए थे.

पाकिस्तान और अमरीका ने विकीलीक्स के क़दम की कड़ी निंदा की है.इन दस्तावेज़ों को लेकर कई देशों की झुंझलाहट कनाडा के प्रधानमंत्री के सलाहकार के बयान से साफ़ झलकती है. उन्होंने टीवी पर ये तक कह डाला कि विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की हत्या कर देनी चाहिए.

दस्तावेज़ लीक करने का विकीलीक्स का क़दम कितना सही और कितना ग़लत है इस पर बहस जारी है. लेकिन एक बात तो तय है कि इस पूरे किस्से से अमरीका काफ़ी विचलित हुआ है और इसने कूटनीति और पत्रकारिता के मायने बदल दिए हैं.

विकीलीक्स पर ऑस्ट्रेलिया के बयान के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है. ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि दस्तावेज़ लीक होने के लिए ऑस्ट्रेलियाई संस्थापक जूलियन असांज नहीं बल्कि अमरीका ज़िम्मेदार है और ये अमरीकी सुरक्षा प्रबंधों पर सवाल खड़े करता है.

बलात्कार के आरोप में जूलियन असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार भी किया गया जिसे कुछ लोग बदले की कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं.

(अमरीका में अंदरूनी तौर पर भी हलचल रही. मध्यावधि चुनाव में सत्ताधारी डेमोक्रेटिक पार्टी को करारी हार मिली तो रिपब्लिकन पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया. ओबामा ने माना कि अर्थव्यवस्था पर लोग नाराज़ हैं. ऐसे में अब ओबामा प्रशासन को कई विधेयकों पर रिपब्लिकन पार्टी के साथ मिलकर चलना होगा.)

इराक़-अफ़ग़ानिस्तान

इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान

अमरीका के लिए सिरदर्द बने विकीलीक्स में इराक़ से जुड़े दस्तावेज़ों का भी ज़िक्र है. इराक़ के संदर्भ में 2010 को बयां करना हो तो नूरी अल मलिकी का बयान याद आता है जहाँ उन्होंने कहा है कि 2010 में इराक़ ‘आज़ाद’ हो गया. वो इसलिए क्योंकि अगस्त 2010 में अमरीका ने इराक़ में अपना सैन्य मिशन अंतत ख़त्म कर दिया.

इराक़ी सुरक्षाबलों को सलाह और प्रशिक्षण देने, विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने और अमरीकी हितों की रक्षा के लिए लगभग 50 हज़ार अमरीकी सैनिक इराक़ में बने रहेंगे. लेकिन विशेष हालातों को छोड़कर अमरीकी सैनिक सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लेंगे.

बहुत से लोग आज भी इराक़ में अमरीकी अभियान को भयानक भूल मानते हैं जिस वजह से दुनिया भर में अमरीका की साख तार-तार हुई.

बड़ा सवाल ये है कि मार्च 2003 को शुरु हुए अमरीकी अभियान के बाद अब अमरीका कैसा इराक़ छोड़ कर जा रहा है? अंदरूनी हिंसा और राजनीतिक अस्थितरता से पार पा पाएगा इराक़?

विभिन्न संस्थाएँ दावा करती हैं कि साढ़े सात सालों में एक लाख से ज़्यादा लोगों की जान गई. कई बार इराक़ी क़ैदियों के साथ प्रताड़ना तो कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं.

राजनीतिक तौर पर भी इराक़ को लोग किसी परिपक्व देश के तौर पर नहीं देख रहे. इराक़ में राजनीतिक गतिरोध का आलम ये रहा कि मार्च में हुए संसदीय चुनाव के बाद दिसंबर अंत में जाकर नई सरकार का गठन हो पाया और शिया नेता नूरी अल मलिकी दोबारा प्रधानमंत्री नियुक्त हुए. जिसके बाद उम्मीद की एक छोटी सी किरण जगी है.

नौ अप्रैल 2003 को बग़दाद में सद्दाम हुसैन की मूर्ति तोड़ते अमरीकी सैनिकों की तस्वीर आज भी लोगों के ज़हन में ताज़ा है लेकिन यही तस्वीर ये सवाल भी पूछती है कि अमरीकी अभियान ने आख़िर क्या हासिल किया...क्या इराक़ में अमन शांति है, बेहतर सुविधाएँ हैं, राजनीतिक स्थिरता है?

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अफ़ग़ानिस्तान

इराक़ के बाद अगर अमरीका ने किसी देश में अपना काफ़ी कुछ दाँव पर लगाया है तो वे है अफ़ग़ानिस्तान. 2001 में ब्रिटेन और अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हवाईहमले किए थे. तब से लेकर अब तक वहाँ उठापटक रही है.

2010 अफ़ग़ानिस्तान के लिए काफ़ी अहम साल रहा. पेंटागन ने साफ़ तौर पर माना है कि अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथियों की ताकत बढ़ रही है और हिंसा नए स्तर पर पहुँच गई है.

वहीं बराक ओबामा ने कहा दिया है कि अमरीका जुलाई 2011 में सैनिक हटाना शुरु कर देगा. जबकि नैटो ने वर्ष 2014 के अंत तक सुरक्षा की कमान अफ़ग़ान सैनिकों के हाथों में सौंपे जाने की योजना को स्वीकृति दे दी है.

पर क्या अफ़ग़ान सुरक्षाबल अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा का ज़िम्मा लेने के लिए सक्षम हैं? वहाँ तालिबान,शासन,तस्करी और भ्रष्टाचार को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जा चुकी है. विकीलीक्स में भी अमरीकी राजनयिकों के संदेश राष्ट्रपति करज़ई समेत वहाँ के नेताओं को लेकर यही शंका जताते हैं.

विकीलीक्स के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान युद्ध पर अमरीका अपनी करीबी सहयोगी ब्रिटेन से भी बेहद नाख़ुश है.

इस सबको देखते हुए अमरीका और नैटो के सामने चुनौती ये है कि 2014 में उनके जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के कुछ हिस्सों में कमान लड़ाकों और मादक पदार्थों की तस्करी करने वालों के हाथों में न चली जाए. कैसा होगा 2015 का अफ़ग़ानिस्तान?..इंतज़ार सबको है.

कोरिया,ईरान

बर्मा, कोरिया और ईरान का हाल

दुनिया का एक छोटा सा देश बर्मा जहाँ की एक बड़ी राजनीतिक नेता आंग सान सू ची बरसों बाद अपने ही घर में नज़रबंद रहने के बाद नवंबर में रिहा हुईं. वे पिछले 21 सालों में से 15 साल नज़रबंद रही हैं.

बर्मा में 20 साल बाद पहली बार चुनाव हुए जिसमें सेना समर्थित पार्टी ने जीत का दावा किया है. सू ची की पार्टी ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था क्योंकि ऐसा करने के लिए पार्टी को सू ची को निकालना पड़ता.

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ईरान

पिछले कई सालों की तरह 2010 में भी ईरान अमरीका और पूरी दुनिया को आँख दिखाता रहा और अपने परमाणु कार्यक्रम पर डटा हुआ है.

अमरीका ने एक अप्रत्याशित बयान में इस साल यहाँ तक कह दिया कि ईरान भविष्य में असैन्य ज़रूरतों के लिए यूरेनियम संवर्धन कर सकता है बशर्ते ईरान ये दर्शाए कि ये काम ज़िम्मेदारी से कर सकता है.

अब तक अमरीका ने साफ़-साफ़ शब्दों में ऐसा कभी नहीं कहा था कि ईरान संवर्धन कर सकता है. परमाणु मसले पर ईरान ने एक साल बाद जाकर दिसंबर में अंततराष्ट्रीय जगत से बात की है पर कोई नतीजा नहीं निकला.

इस बीच ईरान दावा कर रहा है कि वो देश में ही उत्पादित कच्चे यूरेनियम का अपने परमाणु संयंत्र में प्रयोग करेगा यानी कहीं न कहीं ये संदेश देनी की कोशिश कि वो कच्चे माल को लेकर किसी का मोहताज नहीं रहेगा.

ईरान ने दो टूक शब्दों ने कहा दिया है कि अगर ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो बातचीत का कुछ फ़ायदा हो सकता है. हर बार की तरह ईरान और अंतरराष्ट्रीय जगत में परमाणु मसले पर शह और मात का खेल जारी है. अगली बातचीत जनवरी में होगी.

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कोरिया

ईरान की तरह उत्तर कोरिया ने भी दुनिया को असमंजस में डाले रखा. दूसरा विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने कोरिया को दो खेमों में बाँट दिया था. 1953 में कोरियाई युद्ध में बीस लाख जानों की क़ीमत पर बने दो राष्ट्र उत्तर और दक्षिण कोरिया.

कोरिया युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 2010 में सबसे ज़्यादा तनाव देखा गया जब नवंबर में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर तोपों से गोले दाग दिए जिसमें कुछ सैनिक भी मारे गए. इसके बाद कोरियाई प्रायद्वीप में माहौल तनावपूर्ण हो गया. इसी तनाव के बीच जापान और अमरीका के सबसे बड़े संयुक्त सैन्य अभ्यास ने स्थिति को और नाज़ुक बना दिया.

उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमरीका समेत अन्य देशों में चिंता है जबकि ईरान के मसले की ही तरह चीन अब भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उ.कोरिया के साथ खड़ा हुआ नज़र आता है.नवंबर में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में संदेह भी जताया गया है कि उत्तर कोरिया परमाणु प्रसार में लगा हुआ है.

चीन-बढ़ता असर

चीन का प्रभुत्व

बात चाहे ईरान मसले की हो, उत्तर कोरिया की या वैश्विक अर्थव्यवस्था की.. 2010 का पूरा घटनाक्रम कहीं न कहीं विश्व में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को दर्शाता है.

कोरियाई प्रायद्वीप में संकट के बादल छाए तो सबकी नज़रें चीन पर थीं. अमरीकी सेना प्रमुख माइक मलेन ने भी माना है कि उत्तर कोरिया पर चीन का ‘अलग’ प्रभाव है जिसका इस्तेमाल चीन को उ. कोरिया पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए.

चीन के बढ़ते असर का एक नमूना विकीलीक्स के दस्तावेज़ों में भी नज़र आता है. जिनमें कहा गया है कि मुंबई में 26/11 हमलों से पहले पाकिस्तान के कहने पर चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध को रोक लिया था. ये तब जब अमरीका प्रतिबंध के पक्ष में था.

विकीलीक्स से निकले दस्तावेज़ों में चीन को अमरीका की आशंका साफ़ झलकती है जहाँ राजनयिकों ने साफ़ तौर पर कहा है कि 'चीन बहुत ही आक्रमक और ख़तरनाक आर्थिक प्रतियोगी' है.

विकीलीक्स की मानें तो गूगल पर जनवरी में हुए साइबर हमले चीन ने ही करवाए थे क्योंकि गूगल पर चीनी अधिकारियों की आलोचना वाले लेख थे.

चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने 2010 में भारत का हाई प्रोफ़ाइल दौरा भी किया.

कूटनीतिक और सामरिक मामलों में ही नहीं, आर्थिक मामलों में भी दुनिया में चीन का दबदबा है. एक ओर जहाँ विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रही हैं, वहीं आर्थिक मंदी का बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है.

2010 में तो चीन जर्मनी को पछाड़ विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया. चीनी मुद्रा की कम विनिमय दर की अमरीका कड़ी आलोचना कर चुका है. आईएमएफ़ ने तो युआन को लेकर मुद्रा युद्ध तक की बात कह डाली है.

चीनी कार्यकर्ता लू श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार दिए जाने को लेकर भी चीन दवाब बनाता रहा कि कई देश इस कार्यक्रम का बहिष्कार करें और कई देशों ने ऐसा किया भी.

टीकाकारों की राय में तमाम मुद्दों पर चीन से मतभेदों के बावजूद अमरीका समेत किसी भी देश के लिए चीन से सीधे टकराव लेना अब उतना आसान नहीं रहा.

यूरोपीय संकट

यूरोज़ोन संकट में

Image caption आयरलैंड की आर्थिक स्थिति डांवाडोल

चीन जहाँ आर्थिक प्रगति की राह पर अग्रसर है वहीं आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश में लगे विश्व को 2010 में यूरोप ने झटका दिया. मज़बूत माने जाने वाले कई यूरोपीय देश धराशायी हो गए जिसका राजनीतिक असर भी देखने को मिला.

ग्रीस में मई 2010 की एक घटना यूरोप के आर्थिक संकट की गंभीरता को दर्शाता है. ग्रीस में आर्थिक कटौतियों के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में नाराज़ नागरिकों ने एक बैंक की इमारत को आग लगा थी और अंदर तीन कर्मचारियों की मौत हो गई जिसमें एक गर्भवती महिला भी थीं.

संकट से घिरे सब देशों की स्क्रिप्ट एक जैसी ही थी- देशों पर कर्ज़ का बोझ, आर्थिक कटौतियाँ, विरोध प्रदर्शन और फिर संकट से जूझने के लिए बाहरी मदद का सहारा.

Image caption ब्रिटेन में शुल्क में बढ़ोत्तरी का विरोध करते छात्र

शुरु करते हैं ब्रिटेन से जहाँ 2010 में चुनाव हुआ और 70 सालों की पहली बार मिली-जुली सरकार बनी. नई सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की राह में बड़े पैमाने पर कटौतियाँ घोषित की.

लंदन की सड़कों पर दशकों बाद विरोध के दृश्य देखने को मिले जब हज़ारों छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर आए. ये लोग इंग्लैंड की यूनिवर्सिटियों के शिक्षण शुल्क में तीन गुना तक की वृद्धि का विरोध कर रहे थे.

वहीं रिपब्लिक ऑफ़ आयरलैंड की सरकार को अपना आर्थिक संकट सुलझाने के लिए अंतत यूरोपीय संघ की शरण में जाना पड़ा. अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ आयरलैंड को तीन साल के भीतर करीब 100 अरब डॉलर देंगे.

लेकिन आयरलैंड को इसके बदले में कई कटौतियों की घोषणा करनी पड़ीं. कटौतियों के ख़िलाफ़ ब्रिटेन की तरह यहाँ भी विरोध प्रदर्शन हुए. सरकार को इसका राजीतिक ख़ामियाज़ा भी भुगतना पड़ा और प्रधानमंत्री ब्रायन कावेन को घोषणा करनी पड़ी कि यूरोपीय संघ से मिलने वाली आर्थिक मदद की रूपरेखा तय होने के बाद वे नए साल में चुनाव करवाएँगे.

ग्रीस भी 2010 में आर्थिक संकट से जूझता रहा. अप्रैल में हालात ये थे कि ग्रीस पर लगभग 300 अरब यूरो का कर्ज़ था. नतीजतन बड़े स्तर पर कटौतियाँ. आख़िरकर यूरोपीय यूनियन 145 अरब डॉलर के कर्ज़ को मंज़ूरी दे दी थी

ग्रीस के संकट के कारण यूरोप ही नहीं दुनिया भर के बाज़ारों में गिरावट का दौर रहा. यूरोपीय संघ में इसे लेकर अफ़रा-तफ़री का माहौल रहा कि कहीं ग्रीस का संकट बाकी देशों को अपनी चपेट में न ले ले.

ग्रीस के अलावा स्पेन में भी आर्थिक हलचल चल रही है.या कहें कि यूरोज़ोन के कई देशों के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं है और यूरो के अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं.

दुनिया के मज़बूत आर्थिक स्तंभ माने जाने वाले- अमरीका, यूरोप और जापान की स्थिति ख़राब है. जबकि भारत-चीन की विकास दर अच्छी चल रही है.

पर आशंका यही है कि वैश्विकरण के दौर में जब एक देश की आर्थिक डोर दूसरे से बंधी हुई है, ऐसे में एक देश में मचा आर्थिक कोहराम आसानी से अन्य देशों को अपनी चपेट में ले सकता है.

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